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इस प्रसंग का सार यह है कि शुद्ध भक्ति के प्रभाव से हृदय परिवर्तन संभव है, चाहे वह किसी दैत्यकुल में जन्मा जीव ही क्यों न हो।
प्रह्लाद महाराज, जो स्वयं नारद मुनि के कृपापात्र शिष्य थे, जब अपने सहपाठी दैत्यपुत्रों को भगवान की भक्ति का उपदेश देते हैं, तो उनका हृदय मोह से मुक्त होकर कृष्णभावनामृत में स्थिर हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि शुद्ध भक्त के वचन केवल बुद्धि को नहीं, हृदय को भी छूते हैं — क्योंकि वे आत्मसाक्षात्कार से उत्पन्न होते हैं, न कि तर्क या नीति से।

जब षंड और अमर्क ने यह देखा कि उनके विद्यार्थी अब राजनीति, अर्थशास्त्र और इंद्रियतृप्ति की शिक्षा में रुचि नहीं रखते, तो वे भयभीत होकर हिरण्यकशिपु के पास गए। यह दिखाता है कि भक्ति अंधकारमय भौतिक ज्ञान का अंत करती है।
हिरण्यकशिपु, जो अहंकार और ईर्ष्या से भरा था, जब इस स्थिति को समझ नहीं सका, तो अपने ही पवित्र पुत्र के प्रति क्रोध से जल उठा। परंतु उसके अपमान और हिंसा के परिणामस्वरूप उसका संचित तपोबल नष्ट हो गया — क्योंकि जो किसी महान भक्त का अपमान करता है, वह अपने सभी पुण्यों, आयु, ऐश्वर्य और यश से वंचित हो जाता है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, “दुर्विनीत” शब्द का गूढ़ अर्थ यह है कि प्रह्लाद महाराज विशेष रूप से इस दुःखमय संसार में जीवों को भौतिक बंधन से छुड़ाने के लिए आए थे। उनका तथाकथित “अवज्ञाकारी” व्यवहार वास्तव में भगवान की इच्छा का पालन था — असुरों के आदेशों को ठुकराकर उन्होंने केवल भगवान की आज्ञा को स्वीकार किया।
अंततः, वे “मंदात्मा” जीवों के भी शुभचिंतक बने — वे जो अज्ञान में धीमे और माया से मोहित हैं, उनके उद्धार के लिए ही प्रकट हुए।

इस प्रकार, यह पूरा प्रसंग यह सिखाता है कि —
भक्ति का प्रभाव अजेय है।
यह न जन्म देखती है, न कुल, न परिस्थिति।
जो एक बार शुद्ध भक्त के संग में आता है, वह भीतरी रूप से बदल जाता है और उसी मार्ग पर अग्रसर होता है जो भगवान के धाम की ओर ले जाता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि भक्ति का बल ही सर्वश्रेष्ठ और अविनाशी बल है। हिरण्यकशिपु का अहंकार और क्रोध उसके असुरभाव का परिणाम था—वह सोचता था कि समस्त शक्ति उसी की है। लेकिन प्रह्लाद महाराज ने सच्चाई प्रकट की कि सभी शक्तियों का स्रोत केवल भगवान हैं, चाहे वह ब्रह्मा हों, इन्द्र हों, या कोई साधारण जीव। जब तक जीव यह नहीं समझता कि वह भगवान की कृपा पर निर्भर है, तब तक वह मूढ़ कहलाता है।

प्रह्लाद महाराज निडर थे क्योंकि वे भगवान के शरणागत थे। एक भक्त किसी भौतिक शक्ति या भय से नहीं डरता; उसका एकमात्र भरोसा भगवान पर होता है। यही निडरता हिरण्यकशिपु को विचलित कर रही थी।

प्रह्लाद महाराज ने अपने पिता को उपदेश दिया कि असली शत्रु बाहरी नहीं, बल्कि अंदर का अनियंत्रित मन है। जब मन नियंत्रित होता है और समभाव विकसित होता है—जहाँ शत्रु-मित्र का भेद मिट जाता है—तब मनुष्य वास्तव में भगवान की भक्ति कर सकता है। जिसने अपने अंदर के छः शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—पर विजय पा ली, उसके लिए संसार में कोई शत्रु नहीं बचता।

अंततः यह कथा यह सिखाती है कि भक्ति व्यक्ति को भय, क्रोध और अज्ञान से मुक्त कर देती है, जबकि अभिमान और ईर्ष्या व्यक्ति को पतन की ओर ले जाते हैं। सच्चा वीर वही है जो अपने मन और इंद्रियों को जीत लेता है और भगवान की शरण में स्थिर रहता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि असुरभाव और अहंकार मनुष्य को सत्य से अंधा बना देते हैं, जबकि भक्ति दृष्टि प्रदान करती है जिससे भगवान को सर्वत्र देखा जा सकता है।

प्रह्लाद महाराज का ज्ञान और निडरता हिरण्यकशिपु को असह्य लग रही थी, क्योंकि उसका मन भौतिक अहंकार, शक्ति और इंद्रिय-सुख में डूबा था। वह यह स्वीकार नहीं कर सका कि उसका छोटा पुत्र, जो उसके अधीन होना चाहिए था, वास्तव में उससे कहीं अधिक बुद्धिमान और स्थिर था। हिरण्यकशिपु के लिए ईश्वर केवल एक कल्पना थे—क्योंकि राक्षसी प्रवृत्ति ईश्वर को देखने की योग्यता खो देती है।

प्रह्लाद महाराज ने यह सत्य बताया कि भगवान सर्वत्र हैं, स्तंभ में भी। भक्त के लिए भगवान का अस्तित्व कोई तर्क नहीं—वह प्रत्यक्ष अनुभूति है। हिरण्यकशिपु के व्यंग्य और अहंकार ने अनजाने में भगवान के प्रकट होने का मार्ग बना दिया। उसका “यह स्तंभ में क्यों नहीं है?” कहना ही नृसिंहदेव के प्रकट होने का निमंत्रण बन गया।

जब राक्षसों का अहंकार चरम पर पहुँचता है, तब भगवान स्वयं प्रकट होकर भक्त की रक्षा करते हैं और अधर्म का विनाश करते हैं। यही दिव्य न्याय है — भक्त की विनम्रता भगवान को आकर्षित करती है, और असुर का अभिमान उसके विनाश का कारण बनता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि जब भक्त की भक्ति और सत्य अडिग होती है, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।

हिरण्यकशिपु के अहंकार ने यह सोच लिया था कि वह ब्रह्मा के वरदान से अजेय है, और वह अपने ही पुत्र की निडरता को चुनौती समझ रहा था। जब उसने उस स्तंभ पर प्रहार किया, तो भगवान ने नृसिंह रूप में प्रकट होकर यह सिद्ध कर दिया कि वे वास्तव में सर्वत्र विद्यमान हैं — यहाँ तक कि जड़ पदार्थ में भी। यह गर्जना केवल ध्वनि नहीं थी, बल्कि दिव्यता की उद्घोषणा थी — वह चेतावनी थी कि अधर्म का अंत निश्चित है।

नृसिंहदेव का स्वरूप “न मनुष्य, न पशु” था, जिससे ब्रह्मा के वरदान का उल्लंघन न हो और साथ ही भगवान की अकल्पनीय शक्ति (acintya-śakti) प्रकट हो। यह रूप अत्यंत भयानक था — अग्नि-सी आँखें, पर्वत-समान मुख, और असीम तेज। उस दृश्य ने यह स्पष्ट कर दिया कि परमेश्वर की शक्ति किसी भी तर्क, नियम, या वरदान से सीमित नहीं हो सकती।

हिरण्यकशिपु ने गर्वपूर्वक भगवान पर आक्रमण किया, जैसे हाथी शेर पर टूट पड़ता है, परंतु यह उसका अंत सिद्ध हुआ। शेर के समक्ष हाथी की पराजय निश्चित होती है; उसी प्रकार, अहंकार का सामना जब भक्ति से होता है, तो विनम्रता और सत्य की विजय होती है।

इस प्रकार, नृसिंहदेव का प्रकट होना यह दिव्य घोषणा है कि —
“भक्त की रक्षा के लिए, धर्म की स्थापना के लिए, और अहंकार के विनाश के लिए, भगवान किसी भी रूप में, किसी भी समय प्रकट हो सकते हैं।”

इस प्रसंग का सार यह है कि जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तब भगवान अपने तेज और शुद्ध सत्त्व के बल से उसे विनष्ट कर देते हैं।

हिरण्यकशिपु, जो अहंकार और तमोगुण का प्रतीक था, भगवान के दिव्य तेज के सामने उसी तरह विलीन हो गया जैसे कीड़ा अग्नि में गिरकर नष्ट हो जाता है। भगवान की उपस्थिति शुद्ध सत्त्व का प्रकाश है — जहाँ वे प्रकट होते हैं, वहाँ अंधकार, अज्ञान और असुरता का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जैसे सूर्य के उदय से रात्रि का अंधकार मिट जाता है, वैसे ही भगवान की उपस्थिति से रजोगुण और तमोगुण का प्रभाव मिट जाता है।

नृसिंहदेव ने हिरण्यकशिपु को उसी तरह पकड़ लिया जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ते हैं — यह दर्शाता है कि भगवान की पकड़ से कोई नहीं बच सकता। परंतु भगवान लीला के आनंद के लिए उसे कुछ क्षणों के लिए मुक्त करते हैं, जैसे प्रकृति कभी-कभी पापी को अस्थायी सुख देती है, ताकि उसके अहंकार का पूर्ण पतन बाद में हो। हिरण्यकशिपु ने यह समझ लिया कि भगवान उससे डर गए हैं, पर वास्तव में यह भगवान की खेल भावना थी।

अंततः भगवान ने हँसते हुए, असीम बल से उसे फिर से पकड़ लिया — यह हँसी ब्रह्मांड के लिए दैवी उद्घोष थी कि अहंकार का अंत निश्चित है और सत्य की विजय अपरिहार्य। नृसिंहदेव का तेज केवल राक्षस का विनाश नहीं करता, बल्कि संसार के अंधकारमय हृदयों को भी प्रकाश देता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि अधर्म चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, जब भगवान का समय आता है, तो वह एक क्षण में नष्ट हो जाता है।

हिरण्यकशिपु, जिसने स्वयं को अजेय समझा था, भगवान नृसिंहदेव के स्पर्श मात्र से उसी प्रकार नष्ट हो गया जैसे चूहा साँप के मुँह में या विषधर गरुड़ के पंजों में। भगवान ने उसके सभी वरदानों को यथावत रखते हुए, एक ही लीला से सबका रहस्य तोड़ दिया—वह न दिन था, न रात; न आकाश, न भूमि; न शस्त्र, न जीव; और न ही कोई मनुष्य या पशु। यह दर्शाता है कि भगवान की बुद्धि और शक्ति किसी भी सांसारिक नियम या तर्क से परे है।

भगवान ने उसे अपनी गोद में रखकर अपने नाखूनों से विदीर्ण किया—यह दृश्य केवल विनाश का नहीं, बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का था। जब भगवान प्रकट होते हैं, तो उनका तेज तमोगुण को भस्म कर देता है; उनका रूप और गर्जना सम्पूर्ण ब्रह्मांड को हिला देती है। उनके तेज के सामने सूर्य, अग्नि और तारों की प्रभा भी फीकी पड़ जाती है।

हिरण्यकशिपु का वध यह सिद्ध करता है कि भक्ति और धर्म की विजय किसी वरदान, सामर्थ्य या विज्ञान की सीमा में नहीं बाँधी जा सकती। भगवान सर्वशक्तिमान हैं, और जब अधर्म अपनी सीमा लाँघ जाता है, तब वे स्वयं प्रकट होकर उसे नष्ट कर देते हैं। यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि अनंत काल तक के लिए यह घोषणा है कि —
“जहाँ भगवान का भक्त है, वहाँ स्वयं भगवान की विजय है; और जहाँ अहंकार है, वहाँ विनाश अवश्यंभावी है।”

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान के कार्य और उनकी कृपा असीम और अकल्पनीय हैं, जिन्हें केवल श्रद्धा से ही समझा जा सकता है, तर्क से नहीं।

जब नृसिंहदेव ने हिरण्यकशिपु का वध कर दिया, तो उन्होंने उसी के सिंहासन पर विराजमान होकर यह सिद्ध किया कि भगवान सर्वश्रेष्ठ स्वामी हैं और सच्चे अर्थ में वही अधिकारपूर्वक किसी भी स्थान पर विराजमान हो सकते हैं — चाहे वह राक्षस का ही क्यों न हो। यह दृश्य केवल विजय का नहीं था, बल्कि दिव्य करुणा का भी प्रतीक था, क्योंकि भगवान उस पर भी कृपा करते हैं जो कभी उनका शत्रु रहा हो। हिरण्यकशिपु वैकुंठ के द्वारपाल जय थे, और भगवान ने उसके प्रति अपने अनन्त स्नेह को प्रकट किया।

देवताओं, ऋषियों, गंधर्वों और समस्त लोकों के वासियों ने जब भगवान का तेज देखा, तो वे विस्मित और आनंदित हो उठे। यह उस दिव्य सत्य का अनुभव था कि जब भगवान प्रकट होते हैं, तो सम्पूर्ण सृष्टि का संतुलन पुनः स्थापित हो जाता है।

ब्रह्मा की प्रार्थना इस तथ्य को उजागर करती है कि भगवान के कर्म भौतिक गुणों से रहित हैं — वे सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, फिर भी वे स्वयं निष्प्रभावित रहते हैं। यह लीला दिखाती है कि भगवान न केवल अधर्म का नाश करते हैं, बल्कि अपने भक्तों को और उनके शत्रुओं को भी आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रदान करते हैं।

इस प्रकार, नृसिंहदेव का सिंहासन पर बैठना केवल एक प्रतीकात्मक क्षण नहीं, बल्कि एक दिव्य घोषणा है कि —
“भगवान सर्वश्रेष्ठ स्वामी हैं; उनके बिना कोई सामर्थ्य, कोई राज्य, कोई सत्ता स्थायी नहीं है।”

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान का क्रोध भी उनके भक्तों के प्रति करुणा का ही एक रूप है। नृसिंहदेव भले ही भयानक रूप में प्रकट हुए हों, लेकिन उनके हृदय में केवल अपने भक्त की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना की भावना थी।

भगवान शिव ने इस दिव्य रहस्य को पहचानते हुए निवेदन किया कि प्रभु अब अपने शुद्ध भक्त प्रह्लाद महाराज को शांति और संरक्षण प्रदान करें। शिव जानते थे कि भगवान का यह रूप भी लीला है — सृष्टि, पालन और संहार के तीनों कार्य उसी परम पुरुष की विभिन्न शक्तियों द्वारा संपन्न होते हैं, और “रुद्र” के रूप में वे स्वयं अपने क्रोध की भूमिका निभाते हैं।

जब हिरण्यकशिपु का अंत हुआ, तो देवताओं, ऋषियों, पितरों, सिद्धों और समस्त लोकों के निवासियों ने राहत और आनंद का अनुभव किया। जो यज्ञ, तपस्या, श्रद्धा और धर्मकर्म उस असुर के अत्याचार से बाधित हो गए थे, वे अब पुनः जीवित हो उठे। देवताओं ने अनुभव किया कि उनके हृदयों का अंधकार मिट गया, और वे फिर से भगवान का ध्यान करने में सक्षम हो गए।

यह लीला यह सिखाती है कि जब भी आसुरी प्रवृत्तियाँ धर्म, तपस्या और भक्ति को दबा देती हैं, तब भगवान स्वयं प्रकट होकर उन पवित्र सिद्धांतों की पुनर्स्थापना करते हैं। उनका प्रकट होना केवल दुष्टों के संहार के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि में संतुलन और भक्ति के प्रकाश के पुनः प्रसार के लिए होता है।

इस प्रकार, नृसिंहदेव का क्रोध अंततः करुणा में परिवर्तित हुआ — भक्तों को आश्रय मिला, देवताओं को शांति, और समस्त ब्रह्मांड को भगवान की उपस्थिति का आलोक।

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान नृसिंहदेव के प्रकट होने से समस्त ब्रह्मांड में धर्म, शांति और संतुलन पुनर्स्थापित हो गया। हिरण्यकशिपु के आतंक से जिन-जिन लोकों के प्राणी पीड़ित थे—विद्याधर, नाग, मनु, प्रजापति, गंधर्व—सभी ने राहत और कृतज्ञता व्यक्त की।

हिरण्यकशिपु के अत्याचार ने न केवल मनुष्यों और देवताओं को, बल्कि सभी लोकों के निवासियों को धर्म, तपस्या और स्वतंत्रता से वंचित कर दिया था। वह अपनी शक्ति, संपत्ति और इंद्रिय-सुख के अभिमान में सबको अपने अधीन कर चुका था। जब भगवान ने उसका अंत किया, तो यह केवल एक राक्षस का वध नहीं था, बल्कि असुरता के शासन का अंत और दिव्य व्यवस्था की पुनः स्थापना थी।

मनुओं और प्रजापतियों की प्रार्थनाएँ दर्शाती हैं कि राक्षसी सत्ता के कारण वर्णाश्रम-धर्म, सृष्टि का संतुलन और संतानोत्पत्ति जैसे दिव्य कार्य बाधित हो गए थे। नृसिंहदेव के हस्तक्षेप से यह सब पुनः आरंभ हो सका। यह दिखाता है कि जब समाज ईश्वर-विहीन मार्ग पर चलता है, तब धर्म और सभ्यता दोनों नष्ट होते हैं; लेकिन जब भगवान का स्मरण और भक्ति लौटती है, तब सब कुछ पुनः पवित्र और सुव्यवस्थित हो जाता है।

इस प्रकार, हिरण्यकशिपु की मृत्यु केवल दैत्य का अंत नहीं, बल्कि यह दिव्य उद्घोष थी कि भगवान ही सृष्टि के वास्तविक शासक हैं, और जो उनके आदेश के अनुसार चलता है वही सदा विजयी और कल्याणकारी होता है।

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान नृसिंहदेव के प्रकट होने से समस्त ब्रह्मांड में भय का अंत और भक्ति की पुनर्स्थापना हुई। हिरण्यकशिपु केवल एक असुर नहीं था — वह धर्म, सत्य और ईमानदारी के हृदय में चुभने वाला काँटा था। इसलिए जब उसका अंत हुआ, तो सभी लोकों — चारण, यक्ष, नाग, किन्नर, वैताल, किम्पुरुष — ने राहत की सांस ली और भगवान के चरणों में कृतज्ञतापूर्वक शरण ली।

हर लोक के प्राणियों की प्रार्थनाएँ एक ही सत्य को प्रकट करती हैं: जब आसुरी प्रवृत्ति शासन करती है, तब सभी लोकों में असंतुलन और पीड़ा फैलती है; और जब भगवान प्रकट होते हैं, तब संतुलन, न्याय और भक्ति लौट आती है। हिरण्यकशिपु ने हर वर्ग के प्राणियों को उनके स्वाभाविक कर्तव्यों से विमुख कर दिया था — जो भगवान की सेवा में थे, उन्हें उसने अपने अधीन कर लिया; जो धर्म और स्तुति में लगे थे, उनसे उनका स्थान छीन लिया।

नृसिंहदेव के एक प्रहार से वह सारा बंधन टूट गया। जैसे किसी असाध्य रोग का उपचार हो जाए, वैसे ही भगवान ने ब्रह्मांड के उस दूषित वातावरण को शुद्ध कर दिया। अब प्रत्येक लोकवासी भगवान की चरणशरण में लौट आया, यह जानकर कि उनकी वास्तविक स्वतंत्रता और सम्मान केवल ईश्वर की सेवा में है, किसी राक्षस की सत्ता में नहीं।

यह प्रसंग यह सिखाता है कि जब भक्त अपने कर्तव्यों पर अडिग रहते हैं और ईश्वर की शरण नहीं छोड़ते, तब भगवान स्वयं आकर अधर्म का अंत और धर्म की पुनः प्रतिष्ठा करते हैं — जैसे उन्होंने प्रह्लाद और उनके समान भक्तों के लिए किया।

इस प्रसंग का सार यह है कि भगवान की लीला में कोई भी घटना संयोग नहीं होती — सब कुछ उनके दिव्य नियोजन का भाग होता है।

हिरण्यकशिपु का राक्षस रूप, भगवान से शत्रुता, और अंततः भगवान नृसिंहदेव के हाथों उसका वध — यह सब वैकुंठ के सेवकों जय और विजय की दिव्य कथा का विस्तार था। जो कभी भगवान के निकटतम पार्षद थे, वे ब्राह्मणों के शाप से अस्थायी रूप से भौतिक जगत में आ गए, ताकि भगवान की अद्भुत शक्ति और प्रेम का नाट्य प्रकट हो सके।

विष्णुदूतों ने समझा कि भगवान का यह क्रोध भी करुणा का ही स्वरूप है — क्योंकि अपने भक्त या अपने सेवक के प्रति भगवान कभी शत्रु नहीं हो सकते। उनका वध भी मोक्ष का माध्यम बन जाता है, और उनका प्रकोप भी कृपा का ही दूसरा रूप होता है।

इस लीला का अर्थ यह है कि भगवान अपने भक्तों को किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ते — चाहे वे स्वर्ग में हों या दैत्य कुल में। अंततः वे उन्हें अपने धाम में लौटा लेते हैं। हिरण्यकशिपु का वध वास्तव में उसकी आत्मा का उद्धार और भगवान के अनंत प्रेम की पुनर्प्राप्ति थी।

All glories to Srila Prabhupada 🙏 
Hare Krishna 🙏 

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