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यह सम्पूर्ण प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य लीला-अंत का प्रतीक है, जिसमें यदुवंश का विनाश, भगवान का पृथ्वी से प्रस्थान और उद्धव का बदरिकाश्रम जाना — ये सब भगवान की अपनी योजना और इच्छा से सम्पन्न हुए। वृष्णि और भोज वंशजों का मदिरापान कर आपसी विवाद में पड़ना केवल बाह्य दृश्य था; भीतर से यह सब भगवान की “स्वात्मा-माया” द्वारा आयोजित था, ताकि उनके अवतरण कार्य की पूर्णता के बाद सभी दिव्य अंश अपने-अपने धाम लौट जाएँ।
मदिरा और अहंकार यहाँ अज्ञान और भौतिक मोह के प्रतीक हैं — जो विवेक हर लेते हैं और आत्म-विनाश का कारण बनते हैं। जैसे बाँसों के घर्षण से स्वयं अग्नि उत्पन्न होती है, वैसे ही भगवान की इच्छा से यदुवंशियों का अंत हुआ। कोई बाह्य शक्ति उन्हें परास्त नहीं कर सकती थी; उनका विनाश भी उनकी मुक्ति का ही माध्यम था।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं भी यह सब पूर्व से जानकर सरस्वती तट पर एक वृक्ष के नीचे विश्राम लिया — यह दर्शाता है कि भगवान के लिए जीवन-मरण, निर्माण-विनाश सब उनकी लीला का अंग हैं। उन्होंने उद्धव को बदरिकाश्रम भेजा, ताकि वे सांसारिक दुखों से दूर रहकर शुद्ध भक्ति, ज्ञान और वैराग्य में स्थिर रह सकें।
उद्धव का कथन — “मैंने जानते हुए भी उनका अनुसरण किया, क्योंकि भगवान से वियोग असह्य था” — भक्ति के सर्वोच्च भाव को प्रकट करता है। यह पूर्ण समर्पण की स्थिति है, जहाँ भक्त भगवान की इच्छा को जानकर भी उनसे अलग नहीं रह सकता। यह बताता है कि सच्चा प्रेम तर्क, भय या परिणाम से परे होता है — वह केवल भगवान के चरणों में रहने की अभिलाषा है।
इस प्रकार, यदुवंश का विनाश कोई शोक का विषय नहीं, बल्कि एक दिव्य लीला थी, जिसमें भगवान ने अपने भक्तों को लौकिक बंधनों से मुक्त कर उन्हें उनके शाश्वत धाम भेज दिया।
यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य विरक्त भाव और उनकी लीला के अंतिम चरण का अत्यंत गूढ़ दर्शन कराता है। उद्धव जब उन्हें सरस्वती नदी के तट पर बैठे देखते हैं, तो वह दृश्य संसारिक दृष्टि से एक संन्यासी के समान प्रतीत होता है — मानो कोई आश्रयहीन व्यक्ति वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहा हो। किंतु यह केवल बाह्य रूप है; वस्तुतः वे स्वयं सर्वाश्रय हैं — समस्त ब्रह्मांड उनके आश्रय में है। यही विरोधाभास उनका दिव्य सौंदर्य प्रकट करता है — जो सबके स्वामी हैं, वे स्वयं को आश्रयहीन के रूप में प्रस्तुत करते हैं ताकि उनके भक्तों को वैराग्य का आदर्श मिले।
भगवान का श्यामवर्ण, शांत नेत्र, चार भुजाएँ, पीताम्बर और कमल जैसी मुद्रा — यह सब उनकी सच्चिदानंद-विग्रह की महिमा दिखाते हैं। वे वट-वृक्ष के नीचे बैठे थे — यह प्रतीक है कि उन्होंने इस ब्रह्मांड में अपनी लीलाओं का समापन कर लिया है, परंतु उनका अस्तित्व कहीं घटा नहीं; वे बस एक स्थान से दूसरे ब्रह्मांड में अपने कार्य के लिए प्रस्थान करने वाले थे, जैसे सूर्य एक देश में अस्त होता है और दूसरे में उदय।
मैत्रेय मुनि का वहाँ पहुँचना संयोग नहीं, बल्कि भगवान की कृपा का परिणाम था। यद्यपि वे विद्वान और ज्ञानी थे, किंतु उद्धव की भक्ति शुद्ध थी, इसलिए भगवान ने विशेष स्नेह उद्धव को ही दिया। भगवान केवल प्रेम से आकर्षित होते हैं, ज्ञान या पद से नहीं। यह हमें सिखाता है कि भगवान तक पहुँचने का मार्ग दार्शनिक तर्क नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम है।
अंततः यह प्रसंग यह दिखाता है कि भगवान का विरक्त रूप भी उनके प्रेम और कृपा से भरा हुआ है। वे अपने भक्तों को अंतिम क्षण तक उपदेश, सान्निध्य और आदर्श देकर ही संसार से लीलापूर्वक प्रस्थान करते हैं।
यह प्रसंग उद्धव और भगवान श्रीकृष्ण के बीच अंतिम संवाद का अत्यंत गूढ़ और प्रेमपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता है। भगवान उद्धव को स्मरण कराते हैं कि प्राचीन काल में उन्होंने उनके सान्निध्य की इच्छा की थी — यह इच्छा केवल उन भक्तों की होती है जो जन्मों-जन्मों से भगवद्-संबंध की साधना में प्रवृत्त रहते हैं। भगवान, जो सबके हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं, प्रत्येक जीव की भावना, इच्छा और पूर्व संस्कारों को भलीभाँति जानते हैं और उसी अनुसार कृपा करते हैं। उद्धव का जीवन इस दिव्य कृपा का सर्वोच्च उदाहरण है।
भगवान उन्हें बताते हैं कि यह जीवन उनका अंतिम और सर्वोच्च जन्म है — क्योंकि उन्होंने पूर्ण भक्ति और भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त किया है। यह जीवन उन्हें वैकुंठ धाम की प्राप्ति का द्वार बना देता है। भगवान का अदृश्य होना वास्तव में केवल पृथ्वीवासियों का अनुभव है, जैसे सूर्य एक स्थान पर अस्त होकर दूसरे स्थान पर उदय होता है, वैसे ही भगवान अनंत लोकों में अपनी लीलाएँ निरंतर प्रकट करते रहते हैं।
भगवान उद्धव को यह भी बताते हैं कि वही दिव्य ज्ञान — जो सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा को प्रदान किया गया था और जिसे “श्रीमद्भागवतम्” कहा जाता है — उनके माध्यम से संसार में पुनः प्रकट होगा। यह ग्रंथ केवल भगवान की लीलाओं और स्वरूप के निरूपण के लिए है, किसी निर्गुण, निराकार अनुभव के लिए नहीं।
अंत में उद्धव भगवान से कहता है कि वह न धर्म, न अर्थ, न काम, न मोक्ष — इन चारों में से किसी की इच्छा नहीं रखता। उसका एकमात्र लक्ष्य है — भगवान के चरणकमलों की प्रेममयी सेवा। यही शुद्ध भक्ति का सार है — जहाँ कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं, केवल प्रेम से सेवा करने की उत्कंठा होती है। उद्धव की यह भावना दर्शाती है कि जब भक्त प्रेम से भगवान की सेवा में लीन हो जाता है, तब उसे स्वतः ही समस्त सिद्धियाँ, ऐश्वर्य और मुक्ति प्राप्त हो जाती हैं — परंतु उसे इनका कोई आकर्षण नहीं रहता, क्योंकि उसके लिए सबसे बड़ा सुख भगवान की सेवा में ही निहित है।
यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण और उद्धव के बीच हुए अत्यंत गूढ़ संवाद का सार है, जिसमें भगवान की लीलाओं के रहस्य, विरोधाभासों के पार्श्व और आत्मज्ञान के रहस्योद्घाटन को प्रकट किया गया है।
उद्धव भगवान से पूछते हैं कि वे निष्काम, अजन्मा, सर्वज्ञ और काल के स्वामी होकर भी मानो सामान्य मनुष्यों की भाँति कार्य क्यों करते हैं— जैसे युद्ध से बचकर किले में रहना, अनेक रानियों के साथ गृहस्थ जीवन जीना, अथवा उन्हें परामर्श देने के लिए किसी से विचार-विनिमय करना। ये सब दिव्य विरोधाभास बड़े-बड़े ज्ञानी जनों को भी भ्रमित कर देते हैं। लेकिन भगवान की हर क्रिया दिव्य है; वह भौतिक नहीं। उनके कार्य न तो कर्मफल से प्रेरित होते हैं और न अज्ञान से। वे केवल भक्तों की भक्ति बढ़ाने, उन्हें रक्षण देने और अपनी आंतरिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए ये लीलाएँ करते हैं। यही कारण है कि भगवान की निष्क्रियता और सक्रियता, दोनों ही दिव्य स्तर पर एक ही हैं।
उद्धव यह भी स्वीकारते हैं कि वे मोहग्रस्त नहीं, परंतु भगवान की लीला को देखने पर उनका हृदय श्रद्धा और विस्मय से भर उठता है। वे भगवान से वही ज्ञान माँगते हैं जो सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्माजी को दिया गया था — श्रीमद्भागवतम् के चतु:श्लोकी स्वरूप में। भगवान तब उन्हें “परम स्थिति” अर्थात् अपनी सर्वोच्च दिव्य अवस्था का रहस्य बताते हैं — जहाँ ज्ञान, भक्ति और प्रेम एकाकार हो जाते हैं। यह ज्ञान केवल बुद्धि से नहीं, प्रेम से प्राप्त होता है, और इसे वे केवल शुद्ध भक्तों को ही प्रकट करते हैं।
भगवान से यह ज्ञान प्राप्त कर उद्धव का हृदय गहरे वियोग से भर जाता है। वह अपने गुरु और स्वामी के वियोग को सहन नहीं कर पाते। यह विरह कोई सांसारिक पीड़ा नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम की पराकाष्ठा है, जिसे केवल वही समझ सकता है जो उद्धव या श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति की ऊँचाई तक पहुँचा हो।
अंततः यह शिक्षित करता है कि भगवान की लीलाएँ तर्क से नहीं, प्रेम से समझी जाती हैं। जो लोग अद्वैत या बौद्ध दर्शन की भाँति भगवान की निराकार व्याख्या करने का प्रयास करते हैं, वे उस प्रेमरस से वंचित रह जाते हैं। श्रीमद्भागवतम् केवल भक्तों के लिए है — उनके लिए जो प्रेम से भगवान के चरणों में समर्पित हैं। जब तक यह प्रेम-जागरण नहीं होता, तब तक भगवान की “परम स्थिति” का रहस्य अज्ञात ही रहता है।
यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण के वियोग में उद्धव की गहन भावावस्था और उनके जीवन के अंतिम उद्देश्य को उजागर करता है। भगवान से वियोग की तीव्र पीड़ा में उद्धव अपने प्राणों को संभालने के लिए भी असमर्थ हो जाते हैं। उनके लिए भगवान की अनुपस्थिति असहनीय है — किंतु वे जानते हैं कि भगवान की आज्ञा और भगवान स्वयं एक ही हैं। इसलिए, भगवान के निर्देशानुसार वे बदरिकाश्रम जाते हैं, जहाँ नर-नारायण ऋषि अनादिकाल से तपस्या कर रहे हैं। वहाँ जाकर उद्धव बाह्य रूप से भगवान से दूर होकर भी, आंतरिक रूप से उनके साथ निरंतर संगति में रहने का अभ्यास करते हैं।
बदरिकाश्रम का उल्लेख यहाँ केवल भौगोलिक स्थान के रूप में नहीं, बल्कि वैराग्य और साधना के शिखर के रूप में हुआ है। यह वही स्थान है जहाँ भक्त सांसारिक मोह से ऊपर उठकर दिव्य अनुभूति प्राप्त करता है। उद्धव जैसे भक्त की यात्रा यह दिखाती है कि भगवान से वियोग भी भगवान की सेवा का ही एक रूप है। जब भक्त भगवान की आज्ञा के पालन में जीता है, तो वह कभी भी वास्तव में उनसे अलग नहीं होता।
विदुर, जिन्होंने उद्धव से यह सब सुना, पहले शोकग्रस्त हुए क्योंकि भगवान, यदुवंश और अपने प्रियजनों के विनाश की बातें अत्यंत वेदनादायक थीं। परंतु अपने गहरे आत्मज्ञान के कारण उन्होंने इस शोक को शांत किया। उन्हें ज्ञात था कि यह सब भगवान की योजना के अंतर्गत था और आत्मा न तो जन्म लेती है, न मरती है।
जब उद्धव विदा लेने लगे, तो विदुर ने उन्हें अत्यंत सम्मान और श्रद्धा से “भगवान के भक्तों में प्रमुख” कहकर संबोधित किया। यद्यपि विदुर आयु में बड़े थे, फिर भी उन्होंने उद्धव को गुरु की भाँति माना, क्योंकि उद्धव ने स्वयं भगवान से प्रत्यक्ष आत्मज्ञान प्राप्त किया था। यही भक्तों के परस्पर व्यवहार की वास्तविक विनम्रता है — जहाँ योग्यता उम्र या पद से नहीं, भक्ति की गहराई से मापी जाती है।
विदुर ने उद्धव से अनुरोध किया कि वे उस दिव्य ज्ञान का वर्णन करें जो स्वयं भगवान ने उन्हें दिया था, ताकि वह मानव समाज के कल्याण के लिए उपयोगी हो। यह ज्ञान सांसारिक तर्क या विद्वता से नहीं, बल्कि गुरु-परम्परा के माध्यम से प्राप्त होता है — भगवान से उद्धव, उद्धव से विदुर, और फिर आगे मानव समाज तक। यही परम्परा बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा पुनः स्थापित की गई।
इस प्रकार, यह अध्याय यह सिखाता है कि भगवान का वियोग भी भक्ति का गूढ़ स्वरूप है, और सच्ची सेवा केवल भगवान की इच्छा के पालन में निहित है। दिव्य ज्ञान का प्रसार उन्हीं के द्वारा संभव है जो स्वयं भगवान के विज्ञान — कृष्ण-तत्त्व — को हृदय से जानते और जीते हैं।
यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण के पृथ्वी से अंतर्धान के पश्चात उद्धव, विदुर और मैत्रेय के माध्यम से दिव्य ज्ञान के प्रसारण की परंपरा को प्रकट करता है। जब विदुर ने उद्धव से आत्मज्ञान की शिक्षा माँगी, तो उद्धव ने उन्हें मैत्रेय मुनि के पास जाने की सलाह दी, क्योंकि भगवान ने स्वयं उन्हें प्रत्यक्ष रूप से उपदेश दिए थे। उद्धव की यह विनम्रता गुरु-शिष्य परंपरा की वास्तविक मर्यादा का आदर्श है — जहाँ ज्ञान की गहराई के बावजूद, व्यक्ति वयोवृद्ध या अधिक योग्य व्यक्तित्व की उपस्थिति में स्वयं को आगे नहीं रखता। सच्चा गुरु वह नहीं जो प्रसिद्धि या लाभ चाहता हो, बल्कि वह जो केवल भगवान की सेवा के लिए शिक्षण करता है।
इसके बाद जब उद्धव और विदुर ने भगवान के नाम, यश और लीलाओं की चर्चा की, तो वे भावविह्वल हो गए। भगवान का नाम और रूप उनके भक्तों के लिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव है — जहाँ वे “विश्वमूर्ति” के रूप में हर वस्तु में भगवान की उपस्थिति देख सकते हैं। यही भक्ति का चरम है — जब भगवान की अनुपस्थिति में भी भक्त उनके दर्शन का अनुभव करता है।
राजा परीक्षित ने जब पूछा कि यदुवंश के विनाश के बाद केवल उद्धव ही क्यों बचे, तो शुकदेव गोस्वामी ने बताया कि सभी यदुवंशी भगवान के पार्षद थे और उन्हें अपने-अपने दिव्य धामों में भेज दिया गया। उद्धव को पृथ्वी पर इसलिए रखा गया ताकि वे भगवान के दिए हुए “ज्ञानं मदाश्रयम्” — अर्थात् भगवद्-तत्त्व का प्रत्यक्ष ज्ञान — संसार में प्रसारित कर सकें।
भगवान का “देहत्याग” वास्तव में किसी सामान्य शरीर का त्याग नहीं था, क्योंकि उनका शरीर सच्चिदानंद स्वरूप है — शाश्वत, ज्ञानमय और आनंदमय। उन्होंने केवल अपना विराट रूप, जो भौतिक दर्शकों के लिए था, वापस ले लिया। वे न तो मरते हैं, न बदलते हैं; केवल अभक्तों की दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। भक्त सदैव भगवान के रूप, नाम और विग्रह में उसी शाश्वत उपस्थिति को अनुभव करता है।
अंततः भगवान ने स्वयं निर्णय किया कि अब वे संसार से ओझल होंगे, परंतु अपना ज्ञान उद्धव को सौंपकर ही। उद्धव जैसे भक्त ही “मदाश्रयम् ज्ञानम्” — अर्थात् भगवान पर आश्रित ज्ञान — को धारण और वितरित कर सकते हैं। इसलिए उन्हें बदरिकाश्रम भेजा गया, जहाँ नर-नारायण ऋषियों की उपस्थिति में वे भक्ति और ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाएँ। यह दिखाता है कि भगवान कभी अपने भक्तों को अंधकार में नहीं छोड़ते — वे अपनी दिव्य शिक्षा सदैव भक्त-परंपरा के माध्यम से जीवित रखते हैं।
यह प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव को प्रदान की गई सर्वोच्च मान्यता और उस दिव्य ज्ञान के प्रवाह का सार है, जो गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से संसार में फैलता है। भगवान कहते हैं कि उद्धव उनके समान हैं, क्योंकि वे भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों से पूर्णतः अप्रभावित हैं। ऐसा भक्त जो निरंतर भगवान की सेवा में रहता है, भले ही संसार में हो, फिर भी मुक्त रहता है — वही जीवनमुक्त कहलाता है। उद्धव इसी शुद्धसत्त्व की अवस्था में थे, इसलिए उन्हें भगवान ने पृथ्वी पर रहकर “भगवद्-तत्त्व” का प्रसार करने का आदेश दिया।
भगवान श्रीकृष्ण तीनों लोकों के गुरु और समस्त वैदिक ज्ञान के स्रोत हैं। वे स्वयं अर्जुन को भगवद्गीता में जो ज्ञान देते हैं, उसी ज्ञान को और भी गूढ़ रूप में उद्धव को प्रदान करते हैं, ताकि वह शुद्ध भक्तियोग के रहस्य को समझा और बाँटा जा सके। यह ज्ञान केवल वेदों या तर्क से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा और भक्ति-योग के अनुभव से समझा जा सकता है। उद्धव को यह कार्य सौंपा गया कि वे बदरिकाश्रम जाकर नर-नारायण ऋषियों और महर्षियों को भगवान का संदेश दें — ऐसा संदेश जो वेदों से भी अधिक गूढ़ था, क्योंकि वह भगवान की अंतःप्रेममयी लीला से संबंधित था।
भगवान का पृथ्वी से प्रस्थान या “तिरोभाव” कोई सामान्य देह-त्याग नहीं था। उनका शरीर सच्चिदानंद स्वरूप है — शाश्वत और अपरिवर्तनशील। उन्होंने केवल अपना विराट रूप, जो सांसारिक दर्शकों के लिए था, समेट लिया। वे सदैव अपने शाश्वत धाम गोलोक में स्थित रहते हैं, और साथ ही परमात्मा के रूप में सर्वत्र उपस्थित रहते हैं। यही कारण है कि भगवान का आविर्भाव और तिरोभाव एक साथ होता है — वे कभी प्रकट होते हैं, कभी ओझल, परंतु वास्तव में सदैव विद्यमान रहते हैं।
भगवान की लीलाएँ, उनका आगमन और प्रस्थान, यह सब केवल शुद्ध भक्तों के लिए समझने योग्य हैं। जो लोग ईर्ष्या या अविश्वास से उन्हें मानवीय दृष्टि से देखते हैं, उनके लिए ये विषय केवल भ्रम और मानसिक विक्षोभ बन जाते हैं। भगवान को केवल भक्ति से ही जाना जा सकता है, बुद्धि या शोध से नहीं।
विदुर जब यह सब सुनते हैं, और यह जान पाते हैं कि भगवान ने संसार छोड़ते समय उन्हें स्मरण किया था, तो वे प्रेम से अभिभूत होकर रो पड़ते हैं। यह रोना किसी दुख का नहीं, बल्कि आनंद-विरह का प्रतीक है — वह अवस्था जब भक्त को यह अनुभूति होती है कि भगवान ने उसे अपनी कृपा से याद रखा। यही भक्ति का परिपूर्ण भाव है।
अंततः, विदुर यमुना तट से गंगा तट की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ मैत्रेय ऋषि उनका स्वागत करते हैं। इस प्रकार, भगवान से प्राप्त दिव्य ज्ञान अब उद्धव से विदुर, और विदुर से आगे संसार में प्रवाहित होने वाला था — यह दर्शाता है कि भगवान भले ही अंतर्धान हो जाएँ, पर उनका ज्ञान और उनकी कृपा भक्त-परंपरा के माध्यम से सदा जीवित रहती है।
All glories to Srila Prabhupada 🙏
Hare Krishna 🙏
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