Updesamrit 1
इस पूरे उपदेश का सार यह है कि ―
जिसने वाणी, मन, क्रोध, जीभ, पेट और जननांगों की इच्छाओं को संयमित कर लिया है, वही वास्तव में स्वामी या गोस्वामी कहलाने योग्य है।
ऐसा व्यक्ति ही दूसरों का आध्यात्मिक गुरु बन सकता है, क्योंकि उसने पहले स्वयं पर विजय प्राप्त की है।
वास्तविक प्रायश्चित्त बाहरी दंड या कर्मकाण्ड नहीं है; वह है कृष्ण-चेतना का जागरण, जिससे व्यक्ति भीतर से शुद्ध होता है। इस शुद्धता की प्रक्रिया में वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, मन-संयम, सत्य, दान, स्वच्छता और योगाभ्यास द्वारा धीरे-धीरे अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेता है।
वाणी का संयम तब होता है जब व्यक्ति केवल कृष्ण-कथा बोले और व्यर्थ चर्चा से बचे।
मन का संयम तब संभव है जब मन सदैव कृष्ण-पादारविन्द में लगा रहे।
क्रोध का संयम तब है जब वह केवल भगवान या उनके भक्त की निन्दा देखकर ही प्रकट हो, अन्यथा नहीं।
जीभ का संयम केवल प्रसाद-सेवन द्वारा संभव है, और
जनन-इन्द्रिय का संयम तभी जब उसका उपयोग केवल कृष्ण-भावनामृत संतानोत्पत्ति के लिए हो।
जो इन छह दुष्ट प्रवृत्तियों पर विजय पा लेता है, वही “गोस्वामी”—अर्थात् अपनी इन्द्रियों का स्वामी—कहलाता है।
अन्यथा जो इन्द्रियों का दास है, वह “गो-दास” है, जो संसार-बंधन में ही फँसा रहता है।
अतः वास्तविक योग या धर्म का सार यही है—
अपने भीतर की इन्द्रियों को भगवान की सेवा में लगाना और उन्हें वश में करना; तभी जीवन पवित्र, स्थिर और गुरु-योग्य बनता है।
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