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उद्धव का जीवन और उनके भावों की स्थिति यह दर्शाती है कि सच्ची भक्ति केवल कर्म या बुद्धि नहीं, बल्कि प्रेममय स्मरण का विषय है। जब विदुर ने उनसे भगवान कृष्ण के विषय में पूछना आरंभ किया, तो उद्धव भगवान के नाम से ही भावविभोर हो गए — उनकी स्मृति में लीन होकर वे कुछ क्षणों तक बोल ही नहीं पाए। बचपन से ही वे भगवान के नित्य सेवक थे; पाँच वर्ष की अवस्था में ही वे कृष्ण की मूर्तियों को सजाते, भोजन कराते और पूजा करते हुए उनमें साक्षात् भगवान का दर्शन करते थे। यही नित्य-सिद्ध भक्त का स्वभाव है — जो कभी भगवान को भूल नहीं सकता।
भगवद्भक्ति में ऐसा प्रशिक्षण केवल नियमों से नहीं आता, बल्कि हृदय की जागृति से आता है। उद्धव जैसे भक्तों का जन्म ऐसे परिवारों में होता है जहाँ भगवान की पूजा और भक्ति स्वाभाविक वातावरण का हिस्सा होती है, जिससे आत्मा की सुप्त भक्ति जागृत हो जाती है। यही कारण है कि भगवद्गीता कहती है — भक्ति में बाधित हुआ योगी अगले जन्म में पुण्य परिवार में जन्म लेकर पुनः भक्ति का अभ्यास करता है।
उद्धव की वृद्धावस्था में भी उनकी भक्ति पहले जैसी ही प्रगाढ़ थी। भौतिक कार्यों में उम्र के साथ उत्साह घटता है, परंतु भक्ति में नहीं; क्योंकि यह आत्मा का कार्य है, शरीर का नहीं। भगवान की सेवा में वृद्धावस्था कोई बाधा नहीं, बल्कि अनुभव और प्रेम की गहराई का प्रमाण है।
जब विदुर ने भगवान के संदेश पूछे, तो उद्धव कृष्ण के स्मरण में इतने डूब गए कि शरीर की चेतना खो बैठे। उनके शरीर में भक्ति के लक्षण प्रकट हुए — रोमांच, अश्रु, कांपना, गला रुद्ध होना — जो केवल दिव्य प्रेम से उत्पन्न होते हैं, किसी अभ्यास से नहीं। ये महाभाव के लक्षण हैं, जो केवल परम शुद्ध भक्तों में प्रकट होते हैं।
विदुर ने जब यह सब देखा, तो वे समझ गए कि उद्धव अब भगवान के प्रेम में पूर्णतः डूब चुके हैं। उनकी अवस्था यह सिखाती है कि भक्ति एक क्रमिक यात्रा है — नियम से आरंभ होकर, अनुभव में स्थिर होकर, अंततः प्रेम और आत्मविस्मृति में परिणत होती है।
श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति-रसामृत-सिंधु में इसी भक्ति के विज्ञान को व्यवस्थित रूप से समझाया है — कैसे श्रवण, कीर्तन और स्मरण की साधारण क्रियाएँ अंततः भगवान के प्रति अनन्य प्रेम में परिणत होती हैं। उद्धव की दशा उसी सिद्धावस्था का जीवंत उदाहरण है — जहाँ भक्ति, भगवान की उपस्थिति और उनका स्मरण, सब एक हो जाते हैं।
उद्धव का मन भगवान के स्मरण में इतना लीन था कि वे कुछ क्षणों के लिए दिव्य लोक में ही स्थित हो गए — जहाँ भक्त और भगवान में कोई भेद नहीं रहता। लेकिन जब उन्होंने विदुर से संवाद करने का संकल्प किया, तो वे मानो उस परमधाम से मानव लोक में लौट आए। शुद्ध भक्त के लिए भगवान का स्मरण ही उनका निवास है; वह देह से बंधा नहीं होता, क्योंकि उसका मन और चेतना सदैव भगवान की सेवा में लीन रहती है। यही कारण है कि उद्धव एक साथ भगवान के लोक में भी थे और पृथ्वी पर भी — वे सच्चे अर्थों में जीवन-मुक्त थे।
भगवान कृष्ण के अंतर्धान के बाद उद्धव का हृदय गहरे शोक से भर गया। उन्होंने भगवान की तुलना सूर्य से की — जैसे सूर्य अस्त होता है तो सब ओर अंधकार फैल जाता है, वैसे ही भगवान के अंतर्धान से सारा जगत अज्ञान और दुःख में डूब गया। परंतु स्वयं भगवान न कभी अस्त होते हैं, न उदय — वे सदा कहीं न कहीं अपनी लीलाओं में विद्यमान रहते हैं। उनका “अंतर्धान” केवल दृष्टि से ओझल होना है, अस्तित्व से नहीं।
उद्धव को यह देखकर दुःख हुआ कि यदुवंश के सदस्य, जो सदा भगवान के सान्निध्य में रहे, फिर भी उन्हें पूर्ण रूप से नहीं पहचान पाए। वे उन्हें सर्वव्यापक परमात्मा तो मानते थे, पर परम पुरुषोत्तम भगवान के रूप में नहीं। यही दुर्भाग्य है — भगवान के इतने समीप होकर भी उन्हें केवल एक महान व्यक्ति या देवता समझ लेना। उद्धव की दृष्टि में यह मूर्खता वैसी ही है जैसे क्षीरसागर की मछलियाँ चंद्रमा को न पहचान सकीं — वह उनके बीच का नहीं था, फिर भी उन्होंने उसे “अपने जैसा” माना। इसी तरह, अज्ञानी लोग भगवान को मनुष्य समझते हैं।
शास्त्र कहते हैं कि भगवान को केवल विद्या, तर्क या पांडित्य से नहीं जाना जा सकता — केवल भक्ति और भगवान की कृपा से ही उनका साक्षात्कार संभव है। यदुवंशी विद्वान तो थे, पर कृपा के बिना वे दिव्य सत्य तक नहीं पहुँच सके। इसके विपरीत, वृंदावनवासी, जिन्हें किसी दार्शनिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं थी, भगवान को केवल प्रेम से पहचानते थे।
अंत में उद्धव यह स्पष्ट करते हैं कि भगवान के बारे में नास्तिकों की निंदा और मिथ्या कथन भक्तों को विचलित नहीं कर सकते। जो लोग श्रद्धाहीन होकर भगवान को साधारण मनुष्य कहते हैं, वे माया के बंधन में हैं। परंतु जिनके हृदय में भक्ति की ज्योति जलती है, उनकी बुद्धि अडिग रहती है — वे जानते हैं कि भगवान सदा पवित्र, सदा दिव्य और कर्मों से परे हैं। उद्धव के शब्दों में यही सच्चा वैराग्य और भक्ति का सार है — भगवान सदा हैं, पर उन्हें देखना केवल प्रेम से संभव है, तर्क से नहीं।
भगवान श्रीकृष्ण का अंतर्धान केवल दृश्य से ओझल होना था, न कि अस्तित्व से लोप। उन्होंने अपने शाश्वत, दिव्य रूप में ही पृथ्वी से प्रस्थान किया — उस रूप में जिसमें उन्होंने असंख्य लीलाएँ रचकर बद्धजीवों को अपने परमधाम की ओर आकर्षित किया था। जो भक्त धर्म और तपस्या द्वारा अपनी दृष्टि को पवित्र कर चुके थे, वे भगवान के उस दिव्य स्वरूप का साक्षात दर्शन कर सके और अंततः उनके साथ उनके धाम लौट गए। लेकिन जो लोग भौतिक इच्छाओं में बँधे रहे, वे भगवान को पहचान न सके और अंधकार में ही रह गए।
भगवान की लीलाएँ कभी रुकती नहीं — वे निरंतर किसी न किसी ब्रह्मांड में घटित होती रहती हैं, जैसे सूर्य एक स्थान पर अस्त होकर दूसरे स्थान पर उदय होता है। उनका शरीर भी वैकुंठ से निम्न नहीं, बल्कि और भी दिव्य है क्योंकि इस नश्वर जगत में उन्होंने अपनी करुणा से पतित आत्माओं को भी मुक्ति का मार्ग दिखाया। उनका यह “मानव-रूप” केवल बाह्य दृष्टि में मानव था; वास्तव में वह समस्त ऐश्वर्य, सौंदर्य और शक्ति का परम केंद्र था, जिसे देखकर देवता भी चकित रह गए।
उनकी मोहक सुंदरता ब्रह्मा और शंकर जैसे देवों से भी परे थी। देवताओं ने भी उन्हें ब्रह्मा की रचना माना, जबकि सत्य यह था कि स्वयं ब्रह्मा, कृष्ण की ही रचना थे। वे ही सर्वस्य प्रभव — सबके कारण और सबके नियंता हैं।
वृंदावन में उनकी बाल-लीलाएँ और गोपियों के साथ प्रेम का आदान-प्रदान भक्ति का सर्वोच्च शिखर हैं। गोपियों का प्रेम इतना शुद्ध था कि भगवान ने स्वयं स्वीकार किया कि वे उनके प्रेम का प्रतिदान नहीं दे सकते। यही कारण है कि कहा गया — कृष्ण कभी वृंदावन से बाहर नहीं जाते; वे सदैव वहाँ के भक्तों के प्रेम में स्थित रहते हैं।
जब भगवान और उनके भक्तों के बीच विरोधी शक्तियों का टकराव होता है — जैसे कंस और वसुदेव के बीच — तब भगवान अपनी करुणा से प्रकट होते हैं। वे अग्नि की भाँति घर्षण से उत्पन्न नहीं, बल्कि अपनी दया से प्रकट होते हैं। जब भक्तों को पीड़ा दी जाती है, भगवान उसी क्षण साक्षात् अवतरित होते हैं, जैसा कि उन्होंने कंस के अत्याचार के समय किया। वे अपने पूर्ण अंशों — नारायण, विष्णु, पुरुषावतारों — के साथ प्रकट होते हैं, क्योंकि वे ही कृष्णस् तु भगवान् स्वयं हैं।
उनका प्राकट्य और तिरोभाव दोनों ही दिव्य हैं — जैसे सूर्य उदय और अस्त होकर भी अपनी ज्योति कभी नहीं खोता, वैसे ही भगवान कृष्ण भी अनादि और अनन्त हैं। वे केवल उन लोगों की दृष्टि से ओझल होते हैं जो उन्हें देखने की योग्यता नहीं रखते। उनके दिव्य शरीर, लीलाओं और करुणा को समझना केवल भक्ति से संभव है — न विद्या से, न तपस्या से, न तर्क से।
उद्धव जब भगवान कृष्ण की लीलाओं पर चिंतन करते हैं — कि कैसे अजन्मा परमेश्वर वसुदेव के कारागार में जन्म लेते हैं, कंस के भय से गोकुल में गुप्त रूप से रहते हैं, और असीम शक्तिशाली होते हुए भी मथुरा से “भागते” हैं — तो उनका हृदय विस्मय और भाव-विह्वलता से भर जाता है। उन्हें ज्ञात है कि ये सब भगवान की लीलाएँ हैं, जो केवल आनंद और प्रेम के आदान-प्रदान के लिए होती हैं, फिर भी वे करुण भाव से व्यथित हो उठते हैं। सर्वशक्तिमान भगवान विरोधी स्थितियों को एक साथ प्रकट करते हैं — वे अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, निर्भय होकर भी भय दिखाते हैं, और सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी अपने भक्तों के अधीन होकर विनम्र बन जाते हैं। यही उनकी परम माधुर्य-लीला का रहस्य है।
कृष्ण ने अपने पिता वसुदेव के प्रेम को आदर देने के लिए उनके निर्देशों का पालन किया, यद्यपि वे सर्वशक्तिमान थे। उन्होंने कंस के भय से घर से दूर रहकर भी अपने माता-पिता से क्षमा मांगी — यह विनम्रता उनके दिव्य चरित्र की उज्जवल छवि है। उन्होंने संसार को यह सिखाया कि परमेश्वर भी अपने माता-पिता की सेवा करना अपना धर्म समझते हैं। इस विनम्रता में ही उनकी सर्वश्रेष्ठ महिमा छिपी है।
उद्धव इस सोच से भर उठते हैं कि जिनके चरणों की धूल देवता भी प्राप्त करने के लिए तरसते हैं, वही भगवान अपने भक्तों के समान व्यवहार करते हैं, अपने पिता की गोद में खेलते हैं और संसार के नियमों के अधीन होने का अभिनय करते हैं।
फिर वे स्मरण करते हैं कि कैसे भगवान ने अपने शत्रुओं तक पर कृपा की — जैसे शिशुपाल, जिसने उन्हें अपमानित किया, परंतु भगवान ने उसे मारकर भी मुक्ति दी। वह उनकी दया का चरम प्रमाण था; क्योंकि भगवान के संपर्क से शत्रु भी ब्रह्मज्योति में विलीन होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
कुरुक्षेत्र के वे योद्धा जिन्होंने कृष्ण का सुंदर मुख देखा, चाहे शत्रु पक्ष में ही क्यों न रहे हों, वे भी भगवान के दर्शन से शुद्ध होकर वैकुंठ लोक को प्राप्त हुए। उनके भीतर छिपा हुआ प्रेम जाग उठा, और उन्होंने मृत्यु में भी मुक्ति पाई।
उद्धव अपने को उन सब से भी अधम मानते हैं क्योंकि वे केवल भगवान के वियोग में रो रहे हैं, जबकि वे योद्धा भगवान का दर्शन करके परम शांति को प्राप्त हुए। यही उनकी विनम्रता और प्रेम का सौंदर्य है — कि भगवान के निकट रहकर भी वे अपने को अयोग्य समझते हैं। उनके हृदय में भगवान के विरह का दर्द ही भक्ति की सर्वोच्च अवस्था बन गया।
भगवान श्रीकृष्ण समस्त त्रिदेवों — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — के भी स्वामी हैं। वे तीनों लोकों, तीनों गुणों और सभी शक्तियों — चित्, माया और तटस्थ — के नियंत्रक हैं। असंख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और शेषनाग भी उनके चरणों की पूजा करते हैं, अपने मुकुट उनके चरणों पर अर्पित करते हुए उन्हें सर्वोच्च मानते हैं। वे सभी ऐश्वर्यों के पूर्ण स्वामी हैं और उनसे बड़ा या समान कोई नहीं। प्रत्येक जीव का परम कर्तव्य यही है कि वह पूर्ण श्रद्धा से उनके चरणों में समर्पित हो जाए।
फिर भी, यह अद्भुत है कि यही सर्वेश्वर भगवान अपने भक्तों और बड़ों के प्रति इतने विनम्र रहते हैं — उग्रसेन, वसुदेव, बलराम जैसे वरिष्ठों के सामने आदरपूर्वक खड़े होकर उनसे अनुमति लेते हैं; माता यशोदा के सम्मुख बालक बन जाते हैं; और गोपियों के सामने प्रेममय नटखट बालक की भूमिका निभाते हैं। यह उनकी माधुर्य-शक्ति का रहस्य है — परमेश्वर होकर भी अपने भक्तों के अधीन हो जाना। जो लोग उनकी दिव्यता को नहीं समझते, वे उन्हें साधारण मनुष्य मानकर भ्रमित हो जाते हैं।
उनकी दया असीम है — यहाँ तक कि राक्षसी पूतना, जो उन्हें विष पिलाने आई थी, उसे भी उन्होंने माता का पद दिया, क्योंकि उसने केवल मातृत्व का अभिनय किया था। भगवान किसी जीव की छोटी-सी सद्भावना को भी स्वीकार करके उसे महान फल देते हैं। इसीलिए उद्धव भावविभोर होकर कहते हैं कि उनसे अधिक दयालु और कौन हो सकता है?
भगवान का यह करुणा-स्वरूप शत्रुओं तक पर प्रकट हुआ। शिशुपाल जैसे राक्षस, जो उनसे घृणा करते थे, उनके द्वारा मारे जाकर भी मुक्ति को प्राप्त हुए, क्योंकि भगवान का स्पर्श स्वयं मोक्षदायक है। उद्धव अपनी विरहावस्था में सोचते हैं कि वे भी ऐसे असुरों से कम भाग्यशाली हैं, जिन्होंने युद्ध के समय भगवान के साक्षात् दर्शन किए। किंतु वास्तव में भक्त उनसे कहीं अधिक धन्य हैं, क्योंकि वे केवल मुक्ति नहीं, बल्कि भगवान की संगति — शाश्वत सेवा और प्रेम — को प्राप्त करते हैं।
भगवान का अवतार सदा भक्तों की पुकार और ब्रह्मा जैसी दिव्य आत्माओं की प्रार्थना पर होता है। वे किसी कर्म या बाध्यता से नहीं आते; वे करुणा से आते हैं — धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश और जीवों को अपने धाम लौटाने के लिए। उनका जन्म, कर्म, और अंतर्धान — सभी दिव्य हैं, और इन लीलाओं का उद्देश्य केवल एक है — संसार को उनकी अनन्त कृपा का अनुभव कराना।
भगवान श्रीकृष्ण कंस से भयभीत नहीं थे, परंतु अपने भक्त-पिता वसुदेव की प्रेमपूर्ण इच्छा पूर्ण करने और नंद-यशोदा को दिव्य आनंद देने के लिए वे वृंदावन गए। वहाँ उन्होंने ग्यारह वर्षों तक बाल और किशोर रूप में अनगिनत लीलाएँ कीं — गायें चराईं, ग्वालबालों के साथ क्रीड़ा की, राक्षसों का संहार किया और सबको अपने स्नेह से मोहित कर दिया।
वृंदावन में उनकी प्रत्येक क्रिया प्रेम का खेल थी। यमुना तट के सुंदर उपवनों में वे अपने सखा-बालकों के साथ गाय-बछड़ों की देखभाल करते, वृक्षों के फलों का आस्वाद करते, और अपनी बांसुरी की मधुर ध्वनि से सम्पूर्ण ब्रजभूमि को मोहित करते थे। उनकी बांसुरी की ध्वनि ऐसा दिव्य आनंद देती थी, जिससे ब्रह्मानंद तक फीका पड़ जाता था। ग्वालबाल, जो पूर्वजन्मों में महान योगी और ऋषि थे, इतने भाग्यशाली बने कि वे स्वयं भगवान के सखा बन गए।
कंस ने उन्हें मारने के लिए अनेक मायावी राक्षस भेजे — पूतना, अघासुर, बकासुर, प्रलंबासुर, तृणावर्त आदि — किंतु बालक कृष्ण ने उन सबका सहजता से अंत कर दिया, मानो कोई बच्चा अपने खिलौनों से खेल रहा हो। यह उनकी सर्वशक्ति का प्रमाण था — वे बालक होकर भी अनंत थे।
उनकी लीलाएँ केवल वृंदावनवासियों को ही दृष्टिगोचर होती थीं, जो उन्हें ईश्वर नहीं, अपने पुत्र, भाई या मित्र के रूप में प्रेम करते थे। यही प्रेम भगवान के लिए सर्वोच्च आनंद का कारण था — कि लोग उन्हें अपनी ममता से बाँध लें।
भगवान ने अपने जीवन से यह शिक्षा दी कि वास्तविक धन गायों और अन्न में है, और समाज का कल्याण तभी संभव है जब मानवता गाय-माता और बैल-पिता की रक्षा करे। उन्होंने स्वयं ग्वालबाल बनकर दिखाया कि सरलता, स्नेह और कर्तव्य ही जीवन का सार है।
इस प्रकार कृष्ण की बाल और किशोर लीलाएँ केवल कथा नहीं, बल्कि प्रेम, कर्तव्य और भक्ति के परम आदर्श हैं — जहाँ सर्वशक्तिमान ईश्वर भी अपने भक्तों के स्नेह में बंधकर बालक बन जाते हैं, और वही उनका परम वैभव है।
वृंदावन में जब यमुना का जल कालिय नाग के विष से दूषित हो गया, तो भगवान कृष्ण ने जल में प्रवेश कर उस सर्प को दंड दिया और उसे वहाँ से निकाल दिया। उन्होंने स्वयं गायों को वही जल पिलाकर सिद्ध किया कि नदी फिर से पवित्र हो गई है। इस प्रकार उन्होंने अपने भक्तों को भय से मुक्त किया और दिखाया कि परमेश्वर के संकल्प से प्रकृति भी शुद्ध और शुभ बन जाती है।
इसके बाद भगवान ने अपने पिता नंद महाराज को यह शिक्षा दी कि सच्ची पूजा देवताओं की नहीं, बल्कि भगवान की प्रिय गोवर्धन पर्वत और गौओं की होनी चाहिए। इंद्र यज्ञ को रोककर उन्होंने यह सिद्ध किया कि सभी देवता केवल भगवान के सेवक हैं और वास्तविक उपासना वही है जो सीधे भगवान को प्रसन्न करे। उन्होंने मानव समाज को सिखाया कि अपने धन और श्रम का उपयोग केवल भक्ति और सेवा के कार्यों में ही करना चाहिए — विशेषकर गौ-संरक्षण और भूमि के संरक्षण में। जब मनुष्य अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करता है, तभी जीवन सफल होता है।
इंद्र ने अपने मान के आहत होने पर व्रजभूमि पर भयंकर वर्षा की, परंतु करुणामय भगवान ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर सबकी रक्षा की। यह केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह भी शिक्षा थी कि भगवान अपने भक्तों की शरण ग्रहण करने पर उन्हें किसी भी संकट से बचाते हैं।
वृंदावन छोड़ने से पहले भगवान ने शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात में गोपियों के साथ रासलीला की — वह लीला जहाँ प्रेम की परम पूर्णता प्रकट होती है। वह रात भौतिक आकर्षण का नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मधुर मिलन का प्रतीक थी। यहीं उद्धव ने भगवान की लीलाओं का वर्णन रोक दिया — क्योंकि वृंदावन की लीलाएँ अनन्त हैं, और उनका सार केवल एक है — भगवान का प्रेम अपने भक्तों के प्रति और भक्तों का समर्पण अपने प्रिय प्रभु के चरणों में।
All glories to Srila Prabhupada 🙏
Hare Krishna 🙏
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