isopanishad Mantra 1
इस पूरे ज्ञान का सार यह है कि इस संसार में जो कुछ भी है—जीव हो या वस्तु—सब भगवान की ही संपत्ति है और उन्हीं के नियंत्रण में है। इसलिए मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वह किसी चीज़ का असली मालिक नहीं है, बल्कि केवल उतना ही उपयोग करने का अधिकारी है जितना भगवान ने उसके लिए निर्धारित किया है।
वैदिक ज्ञान इसलिए पूर्ण और सच्चा है क्योंकि यह सीधे भगवान से आया है और गुरु-शिष्य परंपरा से चला आ रहा है, जबकि सामान्य मनुष्य चार दोषों से युक्त होता है और पूर्ण ज्ञान नहीं दे सकता। भगवान की दो शक्तियाँ हैं—भौतिक (अपरा) और आध्यात्मिक (परा)—और इन दोनों से ही पूरा संसार बना है, इसलिए सब कुछ उन्हीं का है।
मनुष्य का कर्तव्य है कि वह संतोष से जीवन जीए, भगवान के अधिकार को स्वीकार करे और किसी भी वस्तु पर अपना स्वामित्व न जताए। जब मनुष्य इस सत्य को भूल जाता है, तब ही झगड़े, युद्ध और अशांति उत्पन्न होते हैं। वास्तविक शांति तभी आ सकती है जब हर कोई यह समझे कि सब कुछ भगवान का है।
जीवन का उद्देश्य केवल इंद्रियों की तृप्ति नहीं, बल्कि भगवान को समझना और उनकी सेवा करना है। भोजन भी भगवान को अर्पित करके ही ग्रहण करना चाहिए, तभी वह पवित्र बनता है और मनुष्य पाप से बचता है।
अंत में, जो व्यक्ति भगवान के नियमों का पालन करता है, संतोष में रहता है और सब कुछ भगवान को समर्पित करता है, वही वास्तव में सफल जीवन जीता है और अंततः भगवान के धाम को प्राप्त करने योग्य बनता है।
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