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यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत और विविध लीलाओं का संक्षिप्त सार प्रस्तुत करता है, जिनसे उनका परम दिव्य स्वरूप प्रकट होता है। भगवान ने जब मथुरा प्रवेश किया, तो उन्होंने केवल सोलह वर्ष की आयु में ही अत्याचारी कंस का वध करके अपने माता-पिता को बंधन और भय से मुक्त किया। यह केवल एक वीरता नहीं थी, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना और भक्तों के रक्षक के रूप में भगवान के कार्य का उदाहरण था।

इसके बाद भगवान ने अपने गुरु सान्दिपनि मुनि से शिक्षा ग्रहण की — यह दिखाने के लिए कि यद्यपि वे सर्वज्ञ हैं, फिर भी वे आदर्श शिष्य के रूप में गुरु की सेवा करते हैं। अपने गुरु की प्रसन्नता के लिए उन्होंने उनके मृत पुत्र को यमलोक से वापस लाकर यह सिद्ध किया कि वे समय, मृत्यु और कर्म के भी स्वामी हैं। यह दर्शाता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से भगवान की सेवा करता है, उसकी सेवा व्यर्थ नहीं जाती — भगवान स्वयं उसका ऋण स्वीकार करते हैं।

रुक्मिणी-हरण की लीला भगवान की दिव्य प्रेममयी सत्ता को प्रकट करती है। रुक्मिणी, जो लक्ष्मीस्वरूपा थीं, केवल भगवान की ही थीं। जब उनका विवाह अधर्मपूर्वक शिशुपाल से कराने का प्रयास हुआ, तो भगवान ने स्वयं आकर उन्हें उठा लिया, जैसे गरुड़ ने अमृत ले लिया था। यह दिखाता है कि भगवान अपने भक्तों को कभी अधर्म के हाथों नहीं छोड़ते।

नाग्निजिती विवाह में सात शक्तिशाली बैलों को वश में करना भगवान की वीरता का प्रतीक था। वे सदा धर्म के अनुसार कार्य करते हैं और किसी भी प्रतियोगिता में अपनी अजेय शक्ति से विजय प्राप्त करते हैं, परंतु उनके हृदय में केवल भक्तों के प्रति करुणा होती है।

सत्यभामा की इच्छा पूरी करने के लिए स्वर्ग से पारिजात वृक्ष लाना यह दर्शाता है कि भगवान अपने भक्त की छोटी से छोटी इच्छा को भी अपने प्रेम से पूर्ण करते हैं। यह लीला यह नहीं दिखाती कि भगवान किसी के अधीन हैं, बल्कि यह प्रकट करती है कि वे अपने भक्त की भक्ति के अधीन होना अपनी महिमा मानते हैं।

इंद्र का मोह और अज्ञान यह दर्शाता है कि अहंकार में डूबा देवता भी भगवान के स्वरूप को समझ नहीं पाता। कृष्ण ने कोई स्वर्गीय वस्तु चुराई नहीं, बल्कि यह सिद्ध किया कि संपूर्ण सृष्टि उन्हीं की है, और वे सबके परम स्वामी हैं।

इन सभी लीलाओं में एक ही तत्त्व स्पष्ट होता है — भगवान का प्रत्येक कार्य केवल प्रेम, करुणा और धर्म की स्थापना के लिए होता है। वे अपने भक्तों के सुख के लिए स्वयं हर भूमिका निभाते हैं — चाहे वह रक्षक हों, शिष्य हों, पति हों या मित्र — किंतु इन सबमें वे सदा परम स्वतंत्र, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान बने रहते हैं।

यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण की करुणा, सर्वशक्ति और भक्तवत्सलता को उजागर करता है। नरकासुर, जो पृथ्वी देवी का पुत्र था, मूलतः दिव्य कुल में जन्मा होते हुए भी कुसंगति के कारण राक्षस बन गया। यह दर्शाता है कि जन्म से अधिक संगति और संस्कार मनुष्य का स्वभाव तय करते हैं। जब उसने स्वर्ग और पृथ्वी पर अत्याचार किया, तो भगवान ने उसका वध किया — यह केवल अधर्म का अंत नहीं था, बल्कि उसके उद्धार का भी आरंभ था। भगवान ने उसकी माता पृथ्वी की प्रार्थना स्वीकार कर उसके पुत्र को राज्य वापस दिया, जिससे उन्होंने दया और न्याय दोनों का संतुलन दिखाया।

भगवान जब नरकासुर के महल में प्रवेश करते हैं, तो वहाँ बंदी बनाकर रखी गई अनेक राजकुमारियाँ उन्हें देखकर उद्धार का अनुभव करती हैं। भगवान के दर्शन मात्र से उनका भय मिट गया, क्योंकि वे जानती थीं कि वही सच्चे रक्षक और स्वामी हैं। वे सभी लज्जा, आशा और प्रेम से भरकर भगवान से विवाह का प्रस्ताव रखती हैं, क्योंकि अब उनके लिए कोई अन्य आश्रय शेष नहीं था। भगवान ने अपनी अचिन्त्य योगशक्ति से एक साथ अनेक रूप धारण कर प्रत्येक राजकुमारी से विवाह किया — यह दर्शाता है कि वे अनंत रूपों में एक ही समय में उपस्थित रह सकते हैं, और प्रत्येक भक्त के साथ व्यक्तिगत संबंध बना सकते हैं। यही उनकी योगमाया की अद्भुत लीला है, जो उनके प्रेम का गूढ़ स्वरूप प्रकट करती है।

भगवान ने प्रत्येक पत्नी से समान गुणों वाली संतानें उत्पन्न कीं, यह दर्शाने के लिए कि वे अपने प्रत्येक भक्त के जीवन में पूर्णता और आनंद का संचार करते हैं। उनकी लीला भौतिक कामना से रहित है; वह केवल अनुग्रह और भक्ति-संबंध का विस्तार है।

मगध के राजा, कालयवन और शाल्व के आक्रमण के समय भगवान ने स्वयं युद्ध न करते हुए अपने भक्तों को यश देने की योजना बनाई। उन्होंने मुचुकुंद और भीम जैसे भक्तों को माध्यम बनाकर उन राक्षसों का विनाश कराया। इस प्रकार भगवान यह सिखाते हैं कि वे अपने भक्तों के माध्यम से कार्य करते हैं और उन्हें गौरव प्रदान करते हैं। स्वयं रणछोड़ कहलाना भी उनकी विनम्रता का प्रतीक है, क्योंकि उनके लिए कीर्ति का अर्थ केवल अपने भक्तों की कीर्ति बढ़ाना है।

इस प्रकार यह कथा स्पष्ट करती है कि भगवान के प्रत्येक कार्य में केवल भक्ति और करुणा का विज्ञान छिपा है — वे अधर्मियों का नाश करते हुए भी किसी को तिरस्कृत नहीं करते, अपितु सबको उद्धार का अवसर देते हैं, और अपने भक्तों को अपने समान सम्मान देकर उनका जीवन पवित्र बना देते हैं।

यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण की करुणा, नीति और दिव्य योजना की गहराई को प्रकट करता है। उन्होंने शम्बर, द्विविद, बाण, मुर और बल्वल जैसे अनेक दुष्ट राजाओं और राक्षसों का संहार करके पृथ्वी को अधर्म के बोझ से मुक्त किया। कुछ राक्षसों को उन्होंने स्वयं मारा, और कुछ का अंत अपने भक्तों — जैसे बलराम आदि — के हाथों कराया। यह दर्शाता है कि भगवान केवल विनाश नहीं करते, बल्कि भक्तों को अपनी लीलाओं में सहभागी बनाकर उन्हें गौरव प्रदान करते हैं।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में भगवान ने धर्म की स्थापना के लिए पाण्डवों का साथ दिया, किन्तु जब दुर्योधन मरणासन्न अवस्था में भूमि पर पड़ा, तब भी भगवान प्रसन्न नहीं हुए। यह दिखाता है कि वे पापी के दंड में भी आनंद नहीं पाते, क्योंकि प्रत्येक जीव उनके ही अंश हैं। वे पापियों के लिए कठोर और भक्तों के लिए असीम करुणामय हैं। जब जीव अपने स्वार्थ और कुसंगति से धर्म के मार्ग से भटकता है, तब वह स्वयं अपने पतन का कारण बनता है।

भगवान ने जब कहा कि पृथ्वी का भार अभी पूरी तरह हल्का नहीं हुआ है, तो उनका संकेत जनसंख्या या भौतिक वजन की ओर नहीं था, बल्कि अधर्म और आसक्ति के भार की ओर था। पृथ्वी का वास्तविक भार दुष्ट प्रवृत्तियाँ हैं, न कि प्राणियों की अधिकता। जो लोग ईश्वर के अनुरूप आचरण करते हैं, वे पृथ्वी के लिए सुख का कारण बनते हैं, और जो अधर्म में डूबते हैं, वही उसके लिए बोझ हैं।

भगवान ने यह भी कहा कि यदुवंश — जो स्वयं उनके अंशों से उत्पन्न था — का भी अंत आवश्यक है। यह कोई दंड नहीं था, बल्कि उनकी दिव्य लीलाओं के पूर्ण होने का संकेत था। भगवान और उनके पार्षद किसी भौतिक नियम के अधीन नहीं हैं; उनका प्रकट होना और लुप्त होना केवल भगवान की इच्छा से होता है। यदुवंश का आपसी संघर्ष और विनाश भी एक नियोजित लीला थी, जो केवल भगवान की इच्छा के पूर्ण होने का माध्यम बनी।

भगवान अपने भक्तों के माध्यम से ही अपने कार्य संपन्न करते हैं — कभी उन्हें योद्धा बनाते हैं, कभी सहायक, और कभी त्यागी। भक्त उनके हाथों का यंत्र बनकर, अपनी स्वतंत्रता भी उन्हें अर्पित करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि भगवान की इच्छा में ही उनका जीवन पूर्ण है। यही भक्ति का परम रहस्य है — भगवान की प्रत्येक लीला में उनकी करुणा और प्रेम ही छिपा होता है, चाहे वह युद्ध हो, विनाश हो या विरह।

भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि पृथ्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना हो चुकी है, तो उन्होंने मन ही मन निर्णय किया कि धर्मराज युधिष्ठिर को सम्राट बनाकर संसार के लिए एक आदर्श शासन की स्थापना की जाए। इस प्रकार उन्होंने युधिष्ठिर को ईश्वर-प्रेरित नेतृत्व का प्रतीक बनाया — ऐसा शासन जिसमें राजा स्वयं भगवान के प्रतिनिधि की तरह, धर्म, न्याय और करुणा से युक्त होकर प्रजा का मार्गदर्शन करे।

अश्वत्थामा द्वारा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित का भ्रूण नष्ट कर दिया गया था, लेकिन भगवान ने स्वयं अपनी दिव्य शक्ति से गर्भ में प्रवेश कर उस शिशु को पुनर्जीवित किया। यह लीला इस सत्य को प्रकट करती है कि जीव आत्मा और शरीर भिन्न हैं, और परमात्मा की इच्छा से आत्मा को नया शरीर मिल सकता है। परीक्षित का जीव कोई साधारण आत्मा नहीं था; वह भगवान की योजना के अनुसार पांडव वंश की निरंतरता और धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुआ था।

भगवान ने युधिष्ठिर को तीन अश्वमेध यज्ञ करने की प्रेरणा दी, जिससे उन्होंने अपने छोटे भाइयों के साथ मिलकर धर्मपूर्वक पृथ्वी का शासन किया। यह शासन किसी सांसारिक सत्ता का नहीं, बल्कि भगवान की इच्छा का प्रतिबिंब था। राजा और प्रजा दोनों भगवान की योजना के अनुरूप जीवन व्यतीत करते थे, और प्रकृति उनके शासन में पूर्ण सहयोग करती थी। ऐसा शासन सुख, शांति और संतुलन से भरा हुआ था क्योंकि वह ईश्वर-केंद्रित था।

द्वारका में भगवान स्वयं राजसी जीवन व्यतीत करते हुए भी वैदिक मर्यादाओं और वैराग्य के सिद्धांतों का पालन करते थे। वे सांख्य-दर्शन में प्रतिपादित ज्ञान और वैराग्य के स्वरूप में स्थित थे — भोग में नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार में लीन। वे यह示ाते थे कि मनुष्य को शरीर की आवश्यकताओं का संतुलित निर्वाह करते हुए भी, आत्मा के लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होना चाहिए।

हालाँकि वे सृष्टि के सर्वाधिपति हैं, फिर भी उन्होंने वैदिक नियमों के अनुसार एक गृहस्थ और राजा के रूप में आचरण किया, ताकि मानवता के लिए आदर्श प्रस्तुत कर सकें। वे त्यागी होकर भी आनंदमय थे, विरक्त होकर भी स्नेहपूर्ण थे — क्योंकि उनका वैराग्य संसार से नहीं, बल्कि मायिक आसक्ति से था।

जब वे द्वारका में लक्ष्मीजी के धाम में निवास करते थे, तो उनका रूप मधुरता, सौम्यता और दिव्य आनंद से भरा था। उनका हर कार्य, हर मुस्कान, हर वचन और हर गुण आध्यात्मिक रस से ओतप्रोत था। वे अपरा (भौतिक) शक्ति से तो पूर्णतः निरपेक्ष थे, किन्तु अपनी परा शक्ति — जो आनंद और प्रेम की मूर्ति है — के साथ नित्य एकत्व में रहते थे। यही भगवान का वास्तविक स्वरूप है — पूर्ण ज्ञान, पूर्ण विरक्ति और पूर्ण प्रेम का संगम।

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ इस संसार और परलोक दोनों में आनंद का स्रोत थीं। उन्होंने यदुवंशियों, देवताओं और अपने शुद्ध भक्तों के साथ रहते हुए प्रेम और माधुर्य से परिपूर्ण जीवन व्यतीत किया। यद्यपि वे समस्त भौतिक आसक्ति से परे हैं, फिर भी उन्होंने अपनी आंतरिक शक्ति के माध्यम से अपनी पत्नियों और भक्तों के प्रति स्नेह प्रकट किया — यह कोई सांसारिक आसक्ति नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम की लीला थी। उनकी प्रत्येक रानी वास्तव में उनकी पराशक्ति का एक अंश थी, जो उनके अनंत आनंद स्वरूप का विस्तार थी, जैसे चंद्रमा से निकलती अनगिनत ज्योतियाँ।

भगवान ने अपने गृहस्थ जीवन में भी वैराग्य का आदर्श प्रस्तुत किया। यद्यपि वे सोलह हज़ार रानियों के पति थे, उनकी चेतना सदैव आत्मानंद में स्थित रही। उन्होंने मानव समाज को यह सिखाने के लिए कि गृहस्थ जीवन का अर्थ केवल इंद्रिय-सुख नहीं बल्कि कर्तव्य और संयम है, कई वर्षों तक गृहस्थ जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया। और जब समय आया, तो उन्होंने इस सांसारिक आसक्ति से पूर्णतः विरक्ति प्रदर्शित की — यह दिखाने के लिए कि मनुष्य को जीवन के अंत में सब कुछ त्यागकर ईश्वर-स्मरण में लीन होना चाहिए।

भगवान के इंद्रिय-कार्य दिव्य हैं; वे किसी भौतिक शक्ति से नियंत्रित नहीं होते। संसार में हर जीव इंद्रियभोग की इच्छा से प्रकृति के अधीन बंधा है, परंतु भगवान सर्वशक्तिमान हैं — उनकी प्रत्येक इंद्रिय स्वतंत्र और सर्वगामी है। वे देख कर सुन सकते हैं, सुन कर खा सकते हैं, और केवल इच्छा मात्र से सृष्टि कर सकते हैं। ऐसी दिव्यता को केवल भक्त ही समझ सकता है, क्योंकि भगवान के कर्म भक्ति के क्षेत्र में आते हैं, बुद्धि या तर्क के नहीं। जो व्यक्ति भक्ति-योग में प्रबुद्ध है, वही जानता है कि भगवान की हर लीला, चाहे वह विवाह हो, युद्ध हो या विश्राम, सब कुछ परात्पर आनंद और करुणा का विस्तार है।

जब यदुवंशी राजकुमारों के खेल-प्रसंग से महान ऋषि क्रोधित हुए, तब भी वह क्रोध भगवान की योजना का ही एक अंग था। यदुवंशियों को मिला “शाप” वस्तुतः भगवान की इच्छा का साधन था, जिससे उनकी पृथ्वी पर की गई लीलाओं का समापन होना था। ऋषियों और राजवंशियों के बीच यह घटना दिखाती है कि भगवान की प्रत्येक लीला नियोजित है — कोई संयोग नहीं।

अंततः, कुछ ही महीनों में समय पूर्ण हुआ। देवताओं के अवतार रूप यदुवंशी प्रभास तीर्थ की ओर गए, जहाँ उनकी लीलाओं का समापन हुआ, जबकि भगवान के शाश्वत पार्षद — जो उनके अनंत धाम के निवासी हैं — द्वारका में ही रहे। इस प्रकार भगवान की लीलाएँ पूर्ण हुईं, और उन्होंने संसार को यह दिखाया कि उनका प्रत्येक कर्म दिव्यता का प्रकटीकरण है — जहाँ प्रेम, वैराग्य, और करुणा एक साथ प्रकट होते हैं।

यदुवंशियों का प्रभास तीर्थ जाना केवल एक साधारण यात्रा नहीं थी, बल्कि वैदिक संस्कृति के गहरे सिद्धांतों का जीवंत उदाहरण था। वहाँ पहुँचकर उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया, पितरों, देवताओं और महर्षियों का तर्पण किया, और ब्राह्मणों को आदरपूर्वक दान दिया। यह दान केवल भौतिक नहीं था — उसमें श्रद्धा, कृतज्ञता और धर्म की भावना निहित थी। वे भूमि, गौएँ, स्वर्ण, वस्त्र, बिस्तर, घोड़े, हाथी और यहाँ तक कि कन्याएँ और आजीविका हेतु भूमि तक प्रदान करते थे, ताकि ब्राह्मण समाज पूर्ण समृद्धि से भगवान की सेवा कर सके।

इससे समाज की दिव्य संरचना झलकती है — जहाँ ब्राह्मण ज्ञान और यज्ञ द्वारा समाज का मार्गदर्शन करते थे, क्षत्रिय शासन और संरक्षण करते थे, और समाज के सभी वर्ग एक-दूसरे की सेवा में समरस होकर जीते थे। यह व्यवस्था जन्म पर नहीं, बल्कि गुण और कर्म पर आधारित थी। जब तक ब्राह्मण अपने आध्यात्मिक गुणों को बनाए रखते थे, समाज समृद्ध और संतुलित रहता था; लेकिन जब वे ब्रह्मबंधु बन गए — अर्थात केवल नाम के ब्राह्मण — तब सामाजिक पतन आरंभ हुआ।

यदुवंशियों ने भोजन भी पूर्ण वैदिक रीति से भगवान विष्णु को अर्पित कर ब्राह्मणों को वितरित किया। यह केवल दान नहीं था, बल्कि यज्ञभावना का प्रतीक था। भगवान को अर्पित भोजन ही पवित्र होता है; वही प्रसाद है जो सभी पापों से मुक्त करता है। जो भोजन भगवान को अर्पित नहीं किया गया, वह मनुष्य को पाप में बाँधता है। इस प्रकार उन्होंने दिखाया कि भक्ति के बिना कोई भी कर्म पूर्ण नहीं होता।

उनका आचरण यह सिखाता है कि मानव जीवन का सच्चा उद्देश्य भक्ति और सहयोग से भगवान को प्रसन्न करना है — गायों की रक्षा, ब्राह्मण संस्कृति की सुरक्षा, और भगवान की सेवा में जीवन समर्पण करना। यही सभ्यता की जड़ है।

यदुवंशियों का व्यवहार सर्वोच्च सुसंस्कृति का उदाहरण था, परंतु उनका बाद में ऋषियों से शापित होना केवल भगवान की योजना का भाग था — एक चेतावनी कि कोई भी, चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि ब्राह्मणों और वैष्णवों के प्रति असम्मान दिखाए, तो वह आध्यात्मिक पतन से नहीं बच सकता। उनके द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य भगवान की इच्छा से संचालित था, और उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची मानवता, कृतज्ञता और भक्ति में ही जीवन की पूर्णता निहित है।

All glories to Srila Prabhupada 🙏 
Hare Krishna 🙏 

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