Bhagavad Gita Adhyay 5
इस संवाद का सार यह है कि अर्जुन के भ्रम को दूर करने के लिए भगवान कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि कर्म का पूर्ण त्याग (संन्यास) और भक्ति के साथ कर्म करना (कर्म-योग) — दोनों ही मुक्ति के मार्ग हैं, परंतु भक्ति-युक्त कर्म श्रेष्ठ है। केवल कर्म का त्याग करने से हृदय शुद्ध नहीं होता, क्योंकि जब तक व्यक्ति की चेतना शुद्ध नहीं होती, तब तक वह फिर से कर्म और इंद्रिय-भोग में फँस जाता है।
कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म, भगवान की सेवा के लिए किया गया कर्म है — उसमें न स्वार्थ है, न आसक्ति। ऐसा कर्म व्यक्ति को कर्मफल के बंधन से मुक्त करता है, क्योंकि उसके पीछे भगवान की भक्ति होती है, न कि इंद्रिय-सुख की चाह।
ज्ञान का उद्देश्य आत्मा और परमात्मा के संबंध को समझना है, और भक्ति का उद्देश्य उसी परमात्मा की सेवा में अपने जीवन को समर्पित करना। इसलिए, जो वास्तव में जानता है कि सब कर्म भगवान के लिए हैं, वह कर्म करते हुए भी त्यागी है।
सांख्य (ज्ञान) और कर्मयोग (भक्ति-युक्त कर्म) का अंतिम लक्ष्य एक ही है — विष्णु, परमात्मा। एक मार्ग भौतिक आसक्ति से विरक्ति लाता है, दूसरा भगवान में आसक्ति जगाता है; परंतु दोनों का सार एक ही है — भगवान से संबंध स्थापित करना।
इसलिए भगवान निष्कर्ष देते हैं कि सच्चा त्याग वही है जिसमें मन, कर्म और हृदय — सब कुछ कृष्ण को समर्पित हो जाए। यही पूर्ण मुक्ति और वास्तविक ज्ञान की अवस्था है।
इस पूरे प्रसंग का सार यह है कि केवल कर्मों का त्याग कर देना — अर्थात “कुछ न करना” — आध्यात्मिक सुख नहीं दे सकता। असली शांति और मुक्ति तभी आती है जब व्यक्ति भगवान की प्रेममयी सेवा में कर्म करता है।
जो भक्ति में स्थित होकर कर्म करता है, वह चाहे कार्यों में लगा दिखे, फिर भी बंधन से मुक्त रहता है, क्योंकि उसका उद्देश्य स्वार्थ नहीं, कृष्ण की प्रसन्नता होती है। ऐसा व्यक्ति न किसी से द्वेष करता है, न किसी से आसक्ति रखता है; सबको भगवान का अंश समझकर सेवा भाव रखता है। उसकी चेतना शुद्ध होती है, मन और इंद्रियाँ संयमित रहते हैं, और उसका हर कार्य भगवान से जुड़ा होता है।
कृष्णभावनामृत में किया गया प्रत्येक कर्म जल में खिले कमल के समान है — संसार के बीच रहकर भी संसार से अछूता। शरीर, मन, वाणी, बुद्धि और इंद्रियों से किया गया प्रत्येक कार्य जब “कृष्ण के लिए” होता है, तो वह कर्म नहीं, भक्ति बन जाता है।
इस अवस्था में व्यक्ति कर्मों से नहीं बँधता, क्योंकि वह स्वयं को शरीर नहीं, भगवान का दास मानता है। उसके लिए सब कुछ कृष्ण की संपत्ति है, और इसलिए उसका जीवन पूर्ण त्याग और पूर्ण भक्ति का अद्भुत संगम बन जाता है। यही वास्तविक संन्यास है — जहाँ कर्म है, परंतु अहंकार नहीं; संसार है, परंतु आसक्ति नहीं; और हर श्वास में केवल भगवान की सेवा का भाव है।
इस उपदेश का सार यह है कि जब मनुष्य अपने समस्त कर्मों के फल भगवान को समर्पित करता है और उनके साथ एकात्म भाव से जुड़ जाता है, तभी उसे वास्तविक शांति प्राप्त होती है। जो व्यक्ति कर्म के फल में आसक्त रहता है, वह सदा चिंता, द्वन्द्व और मोह में फँसा रहता है।
भक्ति में स्थित आत्मा यह जानती है कि वह केवल भगवान की इच्छा का उपकरण है — वह न कुछ करता है, न किसी से करवाता है, क्योंकि सब कुछ प्रकृति के गुणों द्वारा होता है। जब यह समझ जागती है, तब वह अपने “नौ द्वारों वाले नगर” यानी शरीर में रहते हुए भी मुक्त रहता है।
अविद्या (अज्ञान) ही सभी बंधनों का कारण है। भगवान किसी के पाप या पुण्य के लिए उत्तरदायी नहीं होते; जीव स्वयं अपनी इच्छाओं से कर्मों में फँसता है। पर जब वही जीव भगवान की इच्छा में अपनी इच्छा मिला देता है, तो उसका सारा जीवन शुद्ध हो जाता है।
ज्ञान का असली प्रकाश तब प्रकट होता है जब जीव किसी प्रामाणिक गुरु की शरण में जाकर भगवान की सेवा में लग जाता है। तब अज्ञान उसी तरह मिट जाता है जैसे सूर्य के उदय से अंधकार। ऐसा ज्ञान केवल दर्शन नहीं, बल्कि अनुभव है — कि “मैं भगवान का दास हूँ और यह सम्पूर्ण सृष्टि उन्हीं की है।” यही समझ स्थायी शांति, स्वतंत्रता और परम सुख का वास्तविक आधार है।
इस शिक्षाओं का सार यह है कि जब मनुष्य की बुद्धि, मन, श्रद्धा और संपूर्ण शरणागति भगवान में स्थिर हो जाती है, तब वह परम सत्य को जानकर संशयों से मुक्त हो जाता है और सीधे मोक्ष के मार्ग पर बढ़ता है। भगवान ही परम तत्त्व हैं — वही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में एक ही सत्य के विभिन्न रूप हैं। जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में लीन है, वह समझता है कि सब कुछ उन्हीं से उत्पन्न है और उन्हीं में स्थित है। ऐसा ज्ञान उसे अद्वैत के भ्रम से निकालकर सच्ची एकता — भक्ति और संबंध की एकता — तक पहुँचाता है।
जब यह समझ पक्की हो जाती है, तो मन में कोई द्वेष, भेदभाव या असमानता नहीं रहती। ब्राह्मण, गाय, कुत्ता या चांडाल — सभी में परमात्मा का ही अंश देखा जाता है। यह समदर्शिता आत्म-साक्षात्कार की निशानी है। जो मनुष्य राग-द्वेष से मुक्त होकर समान दृष्टि रखता है, वह जन्म और मृत्यु के चक्र से ऊपर उठ जाता है और ब्रह्म में स्थित हो जाता है।
ऐसा ज्ञानी व्यक्ति सुख-दुख, लाभ-हानि या मान-अपमान में कभी विचलित नहीं होता। वह जानता है कि वह यह शरीर नहीं, बल्कि भगवान का अंश है — इसलिए वह स्थिरबुद्धि होकर संसार के उतार-चढ़ाव से अप्रभावित रहता है। यही स्थिर चेतना ही कृष्णभावनामृत या ब्रह्म-साक्षात्कार की अवस्था है।
इस अवस्था में व्यक्ति बाहरी सुखों में नहीं, बल्कि अपने भीतर के आनंद में लीन रहता है। वह भगवान के चरणों में नित्य नवीन रस का अनुभव करता है, और भौतिक विषय-सुख के प्रति उसकी रुचि स्वतः समाप्त हो जाती है। जैसे श्री यामुनाचार्य ने कहा — जब से मेरा मन कृष्ण के चरणों में लीन हुआ है, तब से सांसारिक सुख की स्मृति मात्र भी मुझे अरुचिकर लगती है।
अतः यह समझना ही वास्तविक मुक्ति है — जब आत्मा भगवान में शरण लेकर उनसे जुड़ जाती है, तब बाहरी जगत की समस्त विषमता, कामना और मोह स्वतः समाप्त हो जाते हैं, और वह आत्मा शाश्वत शांति और असीम आनंद में स्थित हो जाती है।
इस शिक्षाओं का सार यह है कि भौतिक इन्द्रियों के संसर्ग से मिलने वाले सुख अस्थायी और सीमित हैं; उनका आदि और अंत होता है, इसलिए ज्ञानी व्यक्ति उनमें आनंद नहीं लेता। वह जानता है कि ऐसे सुख केवल शरीर के स्तर पर हैं, आत्मा के नहीं। सच्चा सुख भीतर से आता है, जब आत्मा भगवान के साथ अपने संबंध को पहचानती है और भक्ति में लीन होती है।
जो व्यक्ति अपने मन और इन्द्रियों को वश में रखता है, इच्छा और क्रोध के वेग को जीत लेता है, वही आत्म-साक्षात्कार की दिशा में स्थिर रहता है। यह संयम केवल त्याग से नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम से संभव होता है। जब मन कृष्ण में स्थिर हो जाता है, तो वह बाहरी आकर्षणों से अप्रभावित होकर भीतर के सुख — दिव्य आनंद — का अनुभव करने लगता है। यही ब्रह्मभूत या मुक्ति की अवस्था है, जहाँ व्यक्ति आत्मा की स्थिति में स्थित होकर परमेश्वर के साथ जीवंत संबंध में प्रवेश करता है।
ऐसा योगी न तो भौतिक सुखों में उलझता है, न दूसरों से द्वेष रखता है; उसका जीवन सभी जीवों के कल्याण के लिए समर्पित होता है, क्योंकि वह जानता है कि सबके मूल में भगवान ही हैं। वह सच्चा परोपकारी है जो मनुष्यों को ईश्वर-स्मरण की ओर प्रेरित करता है — यही वास्तविक कल्याण है।
जब व्यक्ति क्रोध, लोभ और इच्छाओं से मुक्त होकर निरंतर भगवान की सेवा में प्रयत्नशील रहता है, तब वह शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त करता है। भक्त का ध्यान, उसकी दृष्टि और उसका स्मरण — सब कुछ भगवान में एकाग्र हो जाता है। जैसे मछली, कछुआ और पक्षी अपने बच्चों का पालन केवल दृष्टि, ध्यान और स्पर्श से करते हैं, वैसे ही भगवान अपने भक्त का पोषण केवल उसके प्रेममय स्मरण से करते हैं। यही अवस्था ब्रह्मनिर्वाण की है — वह पूर्ण शांति, जहाँ आत्मा निरंतर भगवान में लीन होकर संसार के सारे दुःखों से परे हो जाती है।
इस शिक्षाओं का सार यह है कि जब मनुष्य अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में करके उन्हें परमेश्वर पर केंद्रित करता है, तब वह इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त होकर दिव्य शांति को प्राप्त करता है। अष्टांग योग की विधि — इन्द्रियविषयों से मन को हटाना, दृष्टि को दोनों भौंहों के मध्य एकाग्र करना, श्वास को नियंत्रित करना — यह सब आत्म-नियंत्रण और अंतर्मुखता की तैयारी है, जिसका अंतिम लक्ष्य है परमेश्वर में स्थिर चेतना।
किन्तु इन योग साधनों का सार कृष्णभावनामृत में सहज रूप से प्रकट होता है। जो व्यक्ति भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति में लीन है, उसके भीतर स्वतः ही इन्द्रियों का संयम, मन की स्थिरता और चेतना की पवित्रता प्रकट होती है। उसे योग के कृत्रिम अभ्यास की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि उसकी समस्त ऊर्जा, भावना और दृष्टि भगवान में विलीन हो जाती है।
वास्तविक शांति तब आती है जब व्यक्ति यह जान लेता है कि भगवान ही समस्त कर्मों, यज्ञों और तपस्याओं के परम भोक्ता हैं, सभी लोकों और देवताओं के स्वामी हैं, और सभी जीवों के परम उपकारक और शुभचिंतक हैं। यह बोध होते ही जीव का अहंकार, प्रतिस्पर्धा और स्वामित्व का भाव समाप्त हो जाता है — तब न कोई भय रहता है, न कोई लालसा।
कृष्णभावनामृत ही कर्मयोग की परिपूर्णता है — इसमें व्यक्ति संसार में रहकर भी आध्यात्मिक रूप से जीता है। जब कर्म भगवान को समर्पित होकर किया जाता है, तो वही मुक्ति का द्वार बन जाता है। इस भक्ति में न केवल अष्टांग योग के सभी सिद्धांत निहित हैं, बल्कि उससे भी ऊँची वह अवस्था है जिसमें आत्मा सदा भगवान में लीन होकर दिव्य शांति और ब्रह्मनिर्वाण का अनुभव करती है। यही जीवन की परम सिद्धि है — जब मनुष्य समझ लेता है कि भगवान ही अंतिम सत्य, अंतिम लक्ष्य और अंतिम शरण हैं।
All glories to Srila Prabhupada 🙏
Hare Krishna 🙏
Comments
Post a Comment