Skand 1 adhyay 5
इस प्रसंग का सार यह है कि देवर्षि नारद, जो व्यासदेव की आत्मा को भली-भाँति जानते थे, मुस्कुराते हुए उनके भीतर की अधूरी तृप्ति को समझ गए। व्यासदेव ने वेद, उपनिषद्, महाभारत और वेदान्त-सूत्र जैसे गूढ़ ग्रंथों की रचना की थी, परंतु फिर भी उनके हृदय में शांति नहीं थी। नारद ने जान लिया कि यह असंतोष ज्ञान की कमी से नहीं, बल्कि भक्ति के तत्व के अभाव से उत्पन्न हुआ था।
व्यासदेव ने आत्मा और ब्रह्म के निराकार पक्ष का तो सुंदर विवेचन किया था, लेकिन उन्होंने भगवान की व्यक्तिगत भक्ति, प्रेम और उनके नाम, रूप, लीलाओं की महिमा को पर्याप्त रूप से प्रकट नहीं किया। नारद का प्रश्न — “क्या आप शरीर या मन को ही आत्मा मानकर संतुष्ट हैं?” — इसी बात का संकेत था कि व्यासदेव ने अभी तक आत्मा के वास्तविक आनंद, अर्थात् भगवान के साथ प्रेमपूर्ण संबंध, को पूर्ण रूप से नहीं दिखाया था।
व्यासदेव की यह बेचैनी भौतिक नहीं थी; यह उस संत का आंतरिक शून्य था जिसने सब कुछ जान लिया, पर अभी तक “भगवान के प्रति भक्ति” को साकार रूप में नहीं प्रस्तुत किया। इसलिए उन्होंने नारद से विनम्रतापूर्वक अपने असंतोष का कारण पूछा। वे जानते थे कि नारद, जो स्वयं ब्रह्मा के पुत्र हैं और दिव्य ज्ञान में पूर्ण हैं, उन्हें उस मार्ग की ओर निर्देशित कर सकते हैं जो केवल ज्ञान नहीं, बल्कि प्रेममय भक्ति से उत्पन्न आत्म-संतोष देता है।
यह प्रसंग यह सिखाता है कि केवल विद्या, तर्क या ग्रंथ-ज्ञान आत्मा को संतुष्ट नहीं कर सकता — भक्ति ही आत्मा की तृप्ति का मूल कारण है। ज्ञान तब तक अधूरा है जब तक वह भगवान की प्रेममयी सेवा की ओर नहीं ले जाता।
इस प्रसंग का सार यह है कि नारद मुनि ने व्यासदेव को यह समझाया कि उनकी असंतुष्टि का कारण ज्ञान या तप का अभाव नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति और उनकी महिमा के स्पष्ट वर्णन का अभाव है। यद्यपि व्यासदेव ने वेद, वेदान्त और महाभारत जैसे महान ग्रंथों की रचना की थी, उनमें मुख्य ध्यान धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर था — पर भगवान श्रीकृष्ण की व्यक्तिगत लीलाओं, करुणा और प्रेममयी भक्ति का पूर्ण महिमामंडन नहीं हुआ था। यही उनकी अंतःशून्यता का कारण बना।
नारद ने बताया कि केवल भगवान की महिमा का वर्णन ही ऐसा कार्य है जो आत्मा को संतुष्ट कर सकता है और संसार को पवित्र बना सकता है। अन्य सभी दर्शन, धर्म या साहित्य, चाहे वे कितने ही गूढ़ और विद्वत्तापूर्ण क्यों न हों, यदि वे भगवान की प्रेममयी लीलाओं और नाम की महिमा से रहित हैं, तो वे मृत शरीर की सजावट के समान हैं।
नारद ने यह भी कहा कि कौवे और हंसों की भाँति, मनुष्यों की रुचियाँ भी भिन्न होती हैं — सांसारिक विषयों में आसक्त लोग उन ग्रंथों में आनंद लेते हैं जो इन्द्रिय-सुख और भौतिक विचारों से भरे होते हैं, जबकि परमहंस, अर्थात् शुद्ध भक्त, केवल उस साहित्य में आनंद पाते हैं जिसमें भगवान की महिमा, उनके नाम, रूप और लीलाओं का वर्णन होता है।
इस प्रकार नारद का संदेश यह था कि व्यासदेव को अब ऐसा ग्रंथ रचना चाहिए जो वेदों के सार, भगवान की भक्ति के विज्ञान और उनकी दिव्य लीलाओं का जीवंत वर्णन करे — वही श्रीमद्भागवतम् होगा। यही ग्रंथ संसार के कलुष को दूर करेगा, आत्मा को संतोष देगा और व्यासदेव की अधूरी तृप्ति को पूर्णता में बदल देगा।
इस घटना का गूढ़ संदेश यह है कि सच्ची विद्या तब तक अधूरी है जब तक वह भगवान के प्रेम और भक्ति में परिणत न हो। ज्ञान का अंतिम फल भक्ति है — वही हृदय को पूर्ण शांति और आत्मा को वास्तविक आनंद प्रदान करती है।
इस शिक्षाओं का सार यह है कि ऐसा साहित्य ही वास्तविक और पवित्र होता है जो भगवान के नाम, रूप, यश और लीलाओं का वर्णन करता है। ऐसे दिव्य शब्द न केवल आत्मा को शुद्ध करते हैं, बल्कि संसार की कलुषित चेतना में क्रांति लाने की शक्ति रखते हैं। यद्यपि यह साहित्य अपूर्ण रूप से लिखा गया हो, यदि उसका उद्देश्य ईमानदारी से भगवान की महिमा का प्रचार करना है, तो वह शुद्ध हृदय वाले व्यक्तियों द्वारा स्वीकार और सराहा जाता है।
इसके विपरीत, जो साहित्य भगवान से असंबद्ध है — चाहे वह दार्शनिक, धार्मिक या सांसारिक क्यों न हो — वह केवल भ्रम, द्वन्द्व और अशांति उत्पन्न करता है। इसलिए नारद मुनि ने व्यासदेव को प्रेरित किया कि वे ऐसा ग्रंथ रचें जो मानवता को अज्ञान और भोग-विलास की अंधकारमय स्थिति से निकालकर भगवान की भक्ति और प्रेम की ओर ले जाए। यही उद्देश्य श्रीमद्भागवतम् का है — जो वेदों का सार, भगवान की लीलाओं का हृदय, और मानव जीवन का वास्तविक समाधान है।
भक्तिभाव से रचा गया ऐसा दिव्य साहित्य समाज के प्रदूषित वातावरण को शुद्ध कर सकता है और नेताओं तथा जनसाधारण दोनों के हृदयों में परिवर्तन ला सकता है। जैसे मिश्री पीलिया का एकमात्र उपचार है, वैसे ही श्रीमद्भागवतम् जैसे ग्रंथ मानवता की भोगवृत्ति और कलियुग के रोग का एकमात्र उपाय हैं।
अंततः नारद का संदेश यही है — जब तक साहित्य, कर्म या ज्ञान भगवान की भक्ति से नहीं जुड़ते, वे केवल भ्रम पैदा करते हैं। लेकिन जब वही कर्म, वही लेखन, वही विचार भगवान के प्रेम और सेवा में समर्पित हो जाते हैं, तब वे आत्मा को मुक्त करते हैं और संसार में वास्तविक शांति लाते हैं। यही श्रीमद्भागवतम् का मिशन है — “धर्मः प्रोज्झितकैतवः” — अर्थात् वह धर्म जो किसी स्वार्थ या दिखावे से रहित होकर केवल भगवान की शुद्ध भक्ति की ओर ले जाए।
इस शिक्षाओं का सार यह है कि भगवान असीम, सर्वशक्तिमान और समस्त सृष्टि के मूल हैं — वही सृष्टि के कारण, पालनकर्ता और संहारक हैं, फिर भी उनसे परे और स्वतंत्र हैं। केवल वे ही व्यक्ति जो भौतिक सुखों से विरक्त होकर आत्मा के स्वरूप को समझने के योग्य बनते हैं, इस दिव्य ज्ञान को ग्रहण कर सकते हैं। परंतु जो लोग अभी तक भौतिक आसक्ति में बँधे हैं, उनके लिए भगवान के नाम, रूप, यश और लीलाओं का श्रवण ही आत्म-साक्षात्कार का सर्वोत्तम मार्ग है।
नारद मुनि ने व्यासदेव को यह प्रेरणा दी कि वे ईश्वर की दिव्य लीलाओं और उनके प्रेमपूर्ण कार्यों का प्रत्यक्ष वर्णन करें, ताकि साधारण लोग भी सुनकर शुद्ध हो सकें। ऐसा साहित्य ही वास्तविक औषधि है — जो भोग-विलास में डूबी मानवता को आध्यात्मिक चेतना में जागृत कर सकता है। यही श्रीमद्भागवतम् का उद्देश्य है — भगवान का साहित्यिक अवतार बनकर संसार की चेतना को शुद्ध करना।
जो व्यक्ति भक्ति में प्रवेश करता है, वह चाहे कभी अस्थिर होकर गिर भी जाए, तो भी उसका पतन पूर्ण नहीं होता, क्योंकि जिसने एक बार भगवान के चरणों का रस चखा, वह उसे कभी भूल नहीं सकता। जैसे सूर्य की किरण को थोड़ी देर के लिए बादल ढक सकता है, वैसे ही भक्त का पतन अस्थायी होता है। भगवान स्वयं अपने भक्त को कठिनाइयों के माध्यम से फिर अपनी शरण में लौटा लेते हैं — क्योंकि वह उनका प्रिय पुत्र होता है, और उसका हर कष्ट भगवान की विशेष कृपा का संकेत होता है।
वास्तविक बुद्धिमान व्यक्ति उन कार्यों में समय नहीं गंवाता जो केवल अस्थायी भोग या पद प्रदान करते हैं, क्योंकि सभी लोक — स्वर्ग से लेकर पाताल तक — परिवर्तनशील हैं। सुख और दुख हर शरीर में हैं; मुक्ति केवल भगवान की शरण में है। जो इस सत्य को जान लेता है, वह उसी लक्ष्य के लिए प्रयत्न करता है जो जन्म-मरण से परे है — ईश्वर की शाश्वत सेवा।
अंततः नारद मुनि ने व्यासदेव को यही सिखाया कि भगवान ही परब्रह्म हैं — सगुण और निराकार दोनों स्वरूपों के अधिष्ठान। वे इस ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, परंतु उससे परे भी हैं। उनकी ऊर्जाएँ — आंतरिक, बाह्य और सीमांत — सब उन्हीं की हैं, और सभी उनके नियंत्रण में हैं। जीव भगवान की ऊर्जा का अंश है, समान नहीं। जो यह भेद समझकर प्रेमपूर्वक भगवान की सेवा में लग जाता है, वही वास्तव में शांत और सिद्ध होता है।
इसलिए, मनुष्य जीवन का उद्देश्य किसी लोक या पद की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने सृष्टिकर्ता भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पण है। यही भक्ति, यही पूर्णता, और यही स्थायी शांति का एकमात्र मार्ग है — वही संदेश श्रीमद्भागवतम् की आत्मा है।
इस शिक्षाओं का सार यह है कि भगवान श्रील व्यासदेव स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के शक्ति-अंशावतार हैं, जिन्होंने अपनी असीम कृपा से पतित जीवों को उठाने के लिए इस संसार में अवतार लिया। यद्यपि वे सर्वज्ञ और स्वाधीन हैं, फिर भी उन्होंने एक आचार्य के रूप में यह आदर्श स्थापित किया कि हर साधक को गुरु की शरण में जाकर भगवान की सेवा करनी चाहिए। इसी क्रम में नारद मुनि उनके गुरु के रूप में उपस्थित होकर उन्हें यह प्रेरणा देते हैं कि वे भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का विस्तार से वर्णन करें — क्योंकि यही भक्ति और आत्म-साक्षात्कार का वास्तविक मार्ग है।
नारद मुनि यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान, तप, यज्ञ, दान और कला का अंतिम उद्देश्य भगवान की महिमा का वर्णन करना है। जब विज्ञान, दर्शन, साहित्य, संगीत या किसी भी विद्या का उपयोग भगवान की सेवा में किया जाता है, तभी वह ज्ञान पवित्र और पूर्ण बनता है। जो ज्ञान भगवान की सेवा में नहीं लगाया जाता, वह वास्तव में अज्ञान है। अतः हर सच्चे विद्वान, कलाकार या वैज्ञानिक का कर्तव्य है कि वह अपने कौशल का उपयोग भगवान की दिव्य शक्ति और सृष्टि के गौरव को प्रकट करने में करे।
नारद अपने जीवन का उदाहरण देकर दिखाते हैं कि भक्ति किसी जन्म, कुल या शिक्षा की सीमा में नहीं बंधी। उन्होंने एक दासी के पुत्र के रूप में जन्म लेकर वेदान्तियों की सेवा की, और केवल एक बार उनके प्रसाद के अवशेष का सेवन करने से ही उनके हृदय से सारे पाप नष्ट हो गए। यही संगति की शक्ति है — शुद्ध भक्त की संगति से हृदय शुद्ध होता है और व्यक्ति को भक्ति का दिव्य स्वाद मिलने लगता है, जिससे वह भौतिक सुखों से विरक्त होकर भगवान की ओर आकर्षित होता है।
वास्तविक भक्ति तभी फलती है जब वह गुरु और शुद्ध भक्तों की संगति से प्राप्त हो। ऐसे शुद्ध भक्तों की संगति में व्यक्ति के भीतर भगवान के नाम, रूप, गुण और लीलाओं के प्रति आकर्षण स्वतः उत्पन्न होता है। यह आकर्षण धीरे-धीरे श्रवण, कीर्तन, स्मरण और प्रेम के रूप में विकसित होकर भगवान के चरणों में स्थिर भक्ति में परिणत होता है।
अंततः, यह उपदेश हमें बताता है कि भगवान की सेवा ही सभी विद्या, कला, तपस्या और जीवन की परिपूर्णता है। भक्ति के बिना ज्ञान शुष्क है, और गुरु की संगति के बिना भक्ति स्थिर नहीं होती। जब ज्ञान, भक्ति और गुरु-कृपा एक साथ आते हैं, तभी आत्मा पूर्ण शुद्ध होकर भगवान के चरणों की ओर उड़ान भरती है — यही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान की लीलाओं का श्रवण ही आत्मा के जागरण और मुक्ति का द्वार है। जब नारद मुनि ने अपने पूर्व जन्म में भक्तों की संगति में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कथाएँ सुनीं, तो उनके हृदय में भक्ति का बीज अंकुरित हुआ। बार-बार श्रवण करने से वह बीज बढ़कर प्रेमरूपी वटवृक्ष बन गया, जिसने उनके भीतर के समस्त अज्ञान, रजोगुण और तमोगुण को नष्ट कर दिया।
शुद्ध भक्तों की संगति में भगवान के नाम, रूप, यश और लीलाओं का श्रवण करना स्वयं भगवान की प्रत्यक्ष संगति है — क्योंकि भगवान और उनका कथन, नाम और कीर्तन अभिन्न हैं। यह श्रवण ही वह सूर्य है जो अज्ञानरूपी अंधकार को मिटा देता है। जैसे-जैसे नारद भगवान के नाम और लीलाओं में लीन हुए, उन्हें यह अनुभूति हुई कि वे स्वयं भी दिव्य हैं, और जो कुछ भौतिक प्रतीत होता है — स्थूल या सूक्ष्म — वह केवल माया का आवरण है।
श्रवण और कीर्तन की यह साधना इतनी प्रबल है कि इससे भक्ति का प्रवाह अपने आप प्रारंभ हो जाता है, जैसे नदी समुद्र की ओर बहती है। इस भक्ति-धारा को कोई रोक नहीं सकता; यह हर पाप, मोह और अंधकार को बहा ले जाती है। जब भक्ति हृदय में प्रकट होती है, तो मनुष्य का स्वभाव सौम्य, सरल और विनम्र बन जाता है। वह भक्तों की सेवा में आनंद अनुभव करता है, और सेवा से उसकी श्रद्धा और निष्ठा और भी प्रगाढ़ होती जाती है।
अंततः, नारद मुनि बताते हैं कि वेदान्तियों ने उन्हें वही दिव्य ज्ञान दिया, जिसे स्वयं भगवान ने अर्जुन को भगवद्गीता में सिखाया था — अर्थात् भक्ति का सर्वोच्च और गोपनीयतम रहस्य। यह ज्ञान न केवल ब्रह्म या परमात्मा के स्तर का है, बल्कि उससे परे जाकर भगवान के साथ प्रेममयी सेवा के व्यक्तिगत संबंध को प्रकट करता है। यही "परम गोपनीय" तत्व है — जो केवल शुद्ध भक्ति से ही जाना जा सकता है, और जो मनुष्य को भगवान के अनंत प्रेम और संगति में स्थिर कर देता है।
इस प्रकार नारद मुनि की कथा यह सिद्ध करती है कि भगवान की लीलाओं का श्रवण, शुद्ध भक्तों की संगति और गुरु-कृपा ही वह त्रिवेणी है, जिसमें स्नान करके जीवात्मा सदैव के लिए शुद्ध, मुक्त और आनंदमय हो जाती है।
इस उपदेश का सार यह है कि भगवान की भक्ति ही वह दिव्य रहस्य है जिसके द्वारा जीव यह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण ही समस्त सृष्टि के कारण, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। जो इस ज्ञान को भक्ति के माध्यम से समझ लेता है, वह भौतिक बंधनों से मुक्त होकर भगवान के शाश्वत धाम में वापस जा सकता है।
नारद मुनि का अनुभव बताता है कि भगवान की कृपा और शुद्ध भक्तों की संगति से ही यह “परम गोपनीय ज्ञान” प्राप्त होता है — वही ज्ञान जो केवल बुद्धि या तर्क से नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण से जाना जा सकता है। इस ज्ञान से मनुष्य समझता है कि भगवान की तीन मुख्य शक्तियाँ — भौतिक, आध्यात्मिक और सीमांत — सभी उन्हीं की हैं और उन्हीं के नियंत्रण में हैं। जो जीव भौतिक शक्ति की सेवा में रहता है, वह अज्ञान और कष्ट में भटकता है; पर जो आध्यात्मिक शक्ति में स्थित होकर भगवान की सेवा करता है, वह सदा आनंद और ज्ञान से पूर्ण रहता है।
जीवन के सभी दुःखों से मुक्ति का एकमात्र उपाय है कि अपने कार्यों को भगवान की सेवा में समर्पित कर दिया जाए। चाहे मनुष्य विद्वान हो, व्यापारी, योद्धा या कलाकार — यदि वह अपने कर्म को भगवान की संतुष्टि के लिए करता है, तो वही कर्म आध्यात्मिक बन जाता है। जैसे अग्नि में लोहे को डालने से वह अग्नि के समान हो जाता है, वैसे ही भगवान की सेवा में समर्पित कर्म तुरंत दिव्य रूप ले लेता है। यही कर्मयोग है, जो कर्मफल से मुक्ति देता है और अंततः शुद्ध भक्ति में परिणत होता है।
भौतिक वस्तुओं का त्याग करने की आवश्यकता नहीं; उन्हें भगवान की सेवा में लगाना ही वास्तविक त्याग और ज्ञान है। इस प्रकार, जो कार्य पहले बंधन का कारण थे, वही कार्य जब ईश्वर को समर्पित हो जाते हैं, तो मुक्ति का साधन बन जाते हैं।
अंततः यही निष्कर्ष निकलता है कि भक्ति-योग सभी कर्म और ज्ञान से श्रेष्ठ है। कर्म और ज्ञान तब तक अधूरे हैं जब तक वे भगवान की सेवा से जुड़े न हों। जो भक्त अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को भगवान की संतुष्टि के लिए करता है, वह दिव्य कृपा से आंतरिक रूप से प्रबुद्ध हो जाता है और यहीं रहते हुए भी भगवद्धाम के आनंद का अनुभव करता है।
इस शिक्षाओं का सार यह है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण के आदेशों का पालन करते हुए उनके नाम, रूप, यश और लीलाओं का निरंतर स्मरण करना है।
एक सच्चा भक्त अपने प्रत्येक कार्य — चाहे वह पारिवारिक, व्यावसायिक या सामाजिक हो — को भगवान की सेवा का अंग बना सकता है। भगवद्गीता में स्वयं भगवान ने कहा है कि सभी कर्म केवल उनके लिए किए जाएँ, क्योंकि वे ही सभी यज्ञों के भोक्ता, सभी लोकों के स्वामी और सभी प्राणियों के परम मित्र हैं। जब व्यक्ति इस भाव से कर्म करता है, तो उसका जीवन भक्ति में परिवर्तित हो जाता है और वह हर क्षण भगवान की संगति में रहने लगता है।
नारद मुनि समझाते हैं कि आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक संसाधनों का उपयोग भगवान की सेवा में करना ही सच्ची सम्पन्नता है। जो अपनी आय, बुद्धि या समय का एक भाग भी भगवान के प्रचार और नाम-संकीर्तन में लगाता है, वह न केवल स्वयं को शुद्ध करता है, बल्कि समाज को भी आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है। भगवान चैतन्य महाप्रभु ने इसी उद्देश्य के लिए हरिनाम-संकीर्तन — गायन, नृत्य और प्रभु के नाम का प्रसार — को कलियुग का सर्वोत्तम उपाय बताया है।
भगवान के नाम और लीलाओं का कीर्तन केवल भक्तिपूर्ण श्रवण और जप से ही संभव है, क्योंकि हमारी भौतिक इंद्रियाँ भगवान के दिव्य स्वरूप को प्रत्यक्ष नहीं देख सकतीं। इसलिए पंचरात्रिक प्रणाली में जप और ध्वनि-पूजा को विशेष महत्व दिया गया है — यह वही साधन है जिससे अशुद्ध इंद्रियाँ पवित्र बनती हैं और आत्मा भगवान की उपस्थिति का अनुभव कर सकती है। गुरु की कृपा से प्राप्त यह दिव्य ध्वनि (मंत्र) साधक को धीरे-धीरे भौतिक स्तर से उठाकर भगवान के नित्य धाम के अनुभव तक ले जाती है।
नारद मुनि आगे यह भी बताते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं, और उनके विस्तार — वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध — उन्हीं की शक्तियों के स्वरूप हैं। भगवान और उनके अंशों का कीर्तन तथा स्मरण करना ही सर्वोत्तम पूजा है। यह पूजा न केवल ज्ञानी जनों की जिज्ञासा को तृप्त करती है, बल्कि उन असंख्य जीवों के दुखों को भी मिटाती है जो अज्ञान और मोह में फँसे हुए हैं।
अंततः निष्कर्ष यही है कि कर्म, ज्ञान और तपस्या — ये सब तब तक अधूरे हैं जब तक वे भगवान की सेवा में न लगें। जब मनुष्य भगवान के नाम, गुण और लीलाओं का स्मरण करते हुए अपने कर्मों को अर्पण करता है, तब उसका जीवन शुद्ध, शांत और पूर्ण हो जाता है। ऐसा जीवन ही सच्चा धर्म है, और यही वह औषधि है जो संसार के समस्त दुखों को जड़ से मिटा देती है।
All glories to Srila Prabhupada 🙏
Hare Krishna 🙏
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