Rukmini Dwadishi
श्री रुक्मिणी द्वादशी, श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी और द्वारका की महारानी श्री रुक्मिणी देवी के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को आती है। यह दिन दिव्य प्रेम, समर्पण, पवित्रता और भगवत्-भक्ति का स्मरण कराता है। श्री रुक्मिणी और भगवान श्रीकृष्ण की विवाह लीला तथा उनका दिव्य मिलन भक्तों के लिए आदर्श प्रेम और पूर्ण आत्मसमर्पण का प्रतीक है। कहा जाता है कि जो भक्त इस दिन श्रद्धा से पूजा, प्रार्थना, पुष्प अर्पण और व्रत करते हैं, उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा जीवन में सौभाग्य और शांति आती है।
मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर सहित अनेक श्रीकृष्ण मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा, भजन और उत्सव आयोजित किए जाते हैं। भक्तजन श्री रुक्मिणी देवी को भगवान की करुणामयी शक्ति, आदर्श पत्नी, पतिव्रता, दिव्य सौंदर्य और भक्ति की मूर्ति के रूप में पूजते हैं। उनका मुख अत्यंत मनोहर, स्वभाव लज्जाशील, चरित्र पवित्र, बुद्धि प्रखर और आचरण आदर्श है। वे उदार, गंभीर, कुलीन, मधुर मुस्कान वाली, अनुपम रूपवती और शुभ लक्षणों से युक्त हैं। उनकी चाल राजहंस के समान मनोहर कही गई है और उनका प्रत्येक अंग दिव्य तेज से पूर्ण है।
परंतु श्री रुक्मिणी देवी की सबसे महान विशेषता उनका श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम है। उनका मन, प्राण, हृदय और सम्पूर्ण अस्तित्व केवल भगवान गोविन्द को समर्पित था। वे समस्त सद्गुणों का आश्रय हैं और सिखाती हैं कि सच्चा सौंदर्य बाहरी रूप में नहीं, बल्कि विनम्रता, सेवा, निष्ठा, पवित्रता और भगवान के प्रति निष्काम प्रेम में है। रुक्मिणी द्वादशी हमें प्रेरणा देती है कि हम भी अपने जीवन को भगवान की भक्ति में अर्पित करें और प्रेममय सेवा भाव से जीवन को सफल बनाएं।
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