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कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपना पृथ्वी पर का कार्य पूर्ण किया, तो अर्जुन उनसे मिलने और उनके आगामी कार्यों के विषय में जानने के लिए द्वारका गए। परंतु कुछ महीनों तक अर्जुन के न लौटने पर महाराज युधिष्ठिर चिंतित हो उठे। उन्हें राज्य में अशुभ लक्षण दिखाई देने लगे — ऋतुओं की अव्यवस्था, लोगों में लोभ, क्रोध, कपट और अनैतिक आचरण का प्रसार।

धर्म और सत्य के युग में ऐसे परिवर्तन असामान्य थे। युधिष्ठिर समझ गए कि ये सब संकेत भगवान के पृथ्वी से अंतर्धान होने के हैं, क्योंकि उनकी उपस्थिति में ही समस्त धर्म, ज्ञान और शांति का प्रकाश रहता है। जैसे सूर्य के अस्त होते ही अंधकार फैल जाता है, वैसे ही भगवान के प्रस्थान के साथ अधर्म और अज्ञान बढ़ने लगा।

समाज में ईमानदारी, पारिवारिक प्रेम और सच्चा व्यवहार लुप्त होने लगा। पिता-पुत्र, भाई-भाई, पति-पत्नी, यहाँ तक कि मित्रों के बीच भी अविश्वास और कलह बढ़ गई। मनुष्य की बुद्धि स्वार्थ, अहंकार और पाखंड से ग्रस्त हो गई।

महाराज युधिष्ठिर जैसे धर्मनिष्ठ राजा के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक थी। वे समझ गए कि यह सब भगवान की अनुपस्थिति का परिणाम है — और इसी से कलियुग के अंधकारमय युग का प्रारंभ हुआ।

महाराज युधिष्ठिर अर्जुन की लंबी अनुपस्थिति से चिंतित थे, क्योंकि उन्होंने उसे भगवान श्रीकृष्ण से मिलने और उनके आगामी कार्यों के विषय में जानने के लिए द्वारका भेजा था। सात महीने बीत चुके थे, पर अर्जुन वापस नहीं आया, इसलिए उन्हें यह आशंका हुई कि कहीं वह समय तो नहीं आ गया जब भगवान अपनी लीलाओं का समापन करने वाले हैं, जैसा कि देवर्षि नारद ने पहले संकेत दिया था।

वे समझते थे कि जो भी ऐश्वर्य, शक्ति, समृद्धि, उत्तम परिवार, शत्रुओं पर विजय और उच्च पद उन्हें प्राप्त हुआ है — वह सब भगवान की अहैतुकी कृपा का परिणाम है। उन्होंने स्वीकार किया कि किसी भी मनुष्य की सफलता केवल उसके परिश्रम से नहीं, बल्कि भगवान के आशीर्वाद से ही संभव होती है।

फिर उन्होंने अपने भाई भीम से कहा कि आकाशीय प्रभावों, सांसारिक प्रतिक्रियाओं और शरीर की पीड़ाओं के कारण अनेक भयंकर दुख सामने आ रहे हैं। ये सब आसन्न संकट का संकेत दे रहे हैं, मानो आने वाला समय भ्रम और कष्ट से भरा हो।

महाराज युधिष्ठिर के इन विचारों से स्पष्ट होता है कि वे गहराई से अनुभवी और भगवान के प्रति पूर्ण रूप से कृतज्ञ राजा थे। उन्हें यह भलीभांति ज्ञात था कि जब समाज में धर्म, ऋतुओं की व्यवस्था और मानव आचरण में असंतुलन आने लगता है, तो यह ईश्वरीय संरक्षण के लुप्त होने का संकेत है — और ऐसे समय में केवल भगवान की शरण ही एकमात्र आश्रय है।

महाराज युधिष्ठिर अपने चारों ओर अशुभ संकेत देखकर अत्यंत व्याकुल हो उठे। उनके शरीर का बायाँ भाग लगातार काँप रहा था, दिल तेज़ धड़क रहा था — यह आने वाले किसी बड़े अनर्थ का संकेत था। उन्होंने देखा कि सियार अग्नि उगल रहे हैं, कुत्ते निर्भय होकर उन पर भौंक रहे हैं, और गायें व गधे भी असामान्य व्यवहार कर रहे हैं। पक्षियों की चीखें और प्रकृति की विक्षिप्त दशा — जैसे आकाश में धुआँ, बिजली, और पृथ्वी का कंपन — सब यह दर्शा रहे थे कि कोई महापरिवर्तन होने वाला है।

इन घटनाओं से युधिष्ठिर को गहराई से अनुभव हुआ कि यह सब किसी साधारण घटना का परिणाम नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से अंतर्धान का संकेत है। जैसे जंगल की आग को कोई मानवीय प्रयास नहीं बुझा सकता, वैसे ही इन विपत्तियों को केवल भगवान की कृपा से ही शांत किया जा सकता है। यह दृश्य भगवान की अनुपस्थिति से उत्पन्न आध्यात्मिक रिक्तता और संसार के धर्महीन युग में प्रवेश का सूचक था।

महाराज युधिष्ठिर ने देखा कि पूरा वातावरण भयावह हो उठा है — हवाएँ तेज़ी से चल रही हैं, धूल के गुबार छा गए हैं, सूर्य की रोशनी म्लान पड़ गई है और चारों ओर अंधकार का साम्राज्य है। बादल गर्जन और बिजली के साथ विनाश की चेतावनी दे रहे हैं। नदियाँ, झीलें और जलाशय अस्थिर हैं, जैसे स्वयं प्रकृति बेचैन हो उठी हो।

गायें, बछड़े और बैल भी उदास हैं — दूध देना बंद हो गया है, उनकी आँखों से आँसू बह रहे हैं। मंदिरों में देवता जैसे विलाप कर रहे हों, मूर्तियों से पसीना बह रहा है और दिव्यता का तेज़ लुप्त हो रहा है। नगर, गाँव, बगीचे और आश्रम सब अपनी सुंदरता और शांति खो चुके हैं।

युधिष्ठिर समझ गए कि ये सब साधारण परिवर्तन नहीं हैं — यह संकेत है कि भगवान श्रीकृष्ण, जो पृथ्वी की रक्षा और धर्म की ज्योति थे, अब अपने धाम को लौटने वाले हैं। उनके प्रस्थान के साथ ही संसार से शुभता, समृद्धि और धर्म का प्रकाश धीरे-धीरे विदा हो रहा है।

महाराज युधिष्ठिर ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रकृति के इन अशुभ संकेतों से संसार के सौभाग्य की हानि का सूचक मिल रहा है — वह सौभाग्य जो केवल भगवान श्रीकृष्ण के चरण-कमलों की उपस्थिति से संभव था। जब पृथ्वी पर उनके चरणों के चिह्न थे, तब सब कुछ शुभ, पवित्र और समृद्ध था; अब वह दिव्यता मानो लुप्त हो रही थी।

इसी बीच, अर्जुन द्वारका से लौटे — लेकिन उनका मुखमंडल दुःख और निराशा से झुका हुआ था। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, और वे मौन, पीले और विचलित दिखाई दे रहे थे। यह देखकर युधिष्ठिर का हृदय काँप उठा।

नारद मुनि के पूर्व संकेत को याद करते हुए, उन्होंने अर्जुन से धीरे से पूछा — क्या यदुवंशी, जो भगवान श्रीकृष्ण के सगे संबंधी और भक्त थे, सब कुशल हैं? क्या मधु, भोज, सात्वत, अंधक और दशार्ह वंशज अब भी आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे हैं?

राजा के इन प्रश्नों में भय, श्रद्धा और गहरा प्रेम झलक रहा था — क्योंकि वे समझ रहे थे कि अर्जुन की यह मौन व्यथा केवल एक ही बात कह रही है: संसार अब अपने सबसे बड़े रक्षक और मित्र, भगवान श्रीकृष्ण, को खो चुका है।

महाराज युधिष्ठिर अपने हृदय में गहरी चिंता से भरे हुए थे। उन्हें लगा कि संसार का यह अशुभ समय किसी बड़ी हानि — विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण के अंतर्धान — का संकेत दे रहा है। पृथ्वी तब तक सौभाग्यशाली थी जब तक उस पर श्रीकृष्ण के चरण-कमलों के चिह्न विद्यमान थे, किंतु अब वे निशान जैसे मिटते प्रतीत हो रहे थे, जिससे संसार की समृद्धि और शुभता भी विदा हो रही थी।

इसी चिंतन के बीच अर्जुन द्वारका से लौटे, पर उनकी अवस्था असामान्य थी — मुख म्लान, नेत्रों में आँसू, शरीर झुका हुआ और मन स्पष्ट रूप से व्यथित। यह देखकर युधिष्ठिर ने तुरंत समझ लिया कि कुछ अत्यंत गंभीर घट चुका है।

उन्होंने अर्जुन से स्नेहपूर्वक पूछा कि क्या यदुवंशी सब कुशल हैं — शूरसेन, वसुदेव, देवकी और उनकी सातों पत्नियाँ, उनके पुत्र-पौत्र, उग्रसेन, अक्रूर, कृतवर्मा, गद, सारण, बलराम और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के अंश प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — क्या सब सुरक्षित और सुखी हैं?

उनके ये प्रश्न केवल समाचार के लिए नहीं थे, बल्कि यह उनके प्रेम, श्रद्धा और भय का मिश्रण था। वे जान रहे थे कि यदि इन सभी महान आत्माओं का अस्तित्व पृथ्वी से समाप्त हो रहा है, तो वह युग भी समाप्त हो रहा है जिसमें धर्म, सौंदर्य और दिव्यता स्वयं श्रीकृष्ण के चरणों से प्रकाशित होती थी।

महाराज युधिष्ठिर का हृदय भगवान और उनके भक्तों के प्रति प्रेम से भरा था। उन्होंने श्रुतदेव, उद्धव, नंद, सुनंद और अन्य मुक्त आत्माओं के विषय में पूछा — वे सभी जो भगवान बलराम और श्रीकृष्ण के नित्य साथी हैं और सदा उनके दिव्य कार्यों में संलग्न रहते हैं। युधिष्ठिर जानना चाहते थे कि क्या वे सब कुशलपूर्वक भगवान की सेवा में लगे हैं और क्या वे अब भी पांडवों को अपने स्नेह से स्मरण करते हैं।

यह बताया गया है कि भगवान के ये नित्य साथी भी मुक्त आत्माएँ हैं, जो समय-समय पर भगवान के साथ उनकी लीलाओं में भाग लेने के लिए अवतरित होते हैं। यद्यपि वे पूर्णतः स्वतंत्र हैं, फिर भी वे सदैव भगवान की सुरक्षा पर निर्भर रहते हैं, जैसे चिंगारी अपनी चमक के लिए अग्नि पर निर्भर रहती है। इसी में वास्तविक स्वतंत्रता और मुक्ति है।

युधिष्ठिर ने फिर भगवान श्रीकृष्ण के विषय में पूछा — जो गौओं, ब्राह्मणों और इंद्रियों को प्रसन्न करने वाले गोविंद हैं, जो भक्तवत्सल हैं और द्वारका में पुण्यात्माओं से घिरे रहते हैं। भगवान का निवास वहीं होता है जहाँ भक्त उनका गुणगान करते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि भगवान बलराम और श्रीकृष्ण यदुवंश रूपी सागर में निवास कर ब्रह्माण्ड की रक्षा कर रहे हैं, और उनके साथ यदुवंशी ऐसे सुखी हैं जैसे वैकुंठ के निवासी, जो जन्म, मृत्यु और दुख से परे रहते हैं।

अंत में उन्होंने द्वारका की रानियों — विशेषकर सत्यभामा — का उल्लेख किया, जिन्होंने प्रेम और भक्ति से भगवान की सेवा की। सत्यभामा के अनुरोध पर भगवान स्वर्ग से पारिजात पुष्प लाए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भगवान अपने भक्तों के प्रेम को कितना आदर देते हैं। यह सब दिखाता है कि द्वारका कोई सामान्य नगरी नहीं थी — वह स्वयं वैकुंठ का विस्तार थी, जहाँ हर जीव भगवान की संगति में आनंदमय सेवा करता था।

महाराज युधिष्ठिर ने अर्जुन के उदास चेहरे और क्षीण कांति देखकर गहराई से चिंता व्यक्त की। उन्होंने समझ लिया कि कुछ असाधारण घटित हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण की भुजाओं से सुरक्षित यदुवंशी कभी भय नहीं जानते थे — वे निर्भय होकर सुधर्मा सभा जैसी दिव्य वस्तुएँ भी पृथ्वी पर लाए थे। परंतु अब जब अर्जुन का तेज लुप्त हो गया था, युधिष्ठिर के हृदय में अनिश्चितता घर कर गई।

उन्होंने प्रेमपूर्वक पूछा कि क्या अर्जुन को किसी ने अपमानित किया है, किसी ने धमकाया या कठोर वचन कहे हैं, या क्या वह किसी याचक को दान देने में असमर्थ रहे हैं। क्या उन्होंने किसी से किया वादा निभाने में चूक की, या किसी असहाय — जैसे ब्राह्मण, बालक, स्त्री, गाय या रोगी — को सुरक्षा देने में असफल रहे?

राजा ने यह भी जानना चाहा कि कहीं उन्होंने किसी अनुचित स्त्री से संबंध तो नहीं रखा, या किसी योग्य स्त्री का अनादर तो नहीं किया, या किसी समान या निम्न प्रतिद्वंदी से पराजित तो नहीं हुए। युधिष्ठिर का ये सारे प्रश्न किसी आरोप के भाव से नहीं, बल्कि करुणा और भ्रातृभाव से भरे हुए थे।

वे समझ चुके थे कि अर्जुन की यह व्यथा किसी सांसारिक असफलता से नहीं, बल्कि एक दिव्य वियोग से उपजी है — संभवतः उस वियोग से, जो भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से अंतर्धान के कारण समस्त भक्तों के हृदय को शून्य बना गया था।

महाराज युधिष्ठिर ने अर्जुन से अत्यंत करुणा के साथ पूछा कि क्या उन्होंने गृहस्थ धर्म की किसी मर्यादा का उल्लंघन किया है — क्या उन्होंने कभी वृद्धों, बच्चों या अतिथियों को भोजन कराए बिना स्वयं खा लिया, या किसी असहाय को अनदेखा कर दिया? क्योंकि एक गृहस्थ का धर्म है कि वह पहले दूसरों का पोषण करे, फिर स्वयं भोजन करे। ऐसी उपेक्षा घोर दोष मानी जाती है।

फिर भी, युधिष्ठिर समझ रहे थे कि अर्जुन की व्यथा किसी सामान्य गलती या सामाजिक घटना से नहीं है। उन्होंने धीरे से कहा कि शायद यह दुःख किसी गहरी शून्यता का परिणाम है — उस मित्र के वियोग का, जो उनके जीवन का केंद्र था। वे जानते थे कि अर्जुन का यह दुख केवल एक ही कारण से हो सकता है — भगवान श्रीकृष्ण के अंतर्धान से, जिनकी उपस्थिति से समस्त संसार प्रकाशित था, और जिनके जाने से अर्जुन का हृदय रिक्त हो गया था।

All glories to Srila Prabhupada 🙏 
Hare Krishna 🙏 

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