Bhagavad Gita Adhyay 18



अर्जुन ने भगवान से त्याग और संन्यास का अर्थ पूछकर यह जानना चाहा कि इन दोनों में अंतर क्या है और जीवन में उनका वास्तविक उद्देश्य क्या है। भगवान ने स्पष्ट किया कि त्याग का अर्थ कर्मों के फलों का त्याग है, जबकि संन्यास का अर्थ है भौतिक इच्छाओं से प्रेरित कर्मों का त्याग करना।

भगवद्गीता का अठारहवाँ अध्याय संपूर्ण उपदेशों का सार है, जहाँ भगवान बताते हैं कि सभी कर्म अंततः भक्ति की ओर ले जाने चाहिए। केवल वे कर्म त्यागने योग्य हैं जो कामनाओं से प्रेरित हों, लेकिन यज्ञ, दान और तप जैसे शुभ कर्मों को कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि ये मन और समाज दोनों को शुद्ध करते हैं।

सच्चा त्याग वही है जहाँ व्यक्ति भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है, न कि व्यक्तिगत लाभ के लिए। कर्म से भागना संन्यास नहीं, बल्कि मोह है। कर्म करते हुए, फल की आसक्ति को छोड़ देना ही सच्चा त्याग और भक्ति का मार्ग है।

भगवान कृष्ण बताते हैं कि सभी कर्मों को आसक्ति और फल की इच्छा से रहित होकर, केवल कर्तव्यभाव से करना चाहिए। सच्चा त्याग वही है जहाँ व्यक्ति अपने कार्यों को भगवान की सेवा मानकर करता है, न कि किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए।

जो व्यक्ति मोहवश या आलस्य से अपने कर्तव्यों का त्याग करता है, वह अज्ञान में है; ऐसा त्याग तामसी कहलाता है। जो व्यक्ति शारीरिक कष्ट या भय के कारण कर्म छोड़ देता है, उसका त्याग रजोगुणी होता है, जो कभी उन्नति नहीं देता। लेकिन जब कोई केवल कर्तव्य की भावना से, परिणामों से विरक्त होकर कार्य करता है, तो उसका त्याग सतोगुणी कहलाता है।

सतोगुणी त्यागी शुभ और अशुभ दोनों कर्मों में समभाव रखता है। वह न किसी कर्म से घृणा करता है, न किसी कर्म में आसक्ति रखता है। ऐसा व्यक्ति शुद्ध बुद्धि से कर्म करता है, संदेहों से मुक्त होकर, और अपने हर कार्य को भगवान के प्रति समर्पण के भाव से करता है — यही सच्चे त्याग और ज्ञान की पूर्ण अवस्था है।

भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि देहधारी जीव के लिए कर्मों का पूर्ण त्याग असंभव है, क्योंकि जीवन स्वयं कर्म से जुड़ा हुआ है। सच्चा त्याग वही है जहाँ व्यक्ति कर्म के फल को अपने लिए न रखकर भगवान को अर्पित करता है। जो व्यक्ति केवल भगवान के लिए कार्य करता है और फल की आसक्ति छोड़ देता है, वही वास्तविक संन्यासी है — चाहे वह बाहरी रूप से गृहस्थ हो या संन्यासी।

जो व्यक्ति त्यागी नहीं है, उसे अपने कर्मों के तीन प्रकार के फल – शुभ, अशुभ और मिश्रित – भोगने पड़ते हैं, लेकिन जो भगवान के लिए कर्म करता है, वह कर्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।

कर्म की सिद्धि के पाँच कारण बताए गए हैं — शरीर (अधिष्ठान), कर्ता (जीवात्मा), इंद्रियाँ, प्रयास और परमात्मा। इन सबके बिना कोई भी कर्म संभव नहीं। यद्यपि आत्मा प्रयास करती है, परंतु अंतिम नियंत्रण परमात्मा के हाथ में है, जो हृदय में बैठकर प्रत्येक जीव को उसके कर्मों के अनुसार प्रेरित करते हैं। इसलिए जब कोई व्यक्ति भगवान की इच्छा के अनुसार कर्म करता है, तो वह कर्मबंधन से मुक्त रहता है, क्योंकि वह केवल भगवान की योजना का माध्यम बन जाता है।

सही कर्म वह है जो शास्त्रों के निर्देशानुसार किया जाए, और गलत कर्म वह है जो उनसे विपरीत हो। किंतु जो व्यक्ति परमात्मा की प्रेरणा से, फल की आसक्ति छोड़कर, भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है, वह पूर्ण रूप से निर्लिप्त और मुक्त रहता है।

इस भाग का सार यह है कि मनुष्य अपने कर्मों का वास्तविक कर्ता नहीं है। पाँच कारणों — स्थान, कर्ता, चेष्टा, इन्द्रियाँ और परमेश्वर की अनुमति — से ही कोई कार्य पूर्ण होता है। जो व्यक्ति केवल अपने अहंकार से प्रेरित होकर स्वयं को सब कुछ करने वाला समझता है, वह अज्ञान में है और वस्तुओं को उनके सत्य रूप में नहीं देख पाता।

सच्चा ज्ञान यह है कि परमात्मा हर जीव के भीतर स्थित हैं और वही सबका संचालन करते हैं। जो व्यक्ति यह समझकर अपने कर्म भगवान को समर्पित करता है, वह पापों से मुक्त रहता है, जैसे सैनिक अपने अधिकारी के आदेश से कार्य करता है और दोषी नहीं ठहराया जाता।

ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय — ये कर्म की प्रेरणाएँ हैं; इन्द्रियाँ, कर्म और कर्ता — ये कर्म के घटक हैं। इन सबके मूल में प्रकृति के तीन गुण हैं — सत्त्व, रजस् और तमस् — जिनसे ज्ञान, कर्म और कर्ता तीन प्रकार के बनते हैं।

जो व्यक्ति सब जीवों में एक ही आत्मा को देखता है — चाहे वे देवता हों या तुच्छ जीव — उसका ज्ञान सत्त्वगुणी है। वह भेद नहीं देखता, क्योंकि आत्मा अविभाज्य, शुद्ध और सबमें समान है। यही दृष्टि आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

जिस ज्ञान में व्यक्ति शरीर और आत्मा में अंतर नहीं देखता, बल्कि यह सोचता है कि चेतना केवल शरीर की क्रिया है और शरीर के नाश के साथ सब कुछ समाप्त हो जाता है — वह रजोगुणी ज्ञान है। यह ज्ञान बाह्य है, जिसमें आत्मा, परमात्मा या परम सत्य का बोध नहीं होता, बल्कि केवल भौतिक शरीर और उसकी इंद्रियों को ही जीवन का केंद्र माना जाता है।

जो ज्ञान सत्य की खोज से रहित है और केवल भौतिक सुखों, तर्कों या अपनी बुद्धि से बने मतों में उलझा रहता है, वह तमोगुणी है। ऐसा व्यक्ति आत्मा या भगवान से संबंध नहीं समझता; उसके लिए जीवन केवल भोग, संग्रह और देह की सुविधा तक सीमित रहता है।

सतोगुणी कर्म वह है जो नियमपूर्वक, आसक्ति और फल की इच्छा से रहित होकर, भगवान की प्रसन्नता के लिए किया जाए। रजोगुणी कर्म वह है जो इच्छा और अहंकार से प्रेरित होकर अपने सुख के लिए किया जाता है, और तमोगुणी कर्म वह है जो अज्ञानवश, शास्त्रों की अवहेलना कर, दूसरों को कष्ट पहुँचाकर किया जाता है।

इस प्रकार ज्ञान और कर्म की तीन अवस्थाएँ जीव की चेतना की दिशा दिखाती हैं — सतोगुण ऊपर उठाता है, रजोगुण बाँधता है, और तमोगुण अंधकार में गिरा देता है।

सतोगुणी कर्मी वह है जो अहंकार से रहित होकर अपने कर्तव्य को दृढ़ निश्चय और उत्साह के साथ करता है, और सफलता या असफलता से प्रभावित नहीं होता। वह प्रकृति के गुणों से ऊपर उठकर केवल भगवान की संतुष्टि के लिए कर्म करता है, इसलिए शांत, संतुलित और प्रसन्न रहता है।

रजोगुणी कर्मी भौतिक इच्छाओं से प्रेरित होकर कार्य करता है। वह फल की अपेक्षा रखता है, लोभ और ईर्ष्या से भरा रहता है, और जब सफलता मिलती है तो अत्यधिक प्रसन्न होता है तथा असफलता में दुखी हो जाता है। उसका कर्म अहंकार, आसक्ति और इंद्रियतृप्ति से जुड़ा होता है।

तमोगुणी कर्मी आलसी, हठी और शास्त्रविहीन होता है। वह अधर्म और भ्रम के प्रभाव में आकर कार्य करता है, दूसरों का अपमान करता है और अपने कर्तव्यों को टालता रहता है। उसका जीवन जड़ता और उदासी से भरा रहता है।

सतोगुणी बुद्धि वह है जो भली-भांति समझती है कि क्या करना उचित है और क्या नहीं, क्या भय का कारण है और क्या नहीं, कौन-से कर्म बंधन देते हैं और कौन-से मुक्ति। ऐसी बुद्धि शास्त्रसम्मत विवेक पर आधारित होती है और मनुष्य को सही दिशा में ले जाती है।

सतोगुणी बुद्धि वह है जो स्पष्ट रूप से जानती है कि क्या धर्म है और क्या अधर्म, कौन-सा कर्म करना चाहिए और कौन-सा नहीं। वह शास्त्रों और विवेक के आधार पर निर्णय लेती है और भ्रम में नहीं पड़ती।

रजोगुणी बुद्धि में विवेक की कमी होती है; वह धर्म और अधर्म के बीच ठीक से भेद नहीं कर पाती और फल की आशा से प्रेरित होकर कर्म करती है। ऐसी बुद्धि बाह्य आकर्षणों में उलझी रहती है और सत्य को अस्पष्ट रूप में देखती है।

तमोगुणी बुद्धि अज्ञान और मोह से ढकी होती है। वह अधर्म को धर्म मान लेती है, असत्य को सत्य समझती है और सदैव गलत दिशा में प्रयत्न करती है। ऐसी बुद्धि व्यक्ति को पतन की ओर ले जाती है।

सतोगुणी संकल्प दृढ़ और अटल होता है। वह मन, प्राण और इन्द्रियों को नियंत्रित कर परमात्मा पर केंद्रित रखता है। यह स्थिर निश्चय आत्म-संयम और योगाभ्यास से पुष्ट होता है।

रजोगुणी संकल्प धर्म, अर्थ और इन्द्रियतृप्ति के फलों की इच्छा से प्रेरित होता है। ऐसा व्यक्ति सदैव भौतिक उपलब्धियों और भोग में व्यस्त रहता है।

तमोगुणी संकल्प अज्ञान और जड़ता से बंधा रहता है। वह नींद, भय, शोक, मोह और आलस्य से मुक्त नहीं हो पाता, इसलिए उसका मन निरंतर भटकता रहता है और किसी आध्यात्मिक लक्ष्य में स्थिर नहीं होता।

जीव इस संसार में तीन प्रकार के सुखों का अनुभव करता है, जो प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व, रजस् और तमस् — से उत्पन्न होते हैं।

सतोगुणी सुख आरंभ में कठिन और कड़वा लगता है, क्योंकि इसमें इंद्रियों का संयम, नियमों का पालन और आत्म-संयम की साधना करनी पड़ती है। परंतु जब मन आत्मा में स्थिर हो जाता है और व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है, तब यही सुख अमृत के समान बन जाता है — शाश्वत, शांत और परम आनंददायक।

रजोगुणी सुख इंद्रियों और भौतिक विषयों के संपर्क से मिलता है। यह प्रारंभ में मधुर और आकर्षक लगता है, परंतु अंततः दुःख और शोक का कारण बनता है। ऐसा सुख क्षणिक होता है और बार-बार बंधन में डालता है।

तमोगुणी सुख अज्ञान, आलस्य, निद्रा और मोह से उत्पन्न होता है। यह व्यक्ति को जड़ता में डुबो देता है, जिससे वह न आरंभ में सुखी होता है, न अंत में। यह सुख केवल भ्रम है, जो आत्मा को और गहरी अंधकार में ले जाता है।

भौतिक जगत में कोई भी प्राणी इन तीन गुणों से पूरी तरह मुक्त नहीं है; सभी इन्हीं के प्रभाव में सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। मुक्त वही होता है जो इन गुणों से ऊपर उठकर आत्म-साक्षात्कार में स्थित हो जाता है।

सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार कार्य करता है, और यही उसकी वास्तविक योग्यता व धर्म का आधार बनता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — ये चारों वर्ग किसी बाहरी पहचान से नहीं, बल्कि अपने भीतर के गुणों से निर्धारित होते हैं।

ब्राह्मण का स्वभाव शांति, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, सत्यनिष्ठा, ज्ञान और धर्मप्रियता से प्रकट होता है। क्षत्रिय में वीरता, शक्ति, निश्चय, कुशलता, दानशीलता और नेतृत्व का तेज देखा जाता है। वैश्य का धर्म खेती, गोरक्षा और व्यापार में निहित है, जबकि शूद्र अपनी सेवा और श्रम के द्वारा समाज की रीढ़ बनता है।

भगवान कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाए, तो वही उसके लिए पूर्णता का मार्ग बन जाता है। अर्थात मुक्ति किसी विशेष पद या वर्ग में नहीं, बल्कि अपने स्वभाविक कर्म को भगवान की सेवा में लगाने में है।

हर जीव अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करता है, और जब वही कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, तो वही मुक्ति का साधन बन जाता है। भगवान सभी प्राणियों के मूल और आधार हैं, अतः अपने स्वभावजन्य कार्य को भगवान की पूजा के रूप में करना ही सिद्धि का मार्ग है।

किसी भी व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार कर्म से विमुख नहीं होना चाहिए — चाहे वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हो। हर कर्म में कुछ न कुछ दोष अवश्य रहता है, जैसे अग्नि में धुआँ होता है, परंतु फिर भी अग्नि शुद्ध मानी जाती है। उसी प्रकार, अपने स्वाभाविक कर्म को भगवान की सेवा में लगाना चाहिए, क्योंकि भक्ति से युक्त कर्म पवित्र हो जाता है और आत्म-साक्षात्कार का कारण बनता है।

वास्तविक त्याग यह नहीं कि कर्म छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि कर्म के फल का स्वामित्व भगवान को अर्पित किया जाए। जो व्यक्ति ऐसा करता है, वह भौतिक बंधनों से मुक्त होकर आत्म-संतुष्टि प्राप्त करता है। यही संन्यास का वास्तविक अर्थ है — कर्म करते हुए भी अनासक्त रहना और हर कार्य को ईश्वर की सेवा मानना।

इस भाव से किया गया कर्म व्यक्ति को धीरे-धीरे ब्रह्म की परम अवस्था तक पहुँचाता है, जहाँ वह पूर्ण ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है — वही जीवन की अंतिम सिद्धि है।

जब मनुष्य अपनी बुद्धि को शुद्ध करता है, मन और इंद्रियों को वश में रखता है, और राग-द्वेष, अहंकार, काम, क्रोध तथा भौतिक आसक्तियों से मुक्त हो जाता है, तब वह वास्तविक आत्म-साक्षात्कार की अवस्था को प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति शांत, संयमी, संतुष्ट और भीतर से स्थिर रहता है।

यह अवस्था ब्रह्म-भूत कहलाती है — जहाँ जीव भौतिक देह-धारणा से मुक्त होकर अपनी आध्यात्मिक पहचान को जानता है। इस अवस्था में न शोक होता है, न इच्छा; सबके प्रति समान दृष्टि रहती है, और मन सदैव भगवान में तृप्त रहता है।

परंतु यही केवल आरंभ है। जो इस ब्रह्म-भूत स्थिति में स्थिर होकर भगवान की शुद्ध भक्ति में प्रवेश करता है, वही वास्तव में मुक्ति को पार कर भगवान के धाम में प्रवेश कर सकता है। भक्ति ही वह शक्ति है जो भगवान के स्वरूप, गुण और धाम को प्रकट करती है। केवल ज्ञान या मानसिक चिन्तन से नहीं, बल्कि भक्ति-सेवा से ही भगवान समझे जा सकते हैं।

जब भक्त पूर्ण रूप से भगवान के संरक्षण में रहकर, उनके आदेशानुसार अपने सभी कार्य करता है, तो वह स्वयं भगवान की कृपा से सुरक्षित रहता है। ऐसा भक्त, चाहे संसार में किसी भी परिस्थिति में हो, भगवान के धाम को प्राप्त करता है — जहाँ सब कुछ शाश्वत, अविनाशी और पूर्ण आनंदमय है। यही पूर्ण आत्म-साक्षात्कार और जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है।

भगवान समझाते हैं कि यदि मनुष्य उनके प्रति पूर्ण चेतन होकर उनके निर्देशन में कर्म करता है, तो उनकी कृपा से वह जीवन की सभी बंधनों और कठिनाइयों को पार कर सकता है। लेकिन यदि वह अहंकारवश उनकी आज्ञा की उपेक्षा करता है, तो उसका पतन निश्चित है, क्योंकि जीव अपने स्वभाव और प्रकृति के गुणों से बँधा हुआ है, स्वतंत्र नहीं है।

परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित होकर उसके कर्मों का निर्देशन करते हैं, जैसे कोई चालक वाहन को चलाता है। जीव स्वयं निर्णयकर्ता नहीं, बल्कि ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है। इसलिए उसका कल्याण तभी संभव है जब वह अपनी स्वतंत्रता का भ्रम छोड़कर ईश्वर की शरण में जाए।

शरणागति का अर्थ है — अपने कर्म, मन और जीवन को पूर्ण रूप से भगवान को अर्पित करना और उनके आदेश के अनुसार कार्य करना। जब मनुष्य ऐसा करता है, तो भगवान स्वयं उसे सुरक्षा देते हैं, उसके सभी कर्मों को शुद्ध करते हैं और अंततः उसे अपने शाश्वत, दिव्य धाम — वैकुण्ठ या कृष्णलोक — में स्थान प्रदान करते हैं। यही सच्ची मुक्ति और शाश्वत शांति की अवस्था है।

भगवान ने अर्जुन को समस्त प्रकार के ज्ञान — ब्रह्म, परमात्मा और परम पुरुष भगवान — का रहस्य समझाया, और अंत में सबसे गोपनीय उपदेश दिया: सब धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, इसलिए भय मत करो। यही भगवद्गीता का सार और जीवन का परम लक्ष्य है।

भगवान जीव को पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं कि वह विचार कर स्वयं निर्णय ले, परंतु सर्वोत्तम मार्ग यही है कि वह अपनी बुद्धि को भगवान की इच्छा में समर्पित करे। जब व्यक्ति समर्पण करता है और अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को भगवान की सेवा में लगाता है, तब वह सभी बंधनों से मुक्त होकर उनके धाम को प्राप्त करता है।

सच्ची भक्ति केवल वही कर सकता है जो श्रद्धा, प्रेम और समर्पण से युक्त है — जो भगवान का प्रिय मित्र बनता है, जैसा अर्जुन था। ऐसा भक्त दिन-रात कृष्ण का चिंतन करता है, उनके नाम, रूप और लीलाओं में रमता है, और जीवन के हर कर्म को भगवान से जोड़ देता है। यही सबसे गुह्य ज्ञान है — सदैव कृष्ण का स्मरण करना और उनके शरणागत रहना।

भगवान चेतावनी भी देते हैं कि यह परम रहस्य केवल श्रद्धावान, तपस्वी और निष्कपट भक्तों को ही बताना चाहिए, न कि उन लोगों को जो ईर्ष्यालु या भौतिक इच्छाओं में फँसे हैं। जो शुद्ध हृदय से इसे स्वीकार करता है, वही वास्तव में भगवद्गीता को समझ सकता है और जीवन की परम सिद्धि — भगवान का सान्निध्य — प्राप्त कर सकता है।

जो व्यक्ति श्रद्धा और प्रेम से भगवद्गीता के इस परम रहस्य को भक्तों तक पहुँचाता है, वह स्वयं शुद्ध भक्ति प्राप्त करता है और अंततः भगवान के धाम को लौट जाता है। ऐसा प्रचारक भगवान के लिए सबसे प्रिय सेवक होता है — न कोई उससे अधिक प्रिय रहा है, न आगे होगा।

जो व्यक्ति इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपने मन से भगवान की पूजा कर रहा होता है; और जो इसे श्रद्धापूर्वक और बिना ईर्ष्या के सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर उन उच्च लोकों को प्राप्त करता है जहाँ धर्मात्मा रहते हैं। भगवद्गीता को सुनना, समझना और सिखाना — ये सभी स्वयं भगवान की सेवा हैं, जो आत्मा को शुद्ध करती हैं और जीवन को दिव्य बनाती हैं।

भगवान अंत में अर्जुन से पूछते हैं कि क्या अब उसका मोह और अज्ञान दूर हो गया है — क्योंकि भगवद्गीता केवल ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मा को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य संवाद है। जो कोई भी इसे श्रद्धा से सुनता है, उसका हृदय निर्मल हो जाता है और वह सच्चे आत्मज्ञान की दिशा में अग्रसर होता है।

अर्जुन ने भगवान की कृपा से अपना मोह दूर कर लिया और पुनः अपनी वास्तविक स्थिति को समझ लिया — कि जीव का धर्म भगवान का आज्ञाकारी सेवक बनकर उनके निर्देशानुसार कार्य करना है। जब जीव भगवान की इच्छा में समर्पित हो जाता है, तब वह माया से मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक शुद्ध स्थिति में पहुँच जाता है।

संजय कहता है कि यह वार्तालाप दो महान आत्माओं — भगवान कृष्ण और उनके भक्त अर्जुन — के बीच हुआ, और इसे सुनकर उसका हृदय रोमांचित हो उठा। व्यासदेव की कृपा से संजय को यह संवाद प्रत्यक्ष सुनने का सौभाग्य मिला, जिससे उसने समझा कि गुरु परंपरा के माध्यम से ही भगवान को वास्तव में जाना जा सकता है।

यह संवाद इतना अद्भुत और पवित्र था कि संजय बार-बार स्मरण कर आनंदित होता रहा। उसने निष्कर्ष दिया कि जहाँ भी भगवान कृष्ण — सभी योगियों के गुरु — और उनके भक्त अर्जुन उपस्थित हैं, वहाँ सदैव ऐश्वर्य, विजय, शक्ति और नीति विद्यमान रहती है।

अंततः भगवद्गीता का सार यही है कि जीवन की सर्वोच्च सिद्धि भगवान कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण है। ब्रह्म, परमात्मा और भगवान — इन तीनों में से भगवान श्रीकृष्ण परम सत्य का पूर्ण रूप हैं। जब जीव उनके प्रति भक्ति में स्थिर होता है, तब वह ज्ञान, धर्म और योग — सबका परम फल प्राप्त करता है। यही गीता का अंतिम और सबसे गोपनीय उपदेश है — “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”

All glories to Srila Prabhupada 🙏 
Hare Krishna 🙏 

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