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All glories to Srila Prabhupada 

इस पूरे प्रसंग का सरल सार यही है कि मनुष्य का वास्तविक कल्याण केवल भगवान और उनके शुद्ध भक्तों की संगति से होता है। पूरु वंश की महिमा इसलिए है क्योंकि वहाँ के लोग भगवान के प्रति समर्पित थे, न कि केवल ज्ञान, ब्रह्म या आंशिक परमात्मा में उलझे हुए। विदुर उसी परंपरा के हैं, इसलिए उनके हृदय में स्वाभाविक रूप से भगवान की कथाओं के प्रति गहरी जिज्ञासा और प्रेम है। मैत्रेय मुनि इस बात से प्रसन्न हैं कि ऐसे योग्य श्रोता के सामने वे श्रीमद्भागवत का उपदेश दे रहे हैं, क्योंकि भागवत केवल कथा नहीं बल्कि संसार में दुखी जीवों के लिए करुणा से दिया गया समाधान है। जीव थोड़े से सुख के लिए बड़े-बड़े कष्टों में फँस जाता है, शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेता है और बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है। लेकिन जब किसी सौभाग्यशाली व्यक्ति को भागवत ग्रंथ और भागवत भक्त दोनों की संगति मिल जाती है, तब उसका भ्रम टूटने लगता है और वह धीरे-धीरे बंधन से मुक्त हो जाता है। गंगा का उदाहरण यह सिखाता है कि केवल पवित्र स्थान या शुद्ध साधन का स्पर्श ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके बाद जीवन को भी शुद्ध रखना आवश्यक है। यदि मनुष्य बार-बार उसी पुराने पापों में लौट जाता है, तो उसकी शुद्धि हाथी के स्नान जैसी व्यर्थ हो जाती है। इसलिए भागवत का संदेश यही है कि भगवान की कथा सुनकर जीवन की दिशा बदली जाए, तभी वास्तविक मुक्ति और शांति प्राप्त होती है।

इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि भगवान की महिमा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि प्रेम से प्रकट होती है। जब हृदय में सच्चा स्नेह होता है, तब साधारण शब्द भी दिव्य बन जाते हैं और भगवान उन्हें स्वीकार करते हैं। चारों कुमार जैसे महान संत जन्म से ही पूर्ण ज्ञानी थे, फिर भी उन्होंने विनम्रता से भगवान संकर्षण से श्रीमद्-भागवत सुना, क्योंकि भक्ति का मार्ग यही है कि पहले सुना जाए, फिर वही शुद्ध रूप में आगे बताया जाए। ज्ञान की वास्तविक परंपरा अनुमान या कल्पना से नहीं, बल्कि सुनने और सुनाए जाने से चलती है।
श्रीमद्-भागवत किसी एक व्यक्ति की रचना नहीं है, बल्कि अनादि काल से शिष्य-परंपरा में प्रवाहित दिव्य ज्ञान है। पराशर मुनि जैसे महान ऋषि को यह अधिकार उनके क्षमा, संयम और ब्राह्मण स्वभाव के कारण मिला। उन्होंने प्रतिशोध की शक्ति होते हुए भी करुणा को चुना, और यही गुण उन्हें भागवत जैसे सर्वोच्च ग्रंथ का वक्ता बनाता है। यही संदेश मैत्रेय मुनि विदुर को देना चाहते हैं, क्योंकि विदुर भी विनम्र, निष्ठावान और सुनने के योग्य हैं।
अंत में यह भी स्पष्ट होता है कि भगवान संसार के विनाश और सृजन से परे हैं। जब समस्त लोक जल में डूबे होते हैं, तब भी भगवान अपनी आंतरिक शक्ति में स्थित रहते हैं, पूर्ण आनंद में, बाहरी ऊर्जा से अप्रभावित। इससे यह समझ आता है कि भगवान कभी भी माया के अधीन नहीं होते, और जीव का कल्याण तभी संभव है जब वह ऐसी दिव्य कथाओं को सही स्रोत से सुनकर अपने जीवन को शुद्ध दिशा दे।

इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि प्रलय के समय कुछ भी पूरी तरह नष्ट नहीं होता, बल्कि सब कुछ भगवान की व्यवस्था में सुप्त अवस्था में चला जाता है। जैसे लकड़ी में आग छिपी रहती है और सही समय आने पर प्रकट हो जाती है, वैसे ही सृष्टि के बीज जल में और भगवान की शक्ति में छिपे रहते हैं। जब तीनों लोक जल में डूब जाते हैं, तब जीवों के स्थूल शरीर समाप्त हो जाते हैं, लेकिन उनके सूक्ष्म शरीर और कर्मों की प्रवृत्तियाँ बनी रहती हैं। यह सब काल-शक्ति के कारण होता है, जिसे विष्णु पुराण में अविद्या से जोड़ा गया है।
भगवान स्वयं इन बंधनों में नहीं पड़ते। वे अपनी आंतरिक शक्ति में स्थित रहते हैं और बाहरी रूप से जल में शयन करते हुए प्रतीत होते हैं। जीव, जो कर्मफल की इच्छा से प्रेरित होते हैं, उसी काल-शक्ति के प्रभाव में फिर से सृष्टि की ओर आकर्षित होते हैं। थोड़े से लाभ के लिए बड़े-बड़े कर्म करना और उन्हें ही जीवन की सफलता मान लेना यही जीव का भ्रम है, जिसे भगवद्गीता में मूढ़ता कहा गया है।
फिर भगवान की इच्छा से सृष्टि का सूक्ष्म बीज जागृत होता है। भगवान के नाभि से कमल प्रकट होता है, जो उनके विराट रूप का संकेत है। उसी कमल से पहला जीव उत्पन्न होता है, जिसे हम ब्रह्मा कहते हैं। वह किसी भौतिक पिता से जन्मा नहीं होता, इसलिए उसे स्वयंभू कहा जाता है। यह सब गर्भोदकशायी विष्णु की लीला के अंतर्गत होता है, जहाँ भगवान प्रत्येक ब्रह्मांड में प्रवेश करके सृष्टि को पुनः प्रकट करते हैं। प्रलय में यह सब फिर नारायण में लीन हो जाता है और अगली सृष्टि में वही क्रम दोबारा आरंभ होता है।
इससे यह समझ में आता है कि सृष्टि, प्रलय, जन्म और विनाश सब भगवान की लीला हैं। जीव इन परिवर्तनों में फँसता है, लेकिन भगवान सदा इन सबसे परे, पूर्ण और स्वतंत्र रहते हैं। यही ज्ञान जीव को अपने वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाने वाला है।

इस पूरे प्रसंग का सरल भाव यह है कि सृष्टि का आरंभ करने वाले ब्रह्मा जी भी प्रारंभ में अपने अस्तित्व, कमल और पूरे ब्रह्मांड को नहीं समझ पाए। वे चारों दिशाओं में देखने लगे, प्रयास करते रहे, सोचते रहे, पर केवल अपने बल पर सत्य को नहीं जान सके। इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल बुद्धि, तर्क या मानसिक प्रयास से परम सत्य को समझना संभव नहीं है।
ब्रह्मा जी का यह प्रश्न — मैं कौन हूँ, यह कमल कहाँ से आया, इसका मूल क्या है — आज भी मनुष्य के हृदय में उठने वाला वही मूल प्रश्न है। जो व्यक्ति अपने और संसार के कारण को जानना चाहता है, वही वास्तव में बुद्धिमान है। लेकिन जब यह खोज केवल अहंकार या कल्पना पर आधारित होती है, तब वह अधूरी रह जाती है।
ब्रह्मा जी ने कमल के तने में प्रवेश करके मूल तक पहुँचने का प्रयास किया, वे बहुत निकट तक पहुँचे, फिर भी परम स्रोत को नहीं देख सके। इसका संदेश यह है कि व्यक्तिगत प्रयास हमें भगवान के पास तो ले जा सकता है, लेकिन अंतिम सत्य केवल भगवान की कृपा से ही प्रकट होता है। यही कारण है कि स्वयं ब्रह्मा जी भी अंततः समझते हैं कि भगवान को भक्ति से ही जाना जा सकता है, जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है — भक्त्या मामभिजानाति।
अंत में ब्रह्मा जी उस परम समय-तत्व के साक्षात्कार तक पहुँचे, जो भगवान के हाथ में स्थित चक्र के समान है और जो जीव के हृदय में मृत्यु का भय उत्पन्न करता है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि जीव सीमित है, समय के अधीन है, जबकि भगवान समय के भी स्वामी हैं। जब तक जीव यह स्वीकार नहीं करता और भक्ति के मार्ग को नहीं अपनाता, तब तक उसकी खोज अधूरी ही रहती है।

इस प्रसंग का सरल भाव यह है कि जब ब्रह्मा जी ने अपने बल, बुद्धि और खोज से परम सत्य को नहीं पाया, तब उन्होंने उस प्रयास को छोड़ दिया और विनम्रता के साथ मन को परमेश्वर में स्थिर कर दिया। यही वास्तविक समाधान था। अपने उद्देश्यों और इंद्रियों को वश में करके उन्होंने ध्यान में शरण ली, और यही शरणागति भक्ति का आरंभ है। जब मन समस्त सृष्टि के मूल कारण पर टिक जाता है, तब चाहे प्रारंभ में भगवान का स्वरूप स्पष्ट न भी हो, फिर भी वह एक सच्ची आध्यात्मिक साधना बन जाती है।
लंबे समय तक ऐसी साधना करने के बाद, ब्रह्मा जी को वह अनुभूति हुई जो पहले किसी भी मानसिक या बौद्धिक प्रयास से संभव नहीं थी। इसका संदेश यह है कि भगवान को जानना हमारी योग्यता का फल नहीं, बल्कि उनकी कृपा का परिणाम है। यही सत्य भगवद्गीता में बताया गया है कि भगवान को वास्तव में भक्ति से ही जाना जा सकता है। ब्रह्मा जी ने इसी अनुभव के आधार पर आगे चलकर ब्रह्म-संहिता की रचना की, जिसे भगवान चैतन्य ने मान्यता दी।
जब ब्रह्मा जी को भगवान का साक्षात्कार हुआ, तब उन्होंने देखा कि समस्त प्राकृतिक सौंदर्य उनके दिव्य स्वरूप के सामने तुच्छ प्रतीत होता है। पर्वत, आकाश, रत्न, प्रकाश—सब कुछ भगवान की देह-कांति का ही प्रतिबिंब है। प्रकृति सुंदर है, पर उसकी सुंदरता भगवान से आती है। जो व्यक्ति उस मूल सौंदर्य से आकर्षित हो जाता है, उसके लिए संसार की वस्तुएँ अपने आप आकर्षण खो देती हैं।
इससे यह समझ आता है कि भगवान का स्वरूप सीमित नहीं है। वे पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, फिर भी दिव्य अलंकारों से सुसज्जित रहते हैं। यह कोई भौतिक सजावट नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक विविधता का प्राकट्य है। यही दर्शन जीव को यह सिखाता है कि वास्तविक ज्ञान और संतोष तभी आता है जब मनुष्य परम स्रोत में शरण लेता है और उसकी कृपा की प्रतीक्षा करता है।

इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि भगवान अपने शुद्ध भक्तों को वही देते हैं जिसकी उन्हें वास्तव में चाह है—और शुद्ध भक्त कुछ भी अलग नहीं चाहते, केवल भगवान को ही चाहते हैं। जब भगवान अपने चरण कमल उठाकर दर्शन देते हैं, तो वही चरण भक्तिमय सेवा के समस्त फल का मूल बन जाते हैं। वे चरण किसी भौतिक पुरस्कार के नहीं, बल्कि शुद्ध प्रेम और सेवा के प्रत्यक्ष अनुभव के स्रोत हैं। भगवान के नाखूनों से निकलने वाली दिव्य चमक यह दर्शाती है कि उनकी सेवा करने से भक्त का जीवन स्वयं प्रकाशमय हो जाता है।
शुद्ध भक्ति का अर्थ यह नहीं कि भगवान से कुछ माँगा जाए, बल्कि यह है कि बिना किसी स्वार्थ, ज्ञान या कर्म की मिलावट के केवल उनकी सेवा की जाए। यही बात भक्ति-रसामृत-सिंधु में बताई गई है। ऐसी भक्ति का फल भगवान के साथ प्रत्यक्ष संबंध है। इसी कारण ब्रह्मा जी ने अंततः यह समझा कि वही परम पुरुष गोविंद हैं, जिनका उन्होंने अनुभव किया, और इसी अनुभूति को उन्होंने ब्रह्म-संहिता में व्यक्त किया।
भगवान अपने भक्तों की सेवा को स्वीकार करके केवल अपनी मधुर मुस्कान से ही उन्हें तृप्त कर देते हैं। भक्त उस मुस्कान से संतुष्ट हो जाते हैं और भगवान भक्तों की प्रसन्नता देखकर और अधिक प्रसन्न होते हैं। इस तरह भगवान और भक्त के बीच प्रेम और कृतज्ञता का मधुर आदान-प्रदान चलता रहता है। भक्त मुक्ति तक को ठुकरा देते हैं, क्योंकि उनके लिए भगवान की सेवा ही सबसे बड़ा वरदान है।
भगवान का सौंदर्य, उनके वस्त्र, आभूषण और स्वरूप यह सिखाते हैं कि संसार की सारी सुंदरता उन्हीं से आती है। वे स्वयं ही अपने अस्तित्व का कारण हैं, किसी और पर आश्रित नहीं। जैसे एक विशाल पर्वत सबका आधार होता है, वैसे ही भगवान समस्त चल-अचल प्राणियों का आधार हैं। प्रलय में सब कुछ डूब सकता है, पर भगवान सदा वही रहते हैं। यह दर्शन भक्त के हृदय में यही दृढ़ करता है कि वास्तविक आश्रय केवल भगवान हैं, और उनकी शुद्ध भक्ति ही जीवन की पूर्णता है।

इस वर्णन का सरल भाव यह है कि जब ब्रह्मा जी ने भगवान को उनके विराट, पर्वत समान स्वरूप में देखा, तब उनके हृदय में कोई संदेह शेष नहीं रहा कि यही हरि हैं, यही परमेश्वर हैं। उन्होंने अनुभव किया कि भगवान की सुंदरता केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि स्वयं वैदिक ज्ञान उनकी महिमा का गान कर रहा है। उनकी माला, उनका तेज, और उनका सुदर्शन चक्र यह स्पष्ट कर रहे थे कि भगवान सर्वथा सुरक्षित, पूर्ण और अप्राप्य हैं—सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, वायु जैसी महान शक्तियाँ भी उन्हें स्पर्श नहीं कर सकतीं।
भगवान को देखने के बाद ब्रह्मा जी की दृष्टि सृष्टि की ओर गई। उन्हें कमल, जल, आकाश, वायु और सृष्टि के सभी आधार स्पष्ट दिखाई देने लगे। इसका अर्थ यह है कि जब परम कारण प्रकट होता है, तब ही कार्य का रहस्य भी समझ में आता है। भगवान को जाने बिना सृष्टि को समझना संभव नहीं है।
इसके बाद ब्रह्मा जी में रजोगुण सक्रिय हुआ और सृजन की प्रेरणा जागृत हुई। लेकिन यह प्रेरणा उनकी अपनी नहीं थी; यह भगवान की इच्छा और निर्देश से उत्पन्न हुई थी। इससे यह शिक्षा मिलती है कि चाहे कोई व्यक्ति भौतिक कार्य में लगा हो या आध्यात्मिक मार्ग पर, वास्तविक शक्ति और सफलता तभी मिलती है जब वह परम सत्ता की शरण लेता है। अपने बल से कुछ भी संभव नहीं है। सृजन, संचालन या कोई भी प्रयास तभी फल देता है जब वह भगवान पर आश्रित हो। यही इस पूरे प्रसंग का गूढ़ और सरल संदेश है।

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