Skand 10 adhyay 10

इस प्रसंग का सार यह है कि नलकूवर और मणिग्रीव के पतन और उद्धार की कथा केवल दो अभिमानी देवपुत्रों की कहानी नहीं, बल्कि अहंकार, इन्द्रिय-सुख और भक्ति की करुणा का गहरा आध्यात्मिक पाठ है।

कुबेर के पुत्र होने के कारण वे धन, यौवन और शक्ति के गर्व से अंधे हो गए थे। भगवान शिव की संगति और स्वर्गीय सुखों ने उनमें विनम्रता नहीं, बल्कि अहंकार बढ़ा दिया। गंगा जैसी पवित्र नदी, जो पापों को धोती है, उनके लिए भोग की जगह बन गई — यह दिखाता है कि पवित्र स्थान भी अपवित्र मन से पवित्र नहीं बन सकता।

ऐसे ही समय में देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे। उनकी उपस्थिति “संयोगवश” नहीं थी — बल्कि यह ईश्वर की करुणा का प्राकट्य था। जब पतित जीव पाप में डूबा होता है, तब भगवान किसी साधु के रूप में वहाँ पहुँचते हैं ताकि उसे जागृत किया जा सके। नारद ने उन्हें केवल दण्ड देने के लिए नहीं, बल्कि भक्ति का बीज देने के लिए शाप दिया।

यह प्रसंग बताता है कि अहंकार, भोग और इन्द्रिय-सुख से भरा जीवन कितना विनाशकारी है, और साधु-संगति का एक क्षण भी जीवन को पलट सकता है। जहाँ नारद जैसे भक्त पहुँचते हैं, वहाँ अज्ञान और अहंकार का अंधकार मिट जाता है, और भक्ति का बीज अंकुरित होने लगता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि अहंकार, धन और इन्द्रिय-सुख का नशा मनुष्य को कितना अंधा और पतनशील बना देता है, और संतों की करुणा कैसे उस अंधकार से उद्धार करती है।

नलकूवर और मणिग्रीव, कुबेर के पुत्र होकर भी अपने ऐश्वर्य और शक्ति के गर्व में इतने डूब गए कि उन्हें धर्म, मर्यादा और साधु का भी भय नहीं रहा। जब देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे, तो सब देवकन्याएँ लज्जा से वस्त्र धारण कर लीं, पर ये दोनों अभिमानवश नग्न ही खड़े रहे। यह केवल देह की नग्नता नहीं थी — यह आत्मा की अज्ञानता और घोर अधर्म का प्रतीक थी।

नारद का “शाप” वास्तव में करुणा का जागरण था। जैसे एक पिता बच्चे को जगाने के लिए झटका देता है, वैसे ही नारद ने उन्हें वृक्ष बनने का शाप देकर उनके भोगविलास को रोक दिया ताकि वे पश्चात्ताप और विनम्रता से भक्ति प्राप्त कर सकें। यह शाप अंततः उन्हें भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन तक ले गया — जो नारद की सच्ची कृपा थी।

नारद समझाते हैं कि धन और कुल का अहंकार बुद्धि को सबसे अधिक भ्रष्ट करता है। ऐसा व्यक्ति मद, नारी और जुए में जीवन नष्ट करता है और पशुओं की हत्या करके अपने शरीर की झूठी रक्षा करता है — पर अंत में यही शरीर कीड़े, मल या राख बन जाता है। जो मनुष्य इस सत्य को नहीं समझता, वह नरक का भागी बनता है।

इसलिए, यह कथा सिखाती है कि मानव जीवन का उद्देश्य भोग नहीं, आत्मसाक्षात्कार है। जब तक मनुष्य रजोगुण और तमोगुण में फँसा रहेगा, तब तक वह पशुवत् जीवन जीता रहेगा। केवल संत-संगति और गुरु-शरण से ही वह भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर लौट सकता है — क्योंकि नारद जैसे महात्मा ही अज्ञान से अंधे जीवों को भगवद्प्रेम के प्रकाश तक पहुँचाते हैं।

इस प्रसंग का सार यह है कि नारद मुनि की “शाप रूपी कृपा” का उद्देश्य नलकूवर और मणिग्रीव को अहंकार, मद और भोग के अंधकार से निकालकर भक्ति के प्रकाश में लाना था।

दरिद्रता यहाँ कोई अभिशाप नहीं, बल्कि शुद्धि का वरदान है। जब मनुष्य धन, ऐश्वर्य और भोग में डूब जाता है, तो उसका विवेक नष्ट हो जाता है और वह ईर्ष्या, हिंसा और अहंकार से भर जाता है। लेकिन जब वही व्यक्ति अभाव में आता है, तब उसकी इन्द्रियाँ स्वतः शांत हो जाती हैं, झूठी प्रतिष्ठा मिट जाती है, और वह ईश्वर की कृपा का वास्तविक अनुभव करने लगता है। इस प्रकार दरिद्रता स्वयं में एक स्वाभाविक तपस्या है जो मनुष्य को नम्र, विनीत और आध्यात्मिक बनाती है।

नारद मुनि बताते हैं कि साधु पुरुष गरीबों की संगति में अधिक सहजता से भक्ति का प्रचार कर सकते हैं, क्योंकि उनमें दंभ और अहंकार कम होता है। अमीर व्यक्ति अपनी सुरक्षा, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाओं में इतना उलझा होता है कि साधु-संग से ही वंचित रह जाता है। लेकिन निर्धन व्यक्ति खुले हृदय से संतों का स्वागत करता है और उनके वचनों से शुद्ध होता है। यही कारण है कि नारद स्वयं, जो कभी एक दासीपुत्र थे, साधु-संगति से महा-मुनि बन सके।

अंततः यह कथा सिखाती है कि भक्ति का मार्ग साधु-संगति और विनम्रता से खुलता है, न कि धन और अहंकार से। नारद का शाप कोई क्रोध नहीं, बल्कि दिव्य करुणा का उपचार था। उन्होंने इन दोनों देवपुत्रों का झूठा अभिमान तोड़कर उन्हें वैष्णवत्व की ओर अग्रसर किया। वैष्णव जो भी करते हैं, वह दूसरों के कल्याण के लिए होता है—कभी दंड के रूप में, तो कभी कृपा के रूप में। उनके प्रत्येक कार्य का अंतिम उद्देश्य होता है — “सबको ईश्वर के चरणों तक पहुँचाना।”

इस प्रसंग का सार यह है कि नारद मुनि का “शाप” वास्तव में नलकूवर और मणिग्रीव को शुद्ध भक्ति तक पहुँचाने का दिव्य वरदान था, और भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त नारद के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिए स्वयं उनके उद्धार की लीला रची।

अहंकार और इन्द्रिय-सुख में डूबे ये दोनों देवपुत्र इतने अंधे हो गए थे कि अपने नग्न होने की लज्जा भी उन्हें नहीं रही — इसलिए नारद ने उन्हें “वृक्ष-तुल्य” चेतनहीन जीवन का दंड दिया। किंतु यह दंड मात्र बाह्य नहीं था; उसमें गहरी करुणा छिपी थी। नारद ने व्यवस्था की कि वृक्ष रहते हुए भी उनमें चेतना बनी रहे — ताकि वे पश्चात्ताप कर सकें, अपने पापों का स्मरण रख सकें, और अंततः भक्ति के योग्य बन सकें।

उनके वृक्ष बनने की अवधि भी नारद की कृपा से सीमित रखी गई — सौ दिव्य वर्षों के बाद, वे श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन पाएँगे। इस प्रकार, नारद ने उन्हें विनम्रता, धैर्य और अंततः भक्ति का बीज प्रदान किया।

जब समय पूरा हुआ, तो भगवान श्रीकृष्ण, अपने प्रिय भक्त के वचनों की पूर्ति करने के लिए स्वयं वहाँ पहुँचे। यद्यपि नलकूवर और मणिग्रीव का भगवान से कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन भक्त की सिफारिश से भगवान उनके उद्धार के लिए स्वयं प्रकट हुए। यही भक्ति का रहस्य है — भगवान भक्त के प्रति पूर्णतः वशीभूत रहते हैं।

इसलिए यह कथा केवल नलकूवर-मणिग्रीव की नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि भक्त की करुणा, भगवान की कृपा को आकर्षित करती है। नारद का शाप वास्तव में एक औषधि थी, और श्रीकृष्ण का आगमन उसका पूर्ण उपचार। अंततः, ये दोनों वृक्ष कृष्ण के दर्शन पाकर मुक्त हुए और अपनी दिव्य स्थिति को पुनः प्राप्त कर सके — यह प्रमाण है कि जो भी भक्त की शरण में आता है, वह चाहे कितना भी पतित क्यों न हो, अंततः भगवान की कृपा से उद्धार पाता ही है।

इस प्रसंग का सार यह है कि दामोदर-लीला केवल एक बालक की खेल नहीं, बल्कि भगवान की करुणा और उनके भक्त की कृपा की दिव्य पूर्णता का प्रकट प्रमाण है।

बालक कृष्ण, जो स्वयं परमेश्वर हैं, अपने भक्त माता यशोदा द्वारा बंधे जाने पर भी बंधन से परे हैं — यही “दामोदर” नाम का रहस्य है। जब वे ओखली से बँधे हुए थे, तो नारद मुनि के शाप को सत्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने अर्जुन वृक्षों को उखाड़ दिया। इस एक लीला में भगवान का निरंकुश सामर्थ्य और भक्तों के प्रति अनन्य प्रेम दोनों प्रकट हुए।

जैसे ही वृक्ष गिरे, उनमें से नलकूवर और मणिग्रीव दिव्य रूप में प्रकट हुए — देदीप्यमान, तेजोमय और पूर्णतया विनम्र। उन्होंने समझ लिया कि यह उद्धार नारद मुनि की कृपा और भगवान की योजना का परिणाम है। वे भगवान की सर्वव्यापकता, कारणत्व और सर्वज्ञता को स्वीकार करते हुए नतमस्तक हुए। उन्होंने अनुभव किया कि भले ही वे वृक्ष-योनि में पड़े रहे, भगवान की करुणा और भक्त की दया ने उन्हें पुनः दिव्यता तक पहुँचा दिया।

अंततः यह लीला सिखाती है कि कृष्ण का नाम, रूप और लीला भौतिक बुद्धि से नहीं, केवल भक्ति से समझे जा सकते हैं। जो व्यक्ति सेवाभाव से उनके चरणों में शरण लेता है, उसी के हृदय में भगवान स्वयं प्रकट होते हैं।
इस प्रकार नलकूवर और मणिग्रीव की कथा केवल एक शाप-मुक्ति की कथा नहीं, बल्कि यह उद्घोष है कि —
“भक्त की दया और भगवान की लीला मिलकर पतित जीव को भी परम प्रकाश तक पहुँचा देती है।”

इस प्रसंग का सार यह है कि नलकूवर और मणिग्रीव का उद्धार भगवान की सर्वशक्तिमान कृपा और भक्त-करुणा का अद्भुत संगम था।

इन दोनों देवपुत्रों ने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपने हृदय की पूर्ण विनम्रता से निवेदन किया। वे अब समझ चुके थे कि श्रीकृष्ण ही परम पुरुषोत्तम, सर्व-कारणों के कारण, संकर्षण और वासुदेव—चतुर्व्यूह के मूल स्रोत हैं। उनके लिए भक्ति का सार यही था कि उन्हें तर्क या विवेचना से नहीं, बल्कि श्रद्धा और प्रणाम से स्वीकार किया जाए।

उन्होंने अनुभव किया कि भगवान के विविध अवतार — मछ, कूर्म, वराह आदि — केवल भौतिक रूप नहीं हैं, बल्कि दिव्य, चैतन्य और सर्वशक्तिमान स्वरूप हैं, जो प्रत्येक युग में जीवों के कल्याण के लिए प्रकट होते हैं। जब भी अधर्म बढ़ता है और भक्तों पर अत्याचार होता है, तब वे स्वयं प्रकट होकर संतों की रक्षा और अधर्म का अंत करते हैं।

उनके प्रार्थनाओं का गूढ़ भाव यह था कि कृष्ण की महिमा को समझना हमारी बुद्धि की सीमा से परे है; वह केवल भक्ति से अनुभव की जा सकती है। वे वही परम मंगलमय प्रभु हैं, जो सदा साधुओं की रक्षा और कल्याण के लिए अवतरित होते हैं।

अंत में, दोनों देवपुत्रों ने निवेदन किया कि वे अब नारद मुनि — उस कृपालु वैष्णव — के सेवक बनना चाहते हैं, जिनकी दया से ही उन्हें भगवान के दर्शन हुए। यह दर्शाता है कि कृष्ण की प्राप्ति का मार्ग केवल वैष्णव की कृपा से ही संभव है।

इस प्रकार यह लीला यह सिखाती है कि —
भक्त की कृपा भगवान की कृपा को आकर्षित करती है, और जो व्यक्ति सच्चे वैष्णव की शरण ग्रहण करता है, वह अवश्य ही श्रीकृष्ण के दर्शन और मुक्ति का अधिकारी बनता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि नलकूवर और मणिग्रीव की मुक्ति केवल बाहरी बंधन से नहीं, बल्कि उनके अंतःकरण की पूर्ण शुद्धि और भक्ति के पुनर्जागरण से थी।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि उनके शरीर, मन, वाणी, कान, हाथ, पैर और सभी इंद्रियाँ सदैव भगवान की सेवा में ही लगें। यही सच्ची भक्ति-प्रक्रिया है—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद-सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन। जब समस्त इंद्रियाँ “हृषीकेश”—इंद्रियों के स्वामी श्रीकृष्ण—की सेवा में लगती हैं, तभी मनुष्य मुक्त होता है।

श्रीकृष्ण मुस्कुराए, क्योंकि वे गोपियों के प्रेम में स्वयं “दामोदर”—बंधन में बंधे—थे, और फिर भी अपने भक्त नारद के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने दूसरों को मुक्त किया। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान का बंधन भी प्रेम का होता है, और उनका हर कार्य भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए ही होता है।

उन्होंने नलकूवर और मणिग्रीव को समझाया कि भक्त का शाप भी दया का रूप होता है। जैसे सूर्य के सामने अंधकार मिट जाता है, वैसे ही साधु-संग से भव-बंधन समाप्त हो जाता है। नारद का शाप वास्तव में वरदान था, जिसने उन्हें विनम्रता, पश्चात्ताप और अंततः भक्ति का आशीर्वाद दिया।

अंततः भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया — “अब तुम दोनों अपने लोक लौटो, परंतु अब कभी भक्ति से विचलित न होना।”
यह वचन केवल मुक्ति का नहीं, बल्कि नित्य-भक्ति के स्थायित्व का प्रतीक था।

इस प्रकार यह लीला सिखाती है कि —
भक्त-संग ही जीवन का वास्तविक प्रकाश है।
जब इंद्रियाँ भगवान की सेवा में लगती हैं और मन उनके चरणों में स्थिर हो जाता है, तब जीव न केवल मुक्त होता है, बल्कि प्रेम में सदा के लिए भगवान से जुड़ जाता है।

इस श्लोक का सार यह है कि नलकूवर और मणिग्रीव ने भगवान श्रीकृष्ण से प्राप्त परम कृपा के प्रति गहन कृतज्ञता के साथ विनम्रतापूर्वक नमस्कार किया और उनकी परिक्रमा की।

वे यह समझ चुके थे कि उनका उद्धार केवल भगवान की करुणा और उनके भक्त नारद मुनि की दया से संभव हुआ। अब उनके भीतर कोई अहंकार या भौतिक वासना नहीं रही — केवल भक्ति, नम्रता और भगवान के प्रति प्रेममयी कृतज्ञता शेष रह गई।

भगवान की अनुमति लेकर वे अपने दिव्य लोक लौट गए, परंतु अब उनके भीतर एक नित्य भावना स्थिर हो चुकी थी — “हम अब केवल कृष्ण के सेवक हैं।”

इस प्रकार कथा का समापन यह सिखाता है कि जब जीव अपने अहंकार और भोग की प्रवृत्ति त्यागकर शरणागति के साथ भगवान की कृपा स्वीकार करता है, तो वह सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

All glories to Srila Prabhupada 🙏 
Hare Krishna 🙏

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