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हरे कृष्ण। भगवान सर्वत्र हैं, कण-कण में हैं। इस दुनिया में कहीं कोई ऐसी जगह नहीं जहां किसी ने भगवान के विषय में ना सुना हो। यहां तक ​​कि एथिस्ट जो कहते हैं कि भगवान भगवान कुछ नहीं हैं। भगवान है ही नहीं. उनके मंडल में भी सबसे प्रसिद्ध जो विषय होता है, जो विषय होता है उसकी चर्चा भगवान के रूप में होती है। तो कोई नहीं कह सकता कि वह भगवान के बारे में नहीं सुन सकता। यहां तक ​​कि अफ्रीका के सुदूरवर्ती इलाकों में भी जो आदिवासी हैं, आदिवासी इलाके हैं, वहां भी भगवान की एक उच्च शक्ति की अवधारणा है। वे सूर्य की पूजा कर सकते हैं। पहाड़ों की पूजा कर सकते हैं। समुद्र की आकाश की पूजा कर सकते हैं । लेकिन यह धारणा हर जगह है कि एक उच्च एक श्रेष्ठ शक्ति है जो पूरे संसार को चलाती है, नियंत्रित करती है। और उसके कुछ नियम होते हैं कि क्या करना है, क्या नहीं, क्या करने से वे प्रसन्न हो जाते हैं और क्या करने से उग्र हो जाते हैं, क्रोधित हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ दिखाया गया है। सभी फिल्मों का रिकॉर्ड तोड़ने वाली एक हफ्ते में ही 500 करोड़ की कमाई करने वाली फिल्म कांटारा में। हम कोई फिल्म क्रिटिक नहीं। लेकिन फिल्में केवल मनोरंजन तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि एक ऐसा उत्पाद है जिसमें कोई भी सकारात्मक या नकारात्मक भावनाएं होती हैं जो बहुत बड़ी संख्या में बड़ी आसानी से पाई जाती हैं। से पूरी दुनिया में पहुंचाया जा सकता है। यह लोगों के जीवन को उनके विचारों को बहुत ही गहराई से प्रभावित करती है और यही हुआ है इसलिए हर तरफ इसकी बात हो रही है और समाज से अछूते हम भी नहीं। हमने भी देखा कि ऐसा क्या है जो लोग इतने प्रभावित हैं? तो जैसा कि हमने अभी बताया फिल्म में बहुत ही स्ट्रांग मैसेज यह दिया गया है कि इंसान चाहे किसी भी जाति और वर्ग का हो उसकी श्रद्धा समर्पण और भगवान पर उसका विश्वास उसकी हर संकट से उसकी रक्षा करता है। फिर चाहे भगवान का रूप कोई भी हो। क्योंकि उन भगवान का एक नाम है भक्तवत्सल जो अपने भक्त की सदैव रक्षा करते हैं। हालांकि फिल्म में जो दैव दिखाए गए हैं वे कर्नाटक, केरल यानी भारत के दक्षिण भाग के राज्यों में ही प्रमुखतया होते हैं। जिनमें भैरव, गुलगा, अनप्पा, पंजुरली और बब्बू स्वामी शक्तियां होती हैं। उत्तराखंड में भी किनहीं-कहीं स्थानों में यह पूजा प्रचलन में होती हैं। जहां देव और देवी के कुछ रूपों की लोकल्स पूजा करते हैं। उनके भी भिन्न-भिन्न नाम होते हैं। जिनमें भैरव, नाग देवता, नाग बाबा, माता ये सभी होते हैं। और ये सभी शिवजी और माता पार्वती के भक्त, उनके पार्षद उनके अनुचर होते हैं और उनके ही द्वारा लोगों की सहायता करते हैं। उनकी शक्ति उन्हें मिलती है। श्रीमद्भागवतम के तीसरे स्कंध में 12वें अध्याय में 141 श्लोकों में इनका वर्णन है। यह देवी देवता नहीं हैं। दैव हैं। यह देवताओं के सेवक के रूप में होते हैं। इनके पास भी शक्ति होती है। किंतु देवता जैसे इंद्र, चंद्र, वरुण ये जो होते हैं यह सृष्टि के पूरी सृष्टि के कार्यों को संभालते हैं। तो जो दैव हैं उनकी भी शक्ति होती है किंतु सीमित मनुष्यों से ज्यादा किंतु देवताओं से कम। और जैसे लोग अलग-अलग देवताओं को अलग-अलग तरह से पूजा जाता है तो वैसे ही इनकी यानी देव की इनकी पूजा का भी भिन्न प्रकार है। भगवत गीता में आता है यजंते सात्विका देवान यक्ष रक्षसी राजसा प्रेतान भूत गणाश चाप्य यजंते तामसा जना यह श्लोक व्यक्ति के स्वभाव और गुणों के अनुसार उनकी पूजा पद्धति को दर्शाता है। तो इसमें कांतारा में जो पूजा अर्चना दिखाई गई है वह तमोगुणी है। हम सभी लोग तीन गुणों में तीन अलग-अलग गुणों में होते हैं जिसमें जिस गुण की अधिकता या न्यूनता होती है उसी के अनुसार उस व्यक्ति का स्वभाव होता है। उसके कार्य होते हैं उसके गुण होते हैं। और क्योंकि यह देव शिव जी के अनुचर हैं जो कि तमोगुण के अधिष्ठाता देव हैं, देव हैं। इसीलिए उनके अनुचर भी उसी गुण और रूप के होते हैं। उनकी वैसी ही पूजा पद्धति होती है जो थोड़ा हमारे लिए यूनिक होती है। लेकिन जैसा कि हमने बताया कि इनकी शक्ति सीमित होती है। तो कुछ विशेष स्थान जहां के ये देवता हैं, क्षेत्रपाल हैं, ग्रामदेव, कुल देवता हैं, वहां इनकी शक्ति कार्य करती है। जैसे कि उस क्षेत्र में बाढ़ ना आए, कोई बीमारी ना आ जाए। बच्चों को कोई कष्ट ना हो। परिवार में कोई झगड़ा हो गया हो तो उसका हल निकालना है तो सारे गांव वाले सारे परिवार वाले मिलकर उनसे प्रार्थना करते हैं और वो देव उनकी रक्षा करते हैं जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है। पर हर जगह नहीं यह कुछ ऐसा होता है जैसे एक राज्य के मुख्यमंत्री के ऑर्डर दूसरे राज्य में काम नहीं करेंगे। हमारे देश के प्रधानमंत्री बहुत शक्तिशाली हैं। लेकिन उनकी शक्ति पाकिस्तान में या अमेरिका में नहीं चलेगी। इसी तरह दैव शक्तिशाली हैं लेकिन देवताओं की तरह नहीं। इंद्र, चंद्र, वरुण और सूर्य की तरह नहीं। उनकी उतनी शक्ति दूसरी जगह नहीं चलेगी क्योंकि वह उस स्थान विशेष के दैव हैं, रक्षक हैं। वहीं निवास करते हैं। और इस पर विश्वास को कांतारा मूवी में बहुत अच्छी तरह से दिखाया गया है। तो वहीं सभी देवी देवता चाहे इंद्र हो, चंद्र हो या वरुण। यहां तक कि सृष्टि रचयिता ब्रह्मा जी और स्वयं महादेव शिव जी भी जिनकी आराधना करते हैं वे स्वयं भगवान श्री कृष्ण जिनकी सत्ता पूरी सृष्टि में चलती है। तीनों लोकों में भौतिक या आध्यात्मिक जगत हर कहीं स्वर्ग हो या नर्क इस संसार में चाहे अमेरिका हो, रूस हो या फिर चीन हर जगह यदि आपने उनसे संबंध बना लिया तो फिर आप दुनिया के किसी भी कोने में हो आप उनकी और हर जगह की रक्षा के लिए जरूर आएं। और अंत में फिर एक बार दोबारा रिपीट किया जाएगा कि फिल्म में जांच और प्रयोगशाला के संदेश का स्ट्रांग माध्यम है। जैसा कि अभी कुछ समय पहले ही हमने देखा था कि महावतार नरसिम्हा को देखकर सभी में जागृत भक्ति आ गई है और अब आई है कंतारा जिससे सभी अपने-अपने दैव अपने भगवान के विषय में बात तो करने लगे हैं । वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग हैं, कुछ ऐसी फिल्में भी आती हैं जिनमें हमारे सनातन धर्म और देवी देवताओं का मजाक उड़ाया जाता है । क़ैद नैरेटिव्स सेट किये जाते हैं। संवाद से किया जाता है। तो हमें यह याद रखना चाहिए कि दो तरह के लोग दुनिया में हमेशा ही बने रहें। लेकिन ये बहुत ही बड़ी और बहुत ही खुशी और गर्व की बात है हम सभी के लिए कि आज फिल्म इंडस्ट्री में भी लोग हमारी सनातन संस्कृति को हमारे कल्चर को बहुत ही प्राउडली रिस्पेक्टफुली और लार्जर डेन लाइफ के स्कैलप पर टॉक की मिस्टेक कर रहे हैं। इसलिए ऐसी संभावना और भावना वाले सभी लोगों को हमारी बहुत-बहुत शुभेच्छा। धन्यवाद। हरे कृष्ण

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