SB 3.9
सरल सार (Essence): इन सभी श्लोकों और उनके भावार्थ में एक ही मुख्य बात बार-बार स्पष्ट की गई है कि भगवान श्री कृष्ण ही परम सत्य हैं और वही समस्त सृष्टि के मूल कारण हैं। जीव अपनी देह और माया में बंधे होने के कारण इस सत्य को नहीं समझ पाता और अलग-अलग गलत विचार बना लेता है। बड़े-बड़े विद्वान, वैज्ञानिक और दार्शनिक भी भगवान की मायाशक्ति के प्रभाव में आकर मूल कारण को नहीं जान पाते। भगवान को केवल तपस्या, ज्ञान या तर्क से नहीं जाना जा सकता, बल्कि उनकी कृपा और शुद्ध भक्ति से ही जाना जा सकता है। जब कोई भगवान के दिव्य, आनंदमय और ज्ञानमय स्वरूप का वास्तविक अनुभव कर लेता है, तो उसका मन संसार की भौतिक सुंदरता और सुखों से अपने-आप हट जाता है। यही कारण है कि शुद्ध भक्त संसार के आकर्षणों में नहीं फँसते। भगवान के सभी अवतार और विस्तार पूर्ण रूप से दिव्य हैं, वे भौतिक नहीं हैं और न ही साधारण जीवों या देवताओं के समान हैं। निराकार ब्रह्म भगवान का केवल एक अंश है, जबकि भगवान का साकार स्वरूप ही भक्तों के लिए ध्यान और प्रेम का वास्तविक विषय है। जो लोग भगवान के साकार स्वरूप को अस्वीकार करते हैं, वे सत्य से दूर चले ...