beyond birth and death adhyay 1
1. प्रश्न: आत्म-साक्षात्कार का पहला चरण क्या है?
उत्तर: शरीर से अलग अपनी पहचान का बोध — “मैं यह शरीर नहीं, आत्मा हूँ।” यही आत्म-साक्षात्कार का प्रथम चरण है।
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2. प्रश्न: शरीर और आत्मा में क्या अंतर है?
उत्तर: शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा शाश्वत और अवध्य है। आत्मा चेतना का स्रोत है; चेतना आत्मा का लक्षण है, जैसे ऊष्मा अग्नि का।
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3. प्रश्न: चेतना क्या है और उसका आत्मा से क्या संबंध है?
उत्तर: चेतना आत्मा की ऊर्जा है। जब तक आत्मा शरीर में है, चेतना रहती है; जैसे ही आत्मा निकल जाती है, शरीर मृत हो जाता है।
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4. प्रश्न: क्या आत्मा को इंद्रियों से देखा जा सकता है?
उत्तर: नहीं, आत्मा अत्यंत सूक्ष्म है। जैसे हवा, ध्वनि या रेडियो तरंगें न दिखने पर भी अस्तित्व में हैं, वैसे ही आत्मा भी अपने लक्षणों से जानी जाती है।
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5. प्रश्न: दुख और सुख का कारण क्या है?
उत्तर: शरीर के साथ गलत पहचान। सुख-दुःख इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं, जैसे शीत और उष्णता अस्थायी हैं।
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6. प्रश्न: कृष्ण ने क्यों कहा कि “सहन करना सीखो”?
उत्तर: क्योंकि शीत-उष्ण, सुख-दुःख अस्थायी हैं; इन्हें सहन करना चाहिए ताकि आत्मा की स्थिति में स्थिर रहा जा सके।
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7. प्रश्न: आत्मा की स्वाभाविक प्रवृत्ति क्या है?
उत्तर: ज्ञान, आनंद और शाश्वतता की खोज करना — क्योंकि आत्मा “सच्चिदानंद” स्वरूप है और भगवान का अंश है।
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8. प्रश्न: इंद्रियाँ हमें कैसे भ्रमित करती हैं?
उत्तर: इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों के पीछे दौड़ती हैं — आँख सुंदर वस्तु देखना चाहती है, कान मधुर ध्वनि सुनना चाहते हैं — और मन को बहा ले जाती हैं।
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9. प्रश्न: गोस्वामी किसे कहते हैं?
उत्तर: जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को वश में कर लेता है — “गो” का अर्थ इंद्रियाँ और “स्वामी” का अर्थ नियंत्रक है।
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10. प्रश्न: भौतिक सुख क्षणिक क्यों है?
उत्तर: क्योंकि यह शरीर से जुड़ा है, जो नश्वर है। वास्तविक सुख आत्मा का है, जो शाश्वत है।
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11. प्रश्न: वेदों का वास्तविक उद्देश्य क्या है?
उत्तर: हमें आत्मा के रूप में अपनी स्थिति को समझाना और शारीरिक भोगों से ऊपर उठाना।
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12. प्रश्न: कृष्ण ने “त्रैगुण्य-विषया वेदा” कहकर क्या बताया?
उत्तर: वेद तीनों गुणों (सतो, रजो, तमो) के विषयों को नियंत्रित करते हैं; लेकिन साधक को इन गुणों से ऊपर उठकर आत्मा में स्थित होना चाहिए।
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13. प्रश्न: हम शाश्वत ज्ञान क्यों नहीं रखते?
उत्तर: क्योंकि जन्म-मरण के साथ शरीर बदलता है, और हर जन्म में भौतिक स्मृति मिट जाती है।
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14. प्रश्न: भौतिक भोग को “रोगग्रस्त अवस्था” क्यों कहा गया है?
उत्तर: जैसे रोगी को मीठा कड़वा लगता है, वैसे ही भौतिक चेतना वाले को आध्यात्मिक आनंद अप्रिय लगता है। जब तक यह रोग (शरीर-तादात्म्य) मिटता नहीं, आत्मानंद का अनुभव नहीं होता।
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15. प्रश्न: वास्तविक आनंद (भोग) किसे कहा गया है?
उत्तर: भगवान श्रीकृष्ण के साथ संबंध में प्राप्त आनंद — “रमंते योगिनोऽन्ते” — जो अनंत और शुद्ध है।
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16. प्रश्न: भगवान को “भोक्ता” क्यों कहा गया है?
उत्तर: क्योंकि वे सभी यज्ञों, तपों और जगत के स्वामी हैं। जब हम उन्हें परम भोक्ता और शुभचिंतक मानते हैं, तब हमें शांति मिलती है।
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17. प्रश्न: आत्मा और ईश्वर का संबंध क्या है?
उत्तर: ईश्वर भोगकर्ता हैं, और आत्मा भोग्य — किंतु जब आत्मा ईश्वर के साथ भोग में भाग लेती है, तभी वह पूर्ण आनंद अनुभव करती है।
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18. प्रश्न: शरीर के नाश और आत्मा की नित्यता पर कृष्ण का निष्कर्ष क्या है?
उत्तर: “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्तः शरीरिणः” — शरीर नाशवान है, आत्मा शाश्वत है, इसलिए शोक नहीं करना चाहिए।
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19. प्रश्न: तीन गुणों (सतो, रजो, तमो) से ऊपर उठने का परिणाम क्या है?
उत्तर: ऐसा व्यक्ति जन्म, मृत्यु, जरा और उनके कष्टों से मुक्त होकर इसी जीवन में अमृत का अनुभव करता है।
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20. प्रश्न: कृष्णभावनामृत की विधि क्या सिखाती है?
उत्तर: भगवान के नामों का जप — “हरे कृष्ण, हरे कृष्ण…” — द्वारा आत्मा को उसकी वास्तविक, शुद्ध स्थिति में स्थापित करना और भौतिक गुणों से ऊपर उठना।
All glories to Srila Prabhupada 🙏
Hare Krishna 🙏
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