Skand 1 adhyay 8
इस प्रसंग का सार यह है कि कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के बाद जब पाण्डवों ने अपने सभी स्वजनों को खो दिया, तब वे द्रौपदी और अन्य स्त्रियों के साथ गंगा तट पर अपने दिवंगत संबंधियों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने गए। वहाँ उन्होंने शोक से व्याकुल होकर गंगा जल अर्पित किया, जो स्वयं भगवान के चरणकमलों से पवित्र हुई है। भगवान श्रीकृष्ण भी उनके साथ उपस्थित थे — न केवल परिजन के रूप में, बल्कि करुणामय भगवान के रूप में, जो भक्तों के हृदय को ज्ञान और शांति से भर देते हैं।
इस शोकपूर्ण दृश्य में भगवान ने सभी को यह समझाया कि मृत्यु और जन्म जैसी घटनाएँ प्रकृति के कठोर नियमों के अधीन हैं, जिन्हें कोई जीव बदल नहीं सकता। वास्तविक धर्म वही है जो भगवान के आदेशों पर आधारित हो — जैसे कि भगवद्गीता में वर्णित है। जब जीवात्मा इन आदेशों के अनुरूप जीवन जीती है, तब वह भौतिक मोह से ऊपर उठकर अपनी मूल आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त करती है।
इस अध्याय में यह गूढ़ सत्य स्पष्ट होता है कि मनुष्य का जीवन केवल सांसारिक वस्तुओं—घर, परिवार, धन, शरीर आदि—के लिए नहीं है; ये सब अस्थायी हैं। असली उद्देश्य है आत्मा और भगवान के संबंध को पहचानना और भगवान की प्रेममयी सेवा में पुनः स्थित होना।
इसके साथ ही, समाज के कल्याण के लिए शास्त्रों में पाँच प्रकार की सुरक्षा का सिद्धांत बताया गया — ब्राह्मणों, गायों, स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों की रक्षा। ये ही सभ्यता की रीढ़ हैं। जहाँ इनकी अवहेलना होती है, वहाँ समाज का पतन होता है, जैसे कलियुग में देखने को मिलता है।
इस प्रकार यह कथा केवल शोक का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह सिखाती है कि भौतिक हानि के समय भी हमें आध्यात्मिक दृष्टि से सोचना चाहिए, क्योंकि मृत्यु के परे आत्मा अमर है और भगवान की शरण से ही सच्ची शांति प्राप्त होती है।
इस प्रसंग का सार यह है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर को तीन अश्वमेध यज्ञों के संपादन में मार्गदर्शन दिया, तब युधिष्ठिर की कीर्ति समस्त दिशाओं में फैल गई — केवल इसलिए नहीं कि उन्होंने यज्ञ किए, बल्कि इसलिए कि वे भगवान के अनन्य भक्त थे। भक्ति के कारण ही उनका यश इंद्र के समान हुआ, यद्यपि उन्होंने संख्या में बहुत कम यज्ञ किए थे। यह दिखाता है कि भगवान की कृपा से भक्त की महिमा किसी भी सांसारिक सामर्थ्य से बढ़कर होती है।
इसके बाद, जब भगवान द्वारका लौटने की तैयारी करने लगे, तो श्रील व्यासदेव जैसे ब्राह्मणों ने उनकी पूजा की। यद्यपि भगवान क्षत्रिय रूप में थे, उन्होंने समाज की मर्यादाओं का पालन करते हुए ब्राह्मणों का आदर किया। भगवान स्वयं सामाजिक और धार्मिक मर्यादाओं का आदर्श प्रस्तुत करते हैं ताकि मानव समाज उनका अनुकरण करे।
जब भगवान रथ पर बैठे, तभी उत्तरा भयभीत होकर उनकी शरण में आई। वह जानती थी कि केवल भगवान ही मृत्यु और विनाश से रक्षा कर सकते हैं। भौतिक जगत द्वैत से भरा हुआ है — यहाँ हर जीव किसी न किसी रूप में स्वामित्व और प्रतिस्पर्धा के मोह में बंधा है, जबकि आध्यात्मिक जगत में केवल भगवान ही परम स्वामी हैं। इस द्वैत के कारण मृत्यु और भय स्वाभाविक हैं, और केवल भगवान के चरणों में शरण लेने से ही वास्तविक सुरक्षा प्राप्त होती है।
उत्तरा, जो गर्भवती थी और जिसके गर्भ में महाराज परीक्षित थे, भगवान से प्रार्थना करती है कि वे उसके गर्भ की रक्षा करें। यह उसकी भक्ति, निर्भीकता और मातृत्व की सर्वोच्च भावना का प्रतीक है। उसने न तो अपनी स्थिति को लेकर अहंकार किया और न ही भय से मौन रही — उसने सच्चे हृदय से भगवान से रक्षण माँगा। इस प्रकार, यह प्रसंग दिखाता है कि जब जीव पूर्ण समर्पण के साथ भगवान की शरण में आता है, तो भगवान स्वयं उसकी और उसके वंश की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते हैं।
इस प्रसंग का सार यह है कि जब अश्वत्थामा ने पाण्डवों और उनके वंश के पूर्ण विनाश के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंत समझ लिया कि यह अस्त्र पाण्डव कुल की अंतिम कड़ी—गर्भस्थ महाराज परीक्षित—को नष्ट करने के उद्देश्य से छोड़ा गया है। भगवान, जो अपने भक्तों के प्रति अत्यंत स्नेहशील हैं, उस समय स्वयं उनके रक्षक के रूप में प्रकट हुए।
ब्रह्मास्त्र कोई साधारण अस्त्र नहीं था; यह मंत्र-शक्ति से संचालित एक सूक्ष्म, अत्यंत सटीक और प्रचंड अग्नि का प्रतीक था—परमाणु बम से भी अधिक प्रभावशाली, किंतु लक्ष्य पर केंद्रित। जब यह पाण्डवों की ओर बढ़ा, तब वे महान योद्धा होने के बावजूद प्रतिक्रिया करने में असमर्थ थे। ऐसी स्थिति में भगवान ने अपनी प्रतिज्ञा—कि वे युद्ध में शस्त्र नहीं उठाएँगे—को भी भंग करने में संकोच नहीं किया, क्योंकि उनके लिए अपने भक्तों की रक्षा किसी भी प्रतिज्ञा से अधिक पवित्र थी। वे “भक्तवत्सल” कहलाते हैं—जो अपने भक्तों के प्रेम के कारण किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।
परमात्मा स्वरूप में भगवान प्रत्येक हृदय में विद्यमान हैं, इसलिए उन्होंने उत्तरा के गर्भ में प्रवेश करके महाराज परीक्षित की रक्षा स्वयं की दिव्य शक्ति से की। उन्होंने गर्भ को अपनी शक्ति से आच्छादित कर दिया, जिससे ब्रह्मास्त्र का प्रचंड तेज निष्प्रभावी हो गया।
अंततः, यह घटना इस शाश्वत सत्य को उजागर करती है कि कोई भी शक्ति, चाहे वह कितनी ही महान क्यों न हो, भगवान की दिव्य शक्ति का सामना नहीं कर सकती। ब्रह्मास्त्र भी उनके तेज से विफल हो गया। भगवान वही परम आश्रय हैं, जिनकी शरण में आने से जीव मृत्यु, भय और विनाश से सदा के लिए सुरक्षित हो जाता है।
इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण के कार्यकलाप मनुष्य की सीमित बुद्धि से परे हैं। वे अजन्मा, अच्युत और सर्वशक्तिमान हैं, फिर भी वे अपनी दिव्य शक्ति से सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं। उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं, परंतु उनकी प्रत्येक लीला जीवों के लिए अद्भुत और रहस्यमय प्रतीत होती है। यही उनकी दिव्यता है — वे सर्वत्र विद्यमान होकर भी अदृश्य रहते हैं, और जो उनके प्रति शरणागत नहीं हैं, उनके लिए माया का आवरण उन्हें देखने से रोक देता है।
श्रीमती कुंतीदेवी ने, जो सच्ची पतिव्रता और शुद्ध भक्त थीं, भगवान को अपने भतीजे के रूप में नहीं, बल्कि "आदि पुरुष" और "परम नियंता" के रूप में पहचाना। उन्होंने स्वीकार किया कि भगवान भीतर और बाहर दोनों ही स्थानों पर विद्यमान हैं, फिर भी सामान्य मनुष्य उन्हें देख नहीं पाता। कुंती ने अपने व्यक्तिगत अनुभव से जाना कि भगवान बाह्य रूप में उनके सामने उपस्थित थे, और साथ ही उन्होंने अपनी सर्वव्यापकता से उत्तरा के गर्भ में प्रवेश कर परीक्षित की रक्षा भी की।
कुंतीदेवी ने यह भी कहा कि भगवान इन्द्रियबोध से परे हैं — वे अधोक्षज हैं, जिन्हें प्रयोग, तर्क या विज्ञान से नहीं जाना जा सकता। उन्हें केवल भक्ति और उनकी कृपा से ही जाना जा सकता है। महान दार्शनिक, योगी या बुद्धिजीवी भी अपनी मानसिक शक्ति से उन्हें समझ नहीं पाते; लेकिन एक साधारण, निष्कपट भक्त — चाहे वह स्त्री हो या पुरुष — केवल विश्वास और समर्पण से उन्हें प्राप्त कर सकता है।
यही कारण है कि स्त्रियाँ, यद्यपि सरल बुद्धि वाली मानी जाती हैं, फिर भी अपनी सहज श्रद्धा और भक्ति के कारण भगवान के प्रति शीघ्र आकर्षित होती हैं। यह निष्कपट भक्ति ही सच्चा ज्ञान है। भगवान उन पर कृपा करते हैं जो सच्चे हृदय से उनकी श्रेष्ठता को स्वीकार करते हैं, चाहे उनके पास तर्क का बल हो या न हो। इस प्रकार रानी कुंती ने न केवल अपनी विनम्रता, बल्कि भगवान के प्रति परम विश्वास और प्रेम का आदर्श प्रस्तुत किया — यह दिखाते हुए कि भगवान को केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि हृदय से जाना जा सकता है।
इस प्रसंग का सार यह है कि रानी कुंती अपने हृदय की गहराइयों से भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम करती हैं—उन भगवान को जो वसुदेव और देवकी के पुत्र, नंद-यशोदा के लालनपालन में पले, और जिन्होंने ग्वालबालों, गायों और वृंदावनवासियों को अपनी बाल लीलाओं से आनंदित किया। कुंती समझती हैं कि भगवान केवल सृष्टि के सर्वशक्तिमान नियंता ही नहीं, बल्कि सबसे दयालु मित्र भी हैं, जो भक्तों के हृदय के भीतर उतरकर उनकी रक्षा करते हैं और उन्हें प्रेम का अमृत प्रदान करते हैं।
वे भगवान की लीलाओं की सरलता और सौम्यता की महिमा का वर्णन करती हैं—कैसे भगवान, असीम होते हुए भी, अपने भक्तों के बीच बालक के रूप में खेलते हैं। व्रज की भूमि उनके दिव्य प्राकट्य से पवित्र हुई और गायों व ब्राह्मणों की सेवा उनके हृदय का प्रिय कार्य रही। इसीलिए उन्हें “गोविंद” कहा गया—गौ, इन्द्रिय और आत्मा को तृप्त करने वाले।
कुंती भगवान की दिव्य शारीरिक विशेषताओं का भी ध्यान करती हैं—उनके कमल-सदृश नेत्र, कमल के चिन्हों वाले चरण और पंकजनाभि रूप। वे कहती हैं कि भगवान का रूप साधारण नहीं है; वह केवल भक्तों की दृष्टि से ही प्रकट होता है। भगवान कृपालु होकर उन लोगों के लिए मंदिर रूप में अवतरित होते हैं जो अपनी इंद्रियों से परे नहीं देख सकते, ताकि वे भी उनके चरणों में सिर झुका सकें और उनसे संबंध बना सकें।
फिर कुंती भावपूर्वक स्वीकार करती हैं कि भगवान ने उन्हें और उनके पुत्रों को हर संकट से बचाया—विष, अग्नि, वनवास, राक्षसों, दुष्ट सभा, युद्ध और ब्रह्मास्त्र के प्रहार से भी। वे देखती हैं कि भगवान की कृपा ही उनके जीवन की एकमात्र रक्षा है। वे समझती हैं कि संकट वास्तव में विनाश नहीं, बल्कि कृपा हैं, क्योंकि वही संकट उन्हें बार-बार भगवान के दर्शन का अवसर देते हैं।
इसलिए वे कहती हैं कि यदि संकट आने से भगवान के चरणों का स्मरण होता है, तो वे विपत्तियों का स्वागत करती हैं। जो भगवान की शरण ले चुका है, उसके लिए संसार की कठिनाइयाँ तुच्छ हो जाती हैं, जैसे बछड़े के खुरों से बने छोटे गड्ढे। इस संसार में हर कदम पर संकट है, पर भगवान का स्मरण इसे स्वप्नवत कर देता है।
कुंतीदेवी का यह भाव सिखाता है कि विपत्तियाँ हमें भगवान की ओर ले जाती हैं, और जो व्यक्ति संकटों में भी ईश्वर की कृपा को पहचान लेता है, वही वास्तव में मुक्त है। विपत्ति जब भगवान के स्मरण का कारण बन जाए, तब वही मानव जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति बन जाती है।
इस गूढ़ और हृदयस्पर्शी प्रार्थना में रानी कुंती भगवान श्रीकृष्ण की करुणामयी प्रकृति और उनकी अप्रतिम दिव्यता का दर्शन करती हैं। वे कहती हैं कि भगवान तक पहुँचना सहज है — लेकिन केवल उनके लिए जो सांसारिक अभिमान, ऐश्वर्य और अहंकार से मुक्त हैं। जो व्यक्ति उच्च वंश, धन, ज्ञान या सौंदर्य में डूबा रहता है, उसका हृदय कठोर हो जाता है और वह भगवान के प्रति सच्चे प्रेम से “हे कृष्ण, हे गोविंद” नहीं पुकार पाता। भगवान का साक्षात्कार उसी को होता है जिसका हृदय विनम्र, निर्भर और भौतिक नशे से मुक्त हो।
कुंतीदेवी भगवान को “अकिंचनवित्त”—दरिद्रों की सच्ची संपत्ति—कहकर नमस्कार करती हैं। जो व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं से रिक्त होता है, वही भगवान को अपना वास्तविक खजाना बना सकता है। रूप और सनातन गोस्वामी जैसे भक्तों ने इसका आदर्श प्रस्तुत किया, जिन्होंने सांसारिक वैभव का त्याग करके भगवान की सेवा को ही जीवन का लक्ष्य बनाया। भगवान वही परम संपत्ति हैं, जो भक्तों के पास होती है, और भक्त वही दिव्य रत्न हैं जिन्हें भगवान अपना मानते हैं।
वे कहती हैं कि भगवान आत्माराम हैं—स्वयं में पूर्ण और आत्म-संतुष्ट। वे प्रकृति के गुणों से परे हैं; उनका कोई भी कार्य भौतिक नहीं होता। वे जगत में प्रकट होकर भी उससे अछूते रहते हैं। भगवान के भक्त भी इसी दिव्यता में सहभागी हो जाते हैं—वे न तो किसी भौतिक आकर्षण से बंधे रहते हैं, न ही सांसारिक सफलता से प्रभावित।
कुंतीदेवी समझती हैं कि भगवान आदि अनादि हैं, कालस्वरूप हैं, सबके हृदय में परमात्मा के रूप में विद्यमान हैं। वे न किसी के शत्रु हैं, न किसी के पक्षपाती। जो जैसा भाव रखता है, भगवान की कृपा उसे उसी प्रकार प्रकट होती है—जैसे सूर्य सभी को समान रूप से प्रकाश देता है, पर अंधा व्यक्ति उसे देख नहीं पाता। भगवान की कृपा सदैव निष्पक्ष है; अंतर केवल ग्रहण करने की योग्यता में है।
वे आगे कहती हैं कि भगवान की लीलाएँ अकल्पनीय हैं—वे निष्क्रिय होकर भी सब कार्य करते हैं, अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, सर्वव्यापी होकर भी एक विशिष्ट रूप में प्रकट होते हैं। कभी वे पशु रूप में वराह बनकर पृथ्वी को उठाते हैं, कभी मनुष्य रूप में राम और कृष्ण बनकर धर्म की स्थापना करते हैं, कभी मछली या ऋषि रूप में जीवों का उद्धार करते हैं। यह सब उनकी असीम शक्ति का प्रदर्शन है, जो मानव की सीमित बुद्धि के परे है।
कुंतीदेवी के हृदय में यह गहरा बोध है कि भगवान का हर कार्य दिव्य है, हर रूप प्रेम का प्रतीक है, और हर अवतार जीवों के उद्धार के लिए है। वे जानती हैं कि केवल शुद्ध भक्ति ही भगवान को जानने का मार्ग है — न तर्क, न ज्ञान, न ऐश्वर्य, केवल निष्कपट प्रेम। यही उनका जीवन-संदेश है — कि जब मनुष्य अपनी सारी झूठी संपत्ति, अहंकार और अभिमान छोड़कर “अकिंचन” बन जाता है, तभी वह भगवान को पा सकता है, जो स्वयं “अकिंचनवित्त”—ऐसे ही दरिद्र हृदयों की सबसे बड़ी संपत्ति हैं।
इस प्रसंग का सार यह है कि रानी कुंती भगवान श्रीकृष्ण की उस मधुर लीलामयी शक्ति से अभिभूत होकर उनका वर्णन करती हैं, जो परम वैराग्य और परम प्रेम का संगम है। वे कहती हैं — वही भगवान, जिनसे भय स्वयं भयभीत रहता है, अपनी माता यशोदा से डरकर आँसू बहाते हैं। यह अद्भुत दृश्य दिखाता है कि जब भगवान अपने भक्त के निष्काम प्रेम से वशीभूत होते हैं, तो वे सर्वशक्तिमान होते हुए भी सहजता से बालक बन जाते हैं। यह वह अद्वितीय भाव है जहाँ भगवान के वैभव का विस्मरण और स्नेह की पूर्णता एक साथ मिलती है।
माता यशोदा का प्रेम इतना निर्मल था कि भगवान स्वयं उन्हें भूलवा देते थे कि वे साक्षात् परमेश्वर हैं। कुंती इस बात को जानते हुए भी विस्मित थीं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जो सृष्टि के नियंता हैं, अपने भक्तों के स्नेह में एक साधारण बालक के समान रोते और भयभीत होते हैं। यशोदा का प्रेम शास्त्रों की स्तुतियों से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें केवल प्रेम है, न कोई औपचारिकता, न कोई आकांक्षा।
इसके बाद कुंती भगवान के अवतरण के रहस्य को प्रकट करती हैं — वे अजन्मा होकर भी धर्म की स्थापना, भक्तों की रक्षा और अधर्मियों के नाश के लिए जन्म लेते हैं। लोग उनके अवतरण के भिन्न-भिन्न कारण बताते हैं — कोई कहता है वे धर्मात्मा राजाओं की प्रतिष्ठा के लिए प्रकट होते हैं, कोई कहता है वे भक्त वसुदेव-देवकी की प्रार्थना से अवतरित हुए, कोई कहता है कि उन्होंने पृथ्वी के भार को कम करने के लिए अवतार लिया, और कोई कहता है कि वे भक्ति को पुनर्जीवित करने के लिए अवतरित हुए ताकि बद्ध जीवों को मुक्ति मिल सके। परंतु कुंती समझती हैं कि इन सभी कारणों के मूल में भगवान की अहैतुकी कृपा ही है — उनका हृदय करुणा से भरा है, इसलिए वे स्वयं संसार में आते हैं, जीवों को स्मरण, कीर्तन और सेवा के माध्यम से अपने से जोड़ने के लिए।
भगवान का प्रकट होना और उनकी लीलाएँ मानव के लिए चमत्कार हैं — वे निष्क्रिय होकर भी सब कुछ करते हैं, अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, सर्वव्यापी होकर भी एक बालक के रूप में सीमित प्रतीत होते हैं। यही उनकी अचिंत्य शक्ति है। वे वराह, राम, कृष्ण, मछ, या ऋषि रूप में प्रकट होकर जीवों को स्मरण दिलाते हैं कि प्रेम और भक्ति ही ईश्वर तक पहुँचने का सच्चा मार्ग है।
इसलिए, कुंती की प्रार्थना केवल स्तुति नहीं, बल्कि अनुभव का निष्कर्ष है — भगवान अपनी अनंत शक्ति से नहीं, बल्कि अपनी असीम करुणा और प्रेम से अपने भक्तों को बाँधते हैं। यही भक्ति का चरम रहस्य है: सर्वशक्तिमान परमेश्वर केवल प्रेम के बंधन से ही बँध सकते हैं।
इस प्रसंग का सार यह है कि रानी कुंती भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य उपस्थिति, उनकी लीलाओं और उनकी कृपा के अपरिमेय प्रभाव पर गहराई से चिंतन करती हैं। वे कहती हैं कि जो व्यक्ति भगवान के नाम, रूप, लीलाओं और गुणों को श्रद्धा से सुनता, गाता या सुनने में आनंद लेता है — वह निश्चय ही उनके चरणकमलों का दर्शन करता है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र को समाप्त करने में समर्थ हैं। भगवान को देखने की योग्यता किसी बाहरी दृष्टि से नहीं, बल्कि शुद्ध भक्ति से उत्पन्न होती है, और भक्ति का प्रारंभ “श्रवण” — सही स्रोत से भगवान की कथाओं को सुनने से होता है।
वे चेतावनी देती हैं कि यदि कोई व्यक्ति भक्ति रहित या स्वार्थपूर्ण भावना से भगवान की लीलाओं का श्रवण करता है, तो वह केवल बाह्य आनंद तक सीमित रहता है; लेकिन जो शुद्ध भक्ति से सुनता है, वह भगवान की उपस्थिति का साक्षात्कार करता है। पांडवों के जीवन की घटनाएँ, गोपियों और भक्तों के साथ भगवान का व्यवहार — सब दिव्य हैं और जीव को उनके मूल संबंध की याद दिलाने के लिए हैं।
इसके बाद कुंती भगवान से विनती करती हैं कि वे पांडवों को न छोड़ें, क्योंकि वे पूर्णतः उनकी कृपा पर निर्भर हैं। भौतिक जगत में किसी पर निर्भर होना दुर्बलता माना जाता है, लेकिन भगवान पर निर्भर रहना ही परम सौभाग्य है। यही पांडवों की महानता थी — वे वीर थे, धर्मनिष्ठ थे, परंतु पूर्णतः श्रीकृष्ण की शरण में थे। वे जानते थे कि जीवन की वास्तविक सुरक्षा केवल भगवान की कृपा में है, न कि किसी भौतिक शक्ति या उपाय में।
कुंती आगे कहती हैं कि पांडवों और यदुओं का यश, धर्म और अस्तित्व भगवान के बिना निरर्थक है, जैसे चेतना के बिना शरीर मृत हो जाता है। भगवान ही उनके जीवन की आत्मा हैं। उनके चरणचिह्नों से हस्तिनापुर की भूमि पवित्र हुई, और जब तक वे वहाँ रहे, सब कुछ समृद्ध था — नदियाँ बहती रहीं, फसलें लहलहाती रहीं, पशु सुखी रहे, और लोग शांति में जीवन व्यतीत करते रहे।
अंत में कुंती यह सत्य प्रकट करती हैं कि समृद्धि कभी उद्योगों या मानव प्रयासों से नहीं आती, बल्कि केवल भगवान की कृपा से आती है। जब मनुष्य भगवान के नियमों के अनुसार जीवन जीता है, तब प्रकृति स्वयं उसकी सेवा में लग जाती है। लेकिन जब मनुष्य प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने और ईश्वर को भूलने लगता है, तब वही प्रकृति उसके विरुद्ध हो जाती है।
इस प्रकार कुंतीदेवी का भाव यह है कि जीवन की सुंदरता, समाज की समृद्धि और पृथ्वी की कृपा — सब भगवान की दृष्टि और उपस्थिति पर निर्भर हैं। यदि भगवान की कृपा बनी रहे, तो सब कुछ मंगलमय है; लेकिन यदि उनका स्नेह हट जाए, तो सारा यश, वैभव और जीवन का अर्थ क्षणभर में लुप्त हो जाता है।
इस सम्पूर्ण भावमयी प्रार्थना में रानी कुंती अपनी भक्ति की चरम परिपक्वता प्रकट करती हैं। वे भगवान श्रीकृष्ण से कहती हैं — “हे जगत् के स्वामी, कृपया मेरे स्वजनों, पाण्डवों और वृष्णियों के प्रति मेरे स्नेह का बंधन तोड़ दीजिए।” यह किसी निष्ठुरता से नहीं, बल्कि परम प्रेम से उत्पन्न विनती है। वे जानती हैं कि पारिवारिक स्नेह ही जीव को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में बाँधता है। अब वे चाहती हैं कि उनका हृदय केवल भगवान की ओर प्रवाहित हो — जैसे गंगा का जल बिना रुकावट सागर की ओर बहता है।
भक्त का हृदय करुणा से भरा होता है; वह प्रेम को मिटाना नहीं चाहता, बल्कि उसका केंद्र बदलना चाहता है। जिस प्रेम को पहले परिवार, समाज या देह के संबंधों में लगाया जाता है, वही प्रेम जब भगवान की ओर मुड़ जाता है, तो वह “शुद्ध भक्ति” कहलाता है। यही परिवर्तन कुंती की प्रार्थना का सार है। वे चाहती हैं कि उनका मन संसार के अस्थायी संबंधों से हटकर शाश्वत संबंध — भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम — में स्थिर हो जाए।
वे यह भी समझती हैं कि पारिवारिक स्नेह का बंधन स्वयं भगवान की ही शक्ति से टूट सकता है। इसलिए वे उसी से प्रार्थना करती हैं कि वह स्नेह, जो अब तक उन्हें भगवान से दूर रखता था, वही अब भगवान की ओर प्रवाहित हो जाए। भगवान कई बार अपने भक्त की प्रगति के लिए ऐसे बंधनों को स्वयं तोड़ देते हैं — ताकि भक्त पूरी तरह उन पर निर्भर हो जाए और उनके चरणों में शरण पा सके।
अंत में कुंतीदेवी भगवान को उनके असली स्वरूप में पहचानकर नतमस्तक होती हैं — वे अर्जुन के मित्र, वृष्णिवंश में श्रेष्ठ, गौ-भक्त, ब्राह्मण-रक्षक, भक्तों के उद्धारक, सर्वशक्तिमान ईश्वर और समस्त ब्रह्मांड के गुरु हैं। वे सभी योगशक्तियों से सम्पन्न हैं और उनका धाम दिव्य है जहाँ अनंत लक्ष्मियाँ उनकी सेवा में रहती हैं।
जब कुंतीदेवी अपनी सच्ची, प्रेममयी प्रार्थना पूरी करती हैं, तो भगवान मंद मुस्कुराते हैं — यह मुस्कान उनकी कृपा और माया का संगम है। जैसे एक पिता अपने बालक के टूटी-फूटी वाणी से प्रसन्न होता है, वैसे ही भगवान अपने भक्त की हृदय से निकली सादगीपूर्ण वाणी से प्रसन्न होते हैं।
अंततः भगवान युधिष्ठिर के प्रेमपूर्ण आग्रह से रुक जाते हैं — यह सिद्ध करता है कि सर्वशक्तिमान भगवान को केवल एक ही शक्ति बाँध सकती है: भक्त का प्रेम। कुंती की यह प्रार्थना भक्ति का शिखर है — जहाँ भक्ति निर्भेद, निष्काम और अनन्य बन जाती है; जहाँ भक्त केवल यही चाहता है कि उसका मन सदा-सर्वदा केवल कृष्ण की ओर बहता रहे।
इस प्रसंग का सार यह है कि धर्मराज युधिष्ठिर, जो सत्य और न्याय के प्रतिरूप माने जाते थे, कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद गहरे शोक और अपराध-बोध से भर गए। यद्यपि उन्हें व्यासदेव जैसे महान ऋषियों और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने यह समझाया कि यह युद्ध धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिए आवश्यक था, फिर भी उनका हृदय शांत नहीं हुआ।
युधिष्ठिर को लगता था कि उनके कारण ही यह महाभयानक विनाश हुआ — असंख्य योद्धाओं, ब्राह्मणों, मित्रों, बच्चों, माता-पिता और गुरुजनों का रक्त उनकी विजय की कीमत बन गया। वे स्वयं को महापापी समझने लगे और सोचने लगे कि लाखों वर्षों तक भी वे इस पाप से मुक्त नहीं हो पाएँगे। उनका करुणा-भरा हृदय यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि धर्म के नाम पर इतना विनाश उचित ठहराया जा सकता है।
लेकिन यह सब भगवान की योजना के अंतर्गत था। जैसे अर्जुन को भगवान ने मोह से भरकर भगवद्गीता सुनाई, वैसे ही अब भगवान ने युधिष्ठिर को मोहग्रस्त किया ताकि उन्हें भी भीष्मदेव के मुख से धर्म और जीवन का गूढ़ तत्त्व सुनने का अवसर मिले। यह भगवान की दिव्य योजना थी — कि युधिष्ठिर के हृदय को व्यास या स्वयं कृष्ण नहीं, बल्कि अपने जीवन के अंत में स्थित भीष्मदेव शांत कर सकें।
युधिष्ठिर का दुःख केवल व्यक्तिगत नहीं था; वह एक शुद्ध आत्मा का विलाप था जो संसार के कल्याण के लिए भी चिंतित था। उन्हें यह समझ में आ गया कि जब तक व्यक्ति देहाभिमान में रहता है, तब तक हिंसा और अहिंसा का भाव उसे बाँधता है। लेकिन जब सब कुछ भगवान की इच्छा में अर्पित कर दिया जाता है, तब वही कर्म “धर्म” बन जाता है।
इस प्रकार युधिष्ठिर का यह शोक, जो बाहर से कमजोरी जैसा लगता था, वास्तव में उनके हृदय की पवित्रता और विनम्रता का प्रमाण था। यह दर्शाता है कि सच्चा धर्मराज वही है जो अपनी विजय में भी विनम्र रहे, और अपने कर्मों के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानकर ईश्वर के समक्ष नतमस्तक हो जाए।
राजा युधिष्ठिर का हृदय गहरे पश्चात्ताप से भरा हुआ था — वे सोच रहे थे कि उन्होंने युद्ध में असंख्य स्त्रियों को विधवा कर दिया और अनगिनत परिवारों को उजाड़ दिया। उन्हें यह अनुभव हो रहा था कि ऐसी शत्रुता और दुःख को कोई भौतिक साधन, कोई यज्ञ या दान मिटा नहीं सकता। वे समझ गए कि पाप और पुण्य के कर्म चक्र में फँसकर मनुष्य बार-बार उसी दुःख के जाल में उलझता रहता है।
वेदों में वर्णित यज्ञ, जैसे अश्वमेध यज्ञ, ब्रह्महत्या जैसे महापापों से मुक्ति का साधन बताए गए हैं; पर युधिष्ठिर का अनुभव था कि ऐसे कर्म भी केवल बाहरी शुद्धि हैं — वे हृदय के अपराध को नहीं धो सकते। युद्ध के कारण उत्पन्न पीड़ा केवल शरीर या समाज तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा के स्तर तक व्याप्त है।
महाराज यह गहराई से समझ गए कि जब तक कर्म भगवान की इच्छा के लिए न किया जाए, तब तक वह नए बंधन ही उत्पन्न करता है। कुरुक्षेत्र का युद्ध स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से हुआ था — इसलिए पांडवों पर कोई पाप नहीं था, क्योंकि वे केवल भगवान के आदेश के वाहक थे। लेकिन सामान्य मनुष्य, जो स्वार्थ या अभिमान से कर्म करता है, वह अपने हर कार्य की प्रतिक्रिया का उत्तरदायी बनता है।
अंततः युधिष्ठिर का निष्कर्ष यही था कि यज्ञ या कर्मकांड से नहीं, केवल भक्ति और हरिनाम-संकीर्तन से ही मनुष्य वास्तव में पवित्र हो सकता है। कलियुग में वेदविहित यज्ञों की पूर्णता संभव नहीं — न योग्य ब्राह्मण हैं, न सच्ची श्रद्धा। इसलिए एकमात्र शुद्ध मार्ग है — हरिनाम यज्ञ, अर्थात् भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन।
जो कुछ भी भगवान के लिए, उनकी सेवा में किया जाए, वही वास्तविक शुद्ध कर्म है। वही कर्म हमें पाप से मुक्त करता है और हमें फिर से भगवान की कृपा की छाया में ले आता है — जहाँ कोई युद्ध, कोई दुःख, और कोई बंधन नहीं रहता।
All glories to Srila Prabhupada 🙏
Hare Krishna 🙏
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