Skand 10 adhyay 12

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण का प्रत्येक कार्य और उनकी प्रत्येक लीला असीमित और दिव्य होती है। जब वे अपने सखा ग्वालबालों और असंख्य बछड़ों के साथ वन में पिकनिक करने जाते हैं, तो यह कोई सामान्य बालक-खेल नहीं, बल्कि दिव्य आनंद का प्रकट रूप है। "कृष्णवत्सैर असंख्यातैः" — यह शब्द दर्शाता है कि कृष्ण की शक्तियाँ, उनका धाम और उनके साथी — सब कुछ असीम हैं, जैसे स्वयं वे परब्रह्म असीम हैं।

यह दृश्य हमें यह सिखाता है कि भगवान की लीलाएँ कभी कल्पना मात्र नहीं होतीं, बल्कि वे सत्य हैं — पर हमारी सीमित बुद्धि उन्हें नहीं समझ सकती। कृष्ण की असीम शक्ति और प्रेम हमारी इन्द्रियों से परे है; उन्हें केवल भक्ति से ही अनुभव किया जा सकता है।

जब कृष्ण और उनके सखा वन में हँसते, खेलते, एक-दूसरे के थैले छीनते और आनंद में डूबे रहते हैं, तो यह भक्ति के सर्वोच्च स्वरूप का दर्पण है — जहाँ कोई स्वार्थ, भय या मोह नहीं, केवल स्नेह और प्रेम होता है। यही प्रेम भाव भौतिक संसार की सभी आनंद-छायाओं का मूल स्रोत है।

श्रीकृष्ण इन लीलाओं के माध्यम से मनुष्यों को यह शिक्षा देते हैं कि सच्चा सुख न इन्द्रिय-संतोष में है, न बाहरी ऐश्वर्य में, बल्कि भगवान के संग, प्रेम और सेवा में है। जब मनुष्य अपने जीवन को इस दिव्य प्रेम की दिशा में लगाता है, तब वह जड़ भोग से ऊपर उठकर ब्रह्मानंद — उस अनंत आध्यात्मिक सुख — का अनुभव करने लगता है, जो नित्य और अमर है।

इस प्रकार, यह लीला हमें स्मरण कराती है कि वृंदावन की बाल-क्रीड़ाएँ केवल बालपन की नहीं, बल्कि परम तत्त्व की अभिव्यक्ति हैं — जहाँ हर खेल, हर हँसी और हर चोरी भी भक्ति का रूप है, और हर क्षण में केवल भगवान का प्रेम ही झलकता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ केवल बालक्रीड़ा नहीं, बल्कि परम आध्यात्मिक आनंद की अभिव्यक्ति हैं। जब गोपालक बालक प्रेम और हँसी के साथ कृष्ण के साथ दौड़ते, खेलते, गाते और हँसते हैं, तो यह दिखाता है कि भगवान के साथ संबंध केवल पूजन या तपस्या से नहीं, बल्कि प्रेम, स्नेह और सहज भाव से भी स्थापित होता है। यही व्रजभाव है — जहाँ भगवान से संबंध औपचारिक नहीं, बल्कि हृदय का होता है।

इन ग्वालबालों का सौभाग्य अकल्पनीय है। वे अनेक जन्मों के पुण्य कर्मों का फल पाकर उस अवस्था तक पहुँचे, जहाँ वे स्वयं भगवान के साथ खेल सके, उन्हें छू सके और उनकी संगति में नित्य आनंद अनुभव कर सके। उनके लिए भगवान “परम ब्रह्म” नहीं, बल्कि “सखा” थे, और यह स्नेह ही भक्ति का सर्वोच्च रूप है।

श्रील रूप गोस्वामी की शिक्षा — “तस्मात् केनापि उपायेन मनः कृष्णे निवेशेत्” — यही बताती है कि किसी भी प्रकार से मन को कृष्ण में लगाना चाहिए। चाहे कोई उन्हें ब्रह्म रूप में माने या बालक के रूप में, यदि मन कृष्ण में स्थिर हो जाता है, तो वही जीवन की सिद्धि है।

श्रीमद्भागवतम् इस भाव को जगाने का सर्वोत्तम माध्यम है। यह ग्रंथ हमें कृष्ण की ओर सीधा मार्ग दिखाता है — केवल ज्ञान या तप नहीं, बल्कि प्रेममयी स्मृति के द्वारा। जो व्यक्ति भगवद्गीता और भागवत के सिद्धांतों को अपनाता है, वह मृत्यु के बाद कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करता है।

अघासुर का आगमन भी योगमाया की योजना थी। यह केवल राक्षस का विघ्न नहीं, बल्कि आनंद की लहरों में परिवर्तन का एक कारण था — ताकि लीला निरंतर नवीन और रोचक बनी रहे। राक्षसों का वध भगवान की वीरता को नहीं, बल्कि उनकी करुणा को दर्शाता है — क्योंकि वे प्रत्येक स्थिति को अपने भक्तों के लिए आनंद का साधन बना देते हैं।

इस प्रकार, वृंदावन की हर लीला भक्ति की एक शिक्षा है — भगवान का स्मरण प्रेम से करना, मन को उनके चरणों में लगाना, और उनके संग रहने का भाव विकसित करना ही जीवन का परम उद्देश्य है।

इस प्रसंग का सार यह है कि अघासुर, जो पूतना और बकासुर का भाई था, बदले की भावना से भरा हुआ था। उसने यह योजना बनाई कि यदि वह कृष्ण और उनके सभी सखाओं को मार डाले, तो व्रज की समस्त प्रजा — जो इन बालकों से ही जीवन पाती थी — शोक से मर जाएगी। इस दुष्ट विचार से प्रेरित होकर उसने विशाल अजगर का रूप धारण किया, जिसका शरीर पर्वत के समान विशाल और भयानक था।

उसका मुख बादलों तक फैला हुआ था, उसकी आँखें अग्नि की तरह जल रही थीं, और उसकी साँसें तपती हवा जैसी थीं। यह दृश्य इतना विचित्र और विलक्षण था कि ग्वालबाल भय और कौतूहल दोनों से भर उठे। कुछ बालक उसे जीवित अजगर मानकर डर गए, जबकि कुछ ने उसे एक अद्भुत प्राकृतिक संरचना या खेलने का स्थान समझ लिया।

यह दृश्य केवल बाहरी घटना नहीं, बल्कि आंतरिक प्रतीक है — कि जब भगवान की लीलाओं में कोई विघ्न आता है, तो भक्त भी कभी-कभी अज्ञानवश उसे खेल या भ्रम समझ लेते हैं, पर भगवान के नियंत्रण में होने के कारण किसी का भी विनाश संभव नहीं।

कृष्ण के सखा निष्कपट और निडर थे; उनके मन में भय नहीं, केवल खेल का भाव था। यह मासूम भक्ति का स्वरूप है — जहाँ आत्मा भगवान पर पूर्ण भरोसे में रहती है, चाहे मृत्यु सामने ही क्यों न खड़ी हो।

इस घटना के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि भक्ति में भय, संशय या संदेह का कोई स्थान नहीं। जो कृष्ण के सान्निध्य में हैं, उनके लिए सबसे भयानक परिस्थिति भी केवल लीला का एक भाग है, क्योंकि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

इस प्रसंग का सार यह है कि ग्वालबालों का भगवान श्रीकृष्ण पर पूर्ण और निष्कपट विश्वास उनकी शुद्ध भक्ति का अद्भुत उदाहरण है। जब उन्होंने अघासुर के विशाल, भयावह अजगर रूप को देखा — जिसका मुँह पर्वत समान, दाँत शिखरों जैसे और साँसें अग्नि जैसी थीं — तब भी वे भयभीत नहीं हुए। उन्हें विश्वास था कि जैसा पहले बकासुर के समय हुआ था, वैसे ही इस बार भी कृष्ण उनकी रक्षा अवश्य करेंगे।

उनकी दृष्टि में यह कोई राक्षस नहीं, बल्कि खेल का एक नया अवसर था — एक और लीला, जिसमें वे कृष्ण के साथ आनंद ले सकें। वे हँसते हुए, तालियाँ बजाते हुए, हर्ष और विश्वास के भाव से उस राक्षस के मुख में प्रवेश कर गए।

यह दृश्य दिखाता है कि शुद्ध भक्ति में भय का कोई स्थान नहीं होता। भक्त का हृदय जब भगवान की शरण में होता है, तब वह मृत्यु और संकट को भी आनंदपूर्वक स्वीकार करता है, क्योंकि उसे यह विश्वास होता है कि भगवान सदा उसके साथ हैं।

ग्वालबालों का यह निडर प्रेम और बालसुलभ सरलता ही उनकी आध्यात्मिक श्रेष्ठता का प्रमाण है — वे किसी गणना, तर्क या भय के बिना, केवल विश्वास और स्नेह से प्रेरित होकर भगवान की ओर बढ़ते हैं। यही शुद्ध भक्ति का सबसे सुंदर रूप है — न ज्ञान का, न भय का, केवल प्रेम और भरोसे का संबंध भगवान के साथ।

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण, जो सभी के हृदय में परमात्मा रूप से स्थित हैं, सब कुछ जानते हैं — यहाँ तक कि ग्वालबालों के मन के विचार भी। उन्होंने जान लिया कि यह कोई साधारण अजगर नहीं, बल्कि अघासुर नामक दैत्य है जो उन्हें निगलने की प्रतीक्षा कर रहा है। फिर भी, उनके साथी नासमझी में उस अजगर के मुख में प्रवेश कर गए, क्योंकि वे उसके असली स्वरूप से अनजान थे और बालसुलभ खेल में मग्न थे।

कृष्ण के सामने अब एक गूढ़ परिस्थिति थी — उन्हें अपने प्रिय सखाओं को बचाना भी था और राक्षस का वध भी करना था। भगवान की असीम बुद्धि और शक्ति ऐसी थी कि वे दोनों कार्य एक साथ कर सकते थे। यही कारण है कि उन्होंने स्वयं भी राक्षस के मुख में प्रवेश किया।

देवता भयभीत हो उठे, क्योंकि उन्हें लगा कि अब कृष्ण भी निगले जाएँगे; किंतु असुरगण, विशेषकर कंस, प्रसन्न हो गए। यह विरोधाभास दर्शाता है कि भगवान की लीलाएँ सबके लिए एक समान नहीं होतीं — भक्तों के लिए वे करुणा और रक्षण का प्रतीक हैं, जबकि असुरों के लिए विनाश का।

यह प्रसंग यह शिक्षा देता है कि भगवान सदा अपने भक्तों के रक्षक होते हैं, भले ही वे स्थिति से अचेत या असहाय क्यों न हों। वे अपने दिव्य उपायों से उन्हें संकट से निकालते हैं और दुष्टों का अंत करते हैं। भगवान का हर कदम उनके भक्तों की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए ही होता है — चाहे वह किसी अजगर के मुख में प्रवेश करना ही क्यों न हो।

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी असीम बुद्धि और शक्ति से असंभव को संभव कर दिखाया। उन्होंने अघासुर के गले में स्वयं को विस्तारित कर उसके प्राण रोक दिए — इस प्रकार राक्षस का वध हुआ और साथ ही अपने प्रिय ग्वालबालों और बछड़ों को पुनर्जीवित कर दिया। यह घटना “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्” का दिव्य उदाहरण है — जहाँ भगवान एक ही समय में भक्तों की रक्षा और दुष्टों के संहार दोनों करते हैं।

अघासुर की मृत्यु के बाद उसका तेज आकाश में प्रकट होकर चारों ओर प्रकाश फैलाने लगा और फिर कृष्ण के शरीर में विलीन हो गया। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान के संपर्क में आने वाला कोई भी जीव अंततः शुद्ध हो जाता है और मुक्ति प्राप्त करता है। यद्यपि अघासुर दैत्य था, फिर भी कृष्ण की करुणा से उसे सारूप्य-मुक्ति प्राप्त हुई — अर्थात् वैकुण्ठ में जाकर उसने विष्णु के समान दिव्य रूप धारण किया। भगवान की दया किसी सीमा में बंधी नहीं; वे अपने शत्रुओं तक को उद्धार प्रदान करते हैं।

इस घटना से यह भी शिक्षा मिलती है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य भगवान की महिमा का गुणगान करना है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता, कला और ज्ञान का उपयोग कृष्ण की स्तुति में करना चाहिए। यही धर्म का सार है — स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् — अर्थात् जीवन की पूर्णता तभी है जब वह भगवान को प्रसन्न करे।

इस प्रकार, अघासुर-वध की यह लीला केवल एक दैत्य के नाश की कथा नहीं, बल्कि यह दिखाती है कि भगवान की उपस्थिति में मृत्यु भी मुक्ति का द्वार बन जाती है। और वही जीवन सफल है, जो भगवान की महिमा में समर्पित हो जाता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने अघासुर का वध किया, तब उनकी महिमा से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आलोकित हो उठा। स्वर्गलोक से लेकर ब्रह्मलोक तक “जय! जय!” की ध्वनि गूँज उठी, और ब्रह्माजी स्वयं इस अद्भुत लीला को देखने के लिए पृथ्वी पर उतरे। उन्होंने देखा कि पाँच वर्षीय बालक कृष्ण ने सहज भाव से न केवल अपने सखाओं और बछड़ों को मृत्यु से बचाया, बल्कि अघासुर जैसे भयंकर दैत्य को भी मोक्ष प्रदान कर दिया — यह दृश्य ब्रह्मा को भी विस्मित कर देने वाला था।

यह लीला दिखाती है कि भगवान की करुणा असीम है। उनके लिए किसी को मारना भी उद्धार का माध्यम बन जाता है। अघासुर, जो दुष्ट भाव से कृष्ण को निगलना चाहता था, केवल एक क्षण के लिए कृष्ण का चिंतन कर सका — और उसी क्षणभंगुर स्मरण से उसे सारूप्य-मुक्ति प्राप्त हुई, अर्थात् वैकुण्ठ में जाकर उसने विष्णु के समान दिव्य रूप पाया। यह दर्शाता है कि भगवान का चिंतन, चाहे अनजाने में ही क्यों न हो, मुक्ति का कारण बन जाता है।

कृष्ण की कृपा का स्वभाव यही है — जो उनका नाम लेता है, स्मरण करता है, या किसी भी प्रकार से उनसे संबंध जोड़ता है, उसे वे अवश्य उद्धार करते हैं। जैसे पूतना ने शत्रुता से कृष्ण को विषपान कराया, फिर भी उसे माता का दर्जा मिला; उसी प्रकार अघासुर को भी भगवान ने वैकुण्ठ का स्थान दिया।

इस घटना में यह शिक्षा निहित है कि भक्ति का कोई भी प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात — भगवान के प्रति एक क्षण की भी भावना मनुष्य को महाभय अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकती है।

अतः, कृष्ण की लीलाएँ केवल कथाएँ नहीं, बल्कि जीव के कल्याण का जीवंत मार्गदर्शन हैं। जो व्यक्ति निरंतर भगवान का स्मरण, कीर्तन और चिंतन करता है, वह न केवल विमुक्ति पाता है, बल्कि भगवान के शाश्वत सहयोगी के रूप में दिव्य धाम में प्रवेश करता है। यही सार्थक जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।

इस प्रसंग का सार यह है कि महाराज परीक्षित, जो स्वयं अत्यंत विनम्र और भक्तिभाव से युक्त राजा थे, भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत बाल लीलाओं को सुनकर उनके प्रति और अधिक आकर्षित हो गए। उन्होंने शुकदेव गोस्वामी से यह जिज्ञासा प्रकट की कि अघासुर-वध की घटना, जो कृष्ण के कौमार्य में हुई थी, पौगण्ड अवस्था में पुनः प्रकट कैसे हुई — क्या यह भी भगवान की किसी विशेष योगमाया का चमत्कार था?

परीक्षित महाराज जानते थे कि भगवान की प्रत्येक लीला सामान्य नहीं होती; हर घटना में कोई गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ और योगशक्ति का रहस्य छिपा होता है। इसीलिए उन्होंने अपने गुरु से नम्रतापूर्वक निवेदन किया कि वे इस रहस्य को प्रकट करें। अपने शिष्य के प्रति स्नेह और भगवान के स्मरण से भावविभोर होकर शुकदेव गोस्वामी कुछ क्षणों के लिए बाह्य चेतना से रहित हो गए; उनके हृदय में कृष्ण की लीलाओं का भाव उमड़ आया। फिर उन्होंने अपने को संभालकर कृष्ण-कथा कहना प्रारंभ किया।

यह संवाद गुरु-शिष्य संबंध की पूर्णता को दर्शाता है — जहाँ गुरु, भगवद्-भाव में स्थित होकर, शिष्य की जिज्ञासा का समाधान करता है; और शिष्य विनम्रता से पूछता है, न कि अहंकारवश। परीक्षित का यह भाव दर्शाता है कि सच्ची विनम्रता और भक्ति से पूछे गए प्रश्न स्वयं भगवान की उपस्थिति को आकर्षित करते हैं।

अतः यह प्रसंग केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भक्ति के रहस्य का उद्घाटन है — कि जब मनुष्य भगवान की कथाओं को श्रवण करने के लिए उत्कंठित और विनम्र बनता है, तब स्वयं भगवान उसकी बुद्धि को प्रकाशित करते हैं और हृदय को शुद्ध कर देते हैं।

All glories to Srila Prabhupada 🙏 
Hare Krishna 🙏 

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