Narsimha Chaturdashi

भगवान नृसिंहदेव की प्रार्थना
(श्री दशावतार-स्तोत्र से)

तव कर-कमल-वरे नखम् अद्भुत-शृंगम्
दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृंगम् ।
केशव धृत-नरहरि-रूप जय जगदीश हरे ॥

“हे केशव! हे जगत के स्वामी! हे हरि! आपने आधा मनुष्य और आधा सिंह का रूप धारण किया है। आपकी जय हो! जैसे कोई व्यक्ति अपने नाखूनों के बीच एक भौंरे को सहज ही कुचल सकता है, उसी प्रकार आपके सुंदर कमल समान हाथों के अद्भुत नुकीले नाखूनों द्वारा भौंरे के समान दैत्य हिरण्यकशिपु का शरीर चीर दिया गया।”

“चौथा अवतार नृसिंहदेव हैं। नृसिंहदेव पाँच वर्ष के बालक प्रह्लाद महाराज की रक्षा के लिए प्रकट हुए, जिन्हें उनका नास्तिक पिता बहुत यातना दे रहा था। वे राजमहल के स्तंभ से आधा मनुष्य और आधा सिंह रूप में प्रकट हुए। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी से वरदान लिया था कि वह किसी मनुष्य या पशु द्वारा मारा न जाए। इसलिए भगवान न तो मनुष्य बने और न पशु। यही भगवान की बुद्धि और हमारी बुद्धि में अंतर है। हम सोचते हैं कि अपनी बुद्धि से भगवान को छल सकते हैं, पर भगवान हमसे अधिक बुद्धिमान हैं।

हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी को अप्रत्यक्ष रीति से छलना चाहा। पहले वह अमर होना चाहता था। ब्रह्माजी ने कहा, ‘यह संभव नहीं, क्योंकि मैं भी अमर नहीं हूँ। इस भौतिक जगत में कोई अमर नहीं है।’ तब दैत्य हिरण्यकशिपु ने सोचा, ‘घुमा-फिराकर मैं अमर बन जाऊँगा।’ उसने प्रार्थना की, ‘मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं किसी मनुष्य या पशु से न मारा जाऊँ।’ ब्रह्माजी ने कहा, ‘ठीक है।’

‘मैं आकाश, जल या भूमि पर न मारा जाऊँ।’
‘ठीक है।’

‘मैं किसी मनुष्य निर्मित या देव निर्मित अस्त्र से न मारा जाऊँ।’
‘ठीक है।’

इस प्रकार उसने अपनी बुद्धि का उपयोग अनेक प्रकार से अमर होने के लिए किया। पर भगवान इतने चतुर हैं कि ब्रह्मा के सभी वरदान अक्षुण्ण रहे, फिर भी वह मारा गया। उसने वर लिया था कि दिन या रात में न मारा जाऊँ। अतः वह संध्या समय मारा गया, जो न दिन है न रात। उसने वर लिया था कि आकाश, जल या भूमि पर न मारा जाऊँ, अतः वह भगवान की गोद में मारा गया। उसने वर लिया था कि किसी अस्त्र से न मारा जाऊँ, अतः वह नाखूनों से मारा गया। इस प्रकार सभी वरदान सुरक्षित रहे, फिर भी वह मारा गया।

इसी प्रकार हम अनेक योजनाएँ बना लें, विज्ञान में बहुत उन्नति कर लें, पर प्रकृति का मृत्यु नियम बना रहेगा। कोई बच नहीं सकता। अपनी बुद्धि से हम जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि से नहीं बच सकते। हम अनेक औषधियाँ, अस्त्र, उपाय और साधन बना लें, पर इन चार भौतिक दुखों से कोई नहीं बच सकता। हिरण्यकशिपु इसका प्रमाण था। वह महान भौतिकवादी था, सदा जीना चाहता था, भोग करना चाहता था, पर वह भी न रह सका। सब समाप्त हो गया।”
(ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, 18 फरवरी 1970, लॉस एंजेलिस)


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भगवान नृसिंहदेव का प्राकट्य दिवस

(श्रीमद्भागवत 7.5.22-34, लॉस एंजेलिस, 27 मई 1972)

श्रील प्रभुपाद बोले: “आज भगवान नृसिंहदेव का प्राकट्य दिवस है। भगवान नृसिंहदेव अपने भक्त प्रह्लाद के कारण नृसिंह चतुर्दशी के दिन प्रकट हुए। भगवद्गीता में कहा गया है—

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

भगवान दो उद्देश्यों से आते हैं— भक्तों की रक्षा और दुष्टों का विनाश। प्रह्लाद महाराज पाँच वर्ष के बालक थे। उनका केवल एक दोष था— वे कृष्णभावनामृत में स्थित थे, वे कृष्ण के भक्त थे। बस यही उनका अपराध था। उनका पिता इतना कठोर था कि अपने पाँच वर्ष के पुत्र को भी हरिनाम जपने नहीं देता था। यही दैत्य सभ्यता है।

जो लोग कृष्णभावनामृत में प्रगति करते हैं, उनके शत्रु और आलोचक अवश्य होंगे। दैत्य सदा ईश्वर चेतना के विरोधी रहते हैं। यही इतिहास है। जैसे प्रभु यीशु मसीह को सूली पर चढ़ाया गया। उनका क्या अपराध था? वे केवल ईश्वर चेतना का प्रचार कर रहे थे। संसार इतना कठोर है।

प्रह्लाद महाराज को अनेक प्रकार से सताया गया। एक दिन हिरण्यकशिपु ने प्रेमवश अपने पुत्र से पूछा—

‘हे पुत्र, तुमने अपने गुरुओं से जो श्रेष्ठ शिक्षा पाई है, वह मुझे बताओ।’

प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया—

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

‘भगवान विष्णु का श्रवण करना, उनका कीर्तन करना, उनका स्मरण करना, उनके चरणों की सेवा करना, उनकी पूजा करना, प्रार्थना करना, सेवक बनना, मित्र बनना और पूर्ण आत्मसमर्पण करना— ये नवधा भक्ति के अंग हैं। जो इनका पालन करता है, मैं उसे सर्वश्रेष्ठ विद्वान मानता हूँ।’

हम लोग संसार की अनेक विषयों की चर्चा करते हैं— राजनीति, अर्थशास्त्र, रोग, मनोरंजन, इन्द्रिय भोग— पर हमें विष्णु के विषय में सुनना और बोलना चाहिए। यही वास्तविक शिक्षा है।

श्रवणम् — भगवान के विषय में सुनना।
कीर्तनम् — भगवान का नाम और गुण गाना।
स्मरणम् — सदा उनका स्मरण करना।
पादसेवनम् — उनके चरणों की सेवा करना।
अर्चनम् — विग्रह पूजा करना।
वन्दनम् — प्रार्थना करना।
दास्यम् — सेवक बनना।
सख्यम् — भगवान को अपना मित्र मानना।
आत्मनिवेदनम् — पूर्ण समर्पण करना।

भगवान सबके मित्र हैं। वे हमारे हृदय में परमात्मा रूप में बैठे हैं और कहते हैं— ‘तुम क्यों दुख पा रहे हो? मेरे पास वापस आओ।’

जब हिरण्यकशिपु ने यह सुना तो वह क्रोध से काँप उठा। उसने सोचा कि गुरुओं ने बालक को कृष्णभावनामृत सिखा दिया है। उसने गुरुओं को बुलाया और कहा—

‘हे ब्राह्मण कुल में जन्मे मूर्खों! मैंने अपने पुत्र को तुम्हारे पास शिक्षा के लिए भेजा था, और तुमने इसे मेरे शत्रु विष्णु का भक्त बना दिया!’

गुरुओं ने उत्तर दिया—

‘राजन्! हमने इसे यह शिक्षा नहीं दी। न किसी और ने दी। यह तो स्वभाव से ही कृष्णभावनामृत में स्थित है। हम तो इसे रोकते हैं, फिर भी यह हरिनाम जपता है।’

तब हिरण्यकशिपु ने फिर पूछा—

‘तू दुष्ट बालक! यह कृष्णभावना कहाँ से सीखी?’

प्रह्लाद ने उत्तर दिया—

मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा
मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम् ।

‘जो लोग गृहव्रत हैं— जिनका लक्ष्य केवल घर, धन, स्त्री और भोग है— वे न दूसरों की शिक्षा से, न स्वयं चिंतन से, न सम्मेलनों से कृष्णभावनामृत को समझ सकते हैं।’

ऐसे लोग इन्द्रिय भोग में फँसे रहते हैं और अंधकारमय जीवन में गिरते हैं। वे बार-बार चबाई हुई वस्तु को चबाते हैं— अर्थात् वही इन्द्रिय सुख अलग-अलग रूप में भोगते रहते हैं।

वे नहीं जानते—

न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुम् ॥

‘उनका परम हित विष्णु हैं।’

जीवन का लक्ष्य भगवान विष्णु को जानना है, पर लोग आर्थिक विकास, भोग और सत्ता में सुख खोजते हैं। इतिहास देखो— कितने साम्राज्य उठे और गिर गए। रोमन साम्राज्य, ब्रिटिश साम्राज्य, नाज़ीवाद— सब नष्ट हो गए। फिर भी मनुष्य नया साम्राज्य बनाने में लगा है। यह दैत्य सभ्यता कभी सफल नहीं होगी।

अत्यधिक भोग और ऐश्वर्य में आसक्त लोग कृष्णभावनामृत ग्रहण नहीं कर सकते—

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥

वे अंधे हैं और अंधों के पीछे चल रहे हैं—

अन्धा यथान्धैरुपनीयमानाः ॥

नेता भी अंधे हैं, जनता भी अंधी है। एक समस्या हल करने जाते हैं, दस नई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। यही भौतिक जीवन है।

समाधान क्या है? प्रह्लाद महाराज कहते हैं—

नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः ।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥

जब तक मनुष्य निष्काम, महान शुद्ध भक्तों के चरणरज को सिर पर नहीं लेता, तब तक कृष्णभावनामृत नहीं आता। यही उपाय है। शुद्ध भक्त की शरण लो, तब सब अनर्थ दूर होंगे।

प्रह्लाद ने अपने पिता को यह शिक्षा दी, पर हिरण्यकशिपु और क्रोधित हो गया। मूर्ख को उपदेश देने से वह शांत नहीं होता, क्रोधित होता है। अंत में उसने कहा—

‘प्रह्लाद! अब मैं तुझे मार दूँगा। देखता हूँ तेरा कृष्ण कैसे बचाता है।’

उसने पूछा— ‘क्या तेरा भगवान इस स्तंभ में है?’

प्रह्लाद ने कहा— ‘हाँ, वे यहाँ भी हैं।’

हिरण्यकशिपु ने क्रोध में स्तंभ तोड़ा और उसी क्षण भगवान नृसिंहदेव प्रकट हो गए।”


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नृसिंह शालग्राम शिला की महिमा

(श्रील रूप गोस्वामी, पद्यावली)

“नृसिंह शालग्राम शिला के चरणों में अर्पित एक तुलसी पत्र हत्या के पाप को नष्ट कर देता है।
नृसिंह शालग्राम शिला के चरणोदक से चोरी का पाप नष्ट होता है।
उन्हें अर्पित भोजन मदिरापान के पाप को नष्ट करता है।
नृसिंह शालग्राम शिला के प्रति निष्कपट शरणागति गुरु-पत्नी गमन के पाप को नष्ट करती है।
नृसिंह शालग्राम शिला के भक्तों का संग वैष्णव अपराध के पाप को नष्ट करता है।

यह नृसिंह शालग्राम शिला की अद्भुत महिमा है।”

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