Skand 3 adhyay 9
All glories to Srila Prabhupada
इस पूरे वर्णन का सरल सार यह है कि भगवान को जानना न तो केवल बुद्धि से संभव है, न तपस्या के घमंड से, न ही विज्ञान या दर्शन के तर्कों से। भगवान स्वयं परम सत्य हैं, समस्त सृष्टि के मूल कारण हैं, और फिर भी भौतिक प्रकृति से सर्वथा अछूते रहते हैं। जीवों का दुर्भाग्य यही है कि वे माया के आकर्षण में फँसकर मूल कारण को भूल जाते हैं और अस्थायी, भौतिक वस्तुओं को ही सर्वोच्च मान लेते हैं। ब्रह्मा जी ने स्वयं अनुभव किया कि जब तक भगवान की अकारण कृपा नहीं मिलती, तब तक उनका वास्तविक स्वरूप समझ में नहीं आता। तपस्या का भी वास्तविक फल तभी मिलता है जब वह भगवान की भक्ति तक ले जाए। भगवान की सुंदरता, ऐश्वर्य और आनंद इतने पूर्ण हैं कि जो एक बार उसे सही रूप में देख लेता है, वह फिर संसार के कूड़े-कचरे जैसे सुखों में आकर्षित नहीं होता। जैसे कौवे गंदगी में सुख ढूँढते हैं और हंस निर्मल सरोवर में, वैसे ही भौतिक आसक्ति वाले लोग संसार में रमे रहते हैं और भक्त भगवान के चरणों में। भगवान के साकार दिव्य रूप सभी के कल्याण के लिए हैं और वही भक्ति का आश्रय हैं; निराकार ब्रह्म उनका ही आंशिक प्रकाश है। भगवान को वास्तव में वही जान सकता है जो प्रेमपूर्वक उनकी भक्ति करता है या ऐसे भक्तों की संगति में रहता है जिनके हृदय में भगवान सदा निवास करते हैं। यही शुद्ध भक्ति का रहस्य है—जहाँ भगवान भक्त को नहीं छोड़ते और भक्त भगवान के सिवा कुछ नहीं
इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि संसार का मनुष्य भय और चिंता में इसलिए जीता है क्योंकि वह सब कुछ “मेरा” मानकर पकड़ना चाहता है—धन, शरीर, परिवार, प्रतिष्ठा। जब तक यह भावना रहती है, तब तक मन कभी शांत नहीं होता। वास्तव में आत्मा को कोई भौतिक दुख नहीं छूता, लेकिन शरीर को ही अपना स्वरूप मान लेने से जीव माया के प्रभाव में आकर दुखों को अपना समझ बैठता है। जो व्यक्ति भगवान के चरणों की शरण नहीं लेता, वह चाहे कितना ही बुद्धिमान, वैज्ञानिक, नेता या तपस्वी क्यों न हो, भीतर से असुरक्षित और बेचैन ही रहता है।
सच्चा भक्त बाहर से सामान्य जीवन जीता हुआ भी भीतर से मुक्त होता है, क्योंकि वह अपने आप को स्वामी नहीं, सेवक मानता है। वह धन कमाता है, काम करता है, परिवार का पालन करता है, लेकिन सब कुछ भगवान की सेवा समझकर करता है। इसलिए वही धन, जो सामान्य व्यक्ति के लिए विष बन जाता है, भक्त के लिए विषहीन हो जाता है। उसकी चिंता समाप्त हो जाती है, क्योंकि भार उसने भगवान को सौंप दिया होता है।
जो लोग भगवान के नाम, गुण और लीलाओं के श्रवण-कीर्तन से दूर रहते हैं, वे वास्तव में दुर्भाग्यशाली हैं। वे थोड़े समय के इंद्रिय सुख के लिए जीवन भर कठोर परिश्रम करते हैं, दिन में थकते हैं और रात में भी चैन से सो नहीं पाते। उनकी योजनाएँ बार-बार असफल होती हैं, क्योंकि प्रकृति के नियमों से कोई बच नहीं सकता। यहाँ तक कि बड़े-बड़े विचारक और तपस्वी भी, यदि भक्ति से विमुख हैं, तो उसी चक्र में घूमते रहते हैं।
शुद्ध भक्तों का हृदय ऐसे दुखी जीवों को देखकर करुणा से भर जाता है। वे जानते हैं कि बिना भगवान की भक्ति के कोई भी धर्म, दर्शन या सुधार स्थायी सुख नहीं दे सकता। धर्म का वास्तविक अर्थ नैतिकता या नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि भगवान की शरण में जाना है। जो व्यक्ति स्वयं भक्ति में नहीं है और फिर भी दूसरों का मार्गदर्शन करने का दावा करता है, वह अंधे के पीछे अंधे चलने जैसा है।
अंततः संदेश यही है कि सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को भगवान की भक्ति तक ले जाए। जब जीव अपनी स्वतंत्रता का भ्रम छोड़कर भगवान की इच्छा के अनुरूप स्वयं को ढाल लेता है, तभी वह भय, चिंता और दुखों से मुक्त होकर शांति और आनंद को प्राप्त करता है।
इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि भगवान को देखने के लिए आँखों की नहीं, शुद्ध श्रवण और प्रेम की आवश्यकता होती है। जब कोई भक्त सच्चे हृदय से भगवान के नाम, गुण और लीलाओं को सुनता है, तो वही श्रवण उसकी आँख बन जाता है। इस सुनने से हृदय शुद्ध होता है और भगवान स्वयं वहाँ विराजमान हो जाते हैं। भगवान इतने करुणामय हैं कि वे अपने भक्त के प्रेम के अनुसार उसी दिव्य रूप में प्रकट होते हैं, जिस रूप में भक्त उन्हें प्रेमपूर्वक स्मरण और सेवा करना चाहता है। यह इसलिए नहीं कि भगवान भक्त के अधीन हो जाते हैं, बल्कि इसलिए कि प्रेम के सामने वे स्वयं को बाँध लेते हैं।
भक्ति कोई अचानक होने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि विश्वास से शुरू होकर संगति, सेवा और निरंतर श्रवण के द्वारा धीरे-धीरे प्रेम तक पहुँचती है। इसी प्रक्रिया में जीव की उसकी शाश्वत सेवा-भावना जागृत होती है और वह स्वाभाविक रूप से भगवान के किसी विशेष रूप की ओर आकर्षित हो जाता है। यही उसका वास्तविक स्वरूप है। ऐसे शुद्ध भक्त के हृदय में भगवान सदा के लिए निवास करते हैं और उससे कभी विमुख नहीं होते। लेकिन जो लोग केवल दिखावे की पूजा करते हैं, भव्य आयोजन करते हैं और भीतर से भौतिक इच्छाओं में फँसे रहते हैं, उनसे भगवान प्रसन्न नहीं होते, चाहे वे देवता ही क्यों न हों।
भगवान सभी के हृदय में परमात्मा रूप में उपस्थित हैं और सबके शुभचिंतक हैं, लेकिन वे स्वयं को केवल निष्काम, शुद्ध भक्तों के सामने ही प्रकट करते हैं। शुद्ध भक्त कोई भौतिक सुख नहीं चाहता; वह अपनी इच्छा को पूरी तरह भगवान की इच्छा के साथ मिला देता है। इसी कारण भगवान उनसे अत्यंत प्रसन्न होते हैं। जो लोग भक्ति से दूर हैं, वे अपने कर्मों के फल भोगते रहते हैं, पर भगवान अपने भक्तों और उनके प्रचार कार्यों के माध्यम से उन्हें भी कृपा का अवसर देते हैं।
यह भी समझाया गया है कि भले ही कोई व्यक्ति अभी शुद्ध भक्त न हो, फिर भी यदि वह कोई भी पुण्य कर्म भगवान को अर्पित करता है, तो वह व्यर्थ नहीं जाता। ऐसा कार्य धीरे-धीरे भक्ति की ओर ले जाता है। भगवान के लिए किया गया हर छोटा कर्म भी शाश्वत लाभ बन जाता है।
अंत में भाव यह है कि भगवान अपने अवतारों में संसार की गतिविधियों का अनुकरण करते हुए भी उनसे सर्वथा अछूते रहते हैं। उनके नाम, रूप और कर्म स्वयं भगवान के समान ही शक्तिशाली हैं। यहाँ तक कि अनजाने में भी यदि कोई उनके नाम का स्मरण कर ले, तो वह जन्मों-जन्मों के पापों से मुक्त हो सकता है। यही भगवान की असीम करुणा और भक्ति की महिमा है।
इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड किसी स्वतंत्र शक्ति से नहीं, बल्कि एक ही परमेश्वर से उत्पन्न, संचालित और समाप्त होता है। भगवान ही उस ब्रह्मांडीय वृक्ष की मूल जड़ हैं, और ब्रह्मा, शिव तथा विष्णु जैसे रूप उसी एक मूल सत्ता की व्यवस्थात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं। भौतिक प्रकृति स्वयं कुछ नहीं कर सकती; वह केवल भगवान की देखरेख में कार्य करती है। इसलिए चाहे सृष्टि हो, पालन हो या संहार—सबका अंतिम कारण वही एक परम पुरुष हैं।
मनुष्य सामान्यतः यह नहीं समझ पाता कि उसका वास्तविक हित भगवान को जानने और उनकी शरण लेने में है। वह जीवन भर ऐसे कार्यों में लगा रहता है जो बाहर से बहुत महत्वपूर्ण लगते हैं, लेकिन भीतर से व्यर्थ होते हैं। वह बार-बार उसी भौतिक सुख को चबाता रहता है जिसे वह पहले भी भोग चुका है, और फिर भी संतुष्ट नहीं होता। कारण यही है कि वह वृक्ष की शाखाओं में उलझा रहता है और जड़ को भूल जाता है। जब तक जड़—भगवान—की सेवा नहीं होती, तब तक कोई भी प्रयास स्थायी फल नहीं देता।
भगवान स्वयं समय के स्वामी हैं। ब्रह्मा जैसे महान जीव, जिनका जीवनकाल अत्यंत दीर्घ है और जिन्होंने असंख्य वर्षों की तपस्या की है, वे भी अंततः भगवान को ही प्रणाम करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि संसार में कोई भी कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह भगवान से स्वतंत्र नहीं है। सभी को अंततः उसी परम सत्य के सामने विनम्र होना पड़ता है।
भगवान अपनी इच्छा से अनेक रूपों में प्रकट होते हैं—मनुष्य, पशु, देवता या अन्य अवतारों के रूप में—लेकिन वे कभी भी उन रूपों से बंधे नहीं होते। वे भौतिक अशुद्धियों से सदा परे रहते हैं और केवल अपने भक्तों की रक्षा, धर्म की स्थापना और अपनी लीलाओं के आनंद के लिए अवतरित होते हैं। जो उन्हें साधारण प्राणी समझता है, वह वास्तव में उनकी दिव्यता को समझ ही नहीं पाता।
यह भी बताया गया है कि भगवान ऐसी लीलाएँ कर सकते हैं जिन्हें सीमित बुद्धि वाला मनुष्य असंभव मान लेता है। वे प्रलय के जल में शांति से विश्राम कर सकते हैं, नागों की शय्या पर सो सकते हैं और उसी अवस्था में समस्त ब्रह्मांड को अपने भीतर धारण कर सकते हैं। यह सब उनके लिए सहज है, क्योंकि वे समय, स्थान और भौतिक नियमों से बंधे नहीं हैं।
अंततः सार यही है कि भगवान सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सभी कारणों के कारण हैं। जब जीव यह स्वीकार कर लेता है और अपने जीवन को भगवान की शरण और भक्ति में लगाता है, तभी उसका जीवन सार्थक होता है। अन्यथा, वह केवल संघर्ष करता रहता है, पर वास्तविक शांति और लाभ उसे प्राप्त नहीं होता।
इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि ब्रह्मा जी यह स्वीकार कर रहे हैं कि उनका जन्म, उनका कार्य और उनकी शक्ति—सब कुछ भगवान की कृपा से ही है। जब भगवान प्रलय के समय विश्राम में थे, तब समस्त ब्रह्मांड उनकी देह में सुरक्षित था, और उन्हीं की कमल नाभि से ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ। यह दर्शाता है कि सृष्टि का आरंभ किसी यांत्रिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि भगवान की चेतन इच्छा से होता है। भगवान का सोना, जागना, देखना—सब दिव्य है; वह हमारी तरह विवश होकर नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र इच्छा से होता है।
ब्रह्मा जी हमें यह भी सिखाते हैं कि भक्ति और अर्चना कोई कल्पना या माया नहीं है। भगवान स्वयं रूपवान हैं, चेतन हैं और दिव्य हैं, इसलिए उनका उठना, सोना और लीला करना भी वास्तविक और आध्यात्मिक है। जो लोग भगवान को निराकार मानकर अर्चना का उपहास करते हैं, वे वास्तव में भगवान की शक्ति को अपनी सीमित बुद्धि से नापते हैं। ऐसी नकारात्मक सोच व्यक्ति को भगवान के वास्तविक स्वरूप से दूर कर देती है।
भगवान सभी जीवों के एकमात्र मित्र, पालक और शुभचिंतक हैं। वे अपने ऐश्वर्य, बल, यश, ज्ञान, सौंदर्य और वैराग्य से सबका पालन करते हैं। शरणागत आत्मा भगवान के अतिरिक्त किसी और का आश्रय नहीं लेती, इसलिए भगवान उससे विशेष प्रेम करते हैं। ब्रह्मा जी स्वयं को भी केवल भगवान का उपकरण मानते हैं और यही चाहते हैं कि सृष्टि करते समय उनके भीतर “मैं कर्ता हूँ” का झूठा अहंकार न आए।
यह भी स्पष्ट किया गया है कि भौतिक कार्य करते हुए भी आध्यात्मिक चेतना बनाए रखना आसान नहीं है। बड़े से बड़ा साधक भी यदि सावधान न रहे, तो गिर सकता है। इसलिए ब्रह्मा जी बार-बार भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें अपनी वैदिक चेतना और दिव्य स्मरण से विचलित न होने दें। यही शिक्षा हर साधक के लिए है—कर्तव्य निभाते समय भी भगवान की शरण और सुरक्षा आवश्यक है।
अंत में भाव यह है कि भगवान असीम करुणामय हैं। वे इस पूरे ब्रह्मांड को जीवों के उत्थान का अवसर मानते हैं। उनकी दृष्टि पड़ते ही निराशा दूर हो जाती है और दिशा मिल जाती है। भगवान और जीव के बीच जो दिव्य प्रेम और आनंद का आदान-प्रदान है, वही जीवन की सर्वोच्च पूर्णता है। ब्रह्मा जी की यह प्रार्थना केवल उनकी नहीं, बल्कि हर जीव की प्रार्थना है—कि हम भगवान की कृपा से अपने कर्तव्य निभाएँ, अहंकार से बचे रहें और अंततः उनकी भक्ति में स्थिर हो सकें।
इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि ब्रह्मा को जो भी ज्ञान, सामर्थ्य और दिशा मिली, वह उनकी अपनी बुद्धि या प्रयास से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा से मिली। प्रारंभ में ब्रह्मा अपने जन्म और कर्तव्य को लेकर भ्रम में थे, पर जब उन्होंने तपस्या, एकाग्रता और विनम्र प्रार्थना का सहारा लिया, तब भगवान स्वयं उनके हृदय में प्रकट होकर उन्हें ज्ञान देने लगे। उस समय बाहरी गुरु का कोई अवसर नहीं था, इसलिए भगवान ही उनके आंतरिक गुरु बने और भीतर से सब कुछ स्पष्ट करा दिया।
ब्रह्मा जिस विशाल सृष्टि-कार्य को देखकर चिंतित और व्याकुल थे, वह वास्तव में किसी भी साधारण बुद्धि के लिए असंभव था। विभिन्न जीवों के लिए उपयुक्त लोक, शरीर और परिस्थितियाँ निर्धारित करना अत्यंत जटिल कार्य था। भगवान यह सब जानते थे, इसलिए उन्होंने ब्रह्मा को आश्वस्त किया कि जिस कार्य के लिए उन्हें चुना गया है, उसके लिए आवश्यक शक्ति और व्यवस्था पहले से ही की जा चुकी है। ब्रह्मा को केवल अहंकार छोड़कर भगवान पर निर्भर रहना था।
भगवान का संदेश यह है कि जब कोई व्यक्ति ईश्वर द्वारा सौंपे गए कर्तव्य को करता है, तो उसे घबराने या स्वयं को कर्ता मानने की आवश्यकता नहीं होती। जो व्यक्ति अपने कार्य का श्रेय स्वयं लेना चाहता है, वह भीतर से कमजोर रहता है, लेकिन जो भगवान को मार्गदर्शक मानकर विनम्र भाव से काम करता है, उसे भीतर से सही बुद्धि और दिशा मिलती रहती है। जैसे अर्जुन को युद्ध का दायित्व मिला और विजय पहले से ही सुनिश्चित थी, वैसे ही ब्रह्मा के लिए भी सफलता सुनिश्चित थी।
अंततः शिक्षा यही है कि तपस्या, ध्यान और भक्ति के माध्यम से जब मन शांत और समर्पित हो जाता है, तब भगवान हृदय से ही सब कुछ समझा देते हैं। तब न चिंता रहती है, न भ्रम। जो व्यक्ति इस भाव में रहता है, वह अपने जीवन और कर्तव्यों को सहजता से निभा पाता है, क्योंकि उसकी शक्ति का स्रोत स्वयं भगवान बन जाते हैं।
इस पूरे उपदेश का सरल भाव यह है कि जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से भक्ति सेवा में लगा रहता है, तो उसे हर जगह भगवान ही दिखाई देने लगते हैं। तब भगवान अलग से कहीं दूर नहीं लगते, बल्कि अपने भीतर, अन्य जीवों में और पूरे ब्रह्मांड में एक ही सत्य के रूप में अनुभव होते हैं। जैसे लकड़ी के भीतर आग छिपी रहती है और प्रकट होने पर वही आग हर जगह एक जैसी होती है, वैसे ही भगवान की शक्ति सबमें व्याप्त है। यह दृष्टि मिलने पर मनुष्य का भ्रम स्वतः समाप्त हो जाता है।
भगवान ब्रह्मा को यह आश्वासन देते हैं कि सृष्टि करते हुए भी वे भगवान से अलग नहीं होंगे। यदि मन भगवान में स्थिर है, तो कर्म करते समय भी भक्ति बनी रहती है। तब न अहंकार आता है, न आसक्ति, न ही वासना का प्रभाव पड़ता है। शरीर और मन की पहचान छूटने पर जीव अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान लेता है, और वही स्वरूप भगवान की प्रेममयी सेवा है।
यह भी समझाया गया है कि सेवा कोई बंधन नहीं है। भौतिक संसार में सेवा मजबूरी और शोषण जैसी लगती है, इसलिए लोग उससे डरते हैं। लेकिन आध्यात्मिक सेवा प्रेम पर आधारित होती है, जहाँ सेवक भी स्वतंत्र होता है। भगवान और भक्त के बीच जो सेवा है, वह माता–पुत्र, मित्र–मित्र या पति–पत्नी के प्रेम जैसी स्वाभाविक और आनंदमयी होती है। वही सेवा इस संसार में भक्ति के रूप में झलकती है।
ज्ञानी और भक्त दोनों ही भौतिक बंधनों से मुक्त होते हैं, लेकिन भक्त आगे बढ़कर प्रेम के स्तर पर भगवान से संबंध विकसित करता है। इसलिए भक्त की उन्नति रुकती नहीं, बल्कि और गहरी होती जाती है। जब कोई भक्त दूसरों को भी भक्ति की ओर लाने की इच्छा करता है, तो यह भौतिक विस्तार नहीं, बल्कि भगवान की अकारण कृपा का विस्तार होता है।
अंत में भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि यदि मन सदा भगवान में स्थिर है, तो संसार के बड़े से बड़े कार्य भी व्यक्ति को गिरा नहीं सकते। ब्रह्मा जैसे महान भक्त भी कभी-कभी भ्रमित होते हुए दिखते हैं, लेकिन वह भ्रम भी भगवान की योजना का ही भाग होता है, ताकि भक्त और अधिक गहराई से भगवान को समझ सके। यही संदेश है कि भक्ति में स्थिर रहने वाला व्यक्ति कभी भी भगवान से अलग नहीं होता।
इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि भगवान को साधारण बुद्धि, तर्क या इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता। बद्ध आत्मा भगवान को इसलिए नहीं समझ पाती क्योंकि वह उन्हें भौतिक तत्वों से बना हुआ मान लेती है। लेकिन वास्तव में भगवान का स्वरूप न तो पाँच स्थूल तत्वों से बना है और न ही मन, बुद्धि और अहंकार जैसे सूक्ष्म तत्वों से। भगवान का रूप आध्यात्मिक है—न भौतिक और न ही कल्पना मात्र। यही सत्य ब्रह्मा ने समझा, और इसी कारण भगवान ने कहा कि आज तुम मुझे वास्तव में जान पाए हो।
भगवान को जानने का अर्थ यह नहीं है कि हम हर भौतिक रूप को नकार दें, बल्कि यह समझें कि आध्यात्मिक रूप भौतिक नहीं होता। यह नकारात्मक सोच कि “जो रूप दिखता है वह भौतिक है, इसलिए परम सत्य निराकार होगा”—यह भी भौतिक बुद्धि की सीमा है। भगवान के अनेक रूप हैं, लेकिन वे सभी शुद्ध, शाश्वत और चेतन हैं। उनमें शरीर और आत्मा का भेद नहीं होता, जैसा हमारे जैसे बद्ध जीवों में होता है।
ब्रह्मा ने अपने प्रयास से भगवान को ढूँढने की कोशिश की—कमल के तने के भीतर जाकर, स्रोत खोजकर—लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। इसका कारण यह था कि भगवान को खोजा नहीं जा सकता, उन्हें केवल उनकी कृपा से ही जाना जा सकता है। जब भगवान भक्ति, तपस्या और विनम्रता से प्रसन्न होते हैं, तब वे स्वयं भीतर से अपना स्वरूप प्रकट करते हैं। प्रेम और समर्पण से जागृत हुई आध्यात्मिक दृष्टि ही भगवान को देखने का माध्यम है।
भगवान स्वयं बताते हैं कि ब्रह्मा की प्रार्थनाएँ, उनकी तपस्या और उनकी दृढ़ आस्था—यह सब भी अंततः भगवान की अकारण कृपा का ही परिणाम है। जब कोई जीव सच्चे मन से भगवान की सेवा करना चाहता है, तो भगवान भीतर से गुरु बनकर उसे मार्गदर्शन देते हैं। इस मार्ग में धन, शिक्षा या बाहरी योग्यता नहीं देखी जाती; केवल सच्ची इच्छा ही पर्याप्त होती है।
भगवान को सबसे अधिक प्रसन्न करने वाली बात उनके दिव्य गुणों का प्रेमपूर्वक गुणगान है। शुद्ध भक्त यही चाहता है कि भगवान को सभी जानें और उनका यश पूरे ब्रह्मांड में फैले। ऐसी इच्छा भगवान अवश्य पूरी करते हैं। लेकिन जो लोग अपनी इंद्रिय तृप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं, वे इन प्रार्थनाओं का वास्तविक भाव नहीं समझ पाते।
अंततः संदेश यही है कि भगवान सभी आशीर्वादों के स्वामी हैं, लेकिन वे उन्हीं इच्छाओं को पूर्ण करते हैं जो भक्ति और प्रेम से जुड़ी होती हैं। जो व्यक्ति ब्रह्मा के समान विनम्रता, श्रद्धा और निष्काम भाव से भगवान की पूजा करता है, उसकी आध्यात्मिक कामनाएँ निश्चित रूप से पूरी होती हैं, क्योंकि भगवान ऐसे भक्तों से अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
इस पूरे वर्णन का सरल भाव यह है कि मनुष्य जो भी अच्छे कर्म करता है—चाहे वह दान हो, तपस्या हो, यज्ञ हो, सेवा हो, ध्यान हो या समाज के लिए किया गया कोई भी श्रेष्ठ कार्य—उन सबका वास्तविक उद्देश्य केवल भगवान को प्रसन्न करना है। यदि भगवान प्रसन्न नहीं हुए, तो बाहर से कितना भी बड़ा या अच्छा दिखने वाला कर्म क्यों न हो, उसका कोई स्थायी मूल्य नहीं रहता। और यदि भगवान प्रसन्न हो गए, तो साधारण-सा कर्म भी पूर्ण और सफल हो जाता है।
मनुष्य सामान्यतः अपने शरीर, मन और उनसे जुड़े लोगों को सबसे प्रिय मान लेता है, इसलिए उसका प्रेम सीमित और अस्थायी बन जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रेम का मूल आधार शरीर नहीं, आत्मा है, और आत्मा का मूल आधार परमात्मा हैं। जब तक यह समझ नहीं आती कि भगवान ही सबसे प्रिय हैं, तब तक मनुष्य बद्ध अवस्था में रहता है। जैसे ही यह अनुभूति हो जाती है कि भगवान ही हर जीव के परम प्रिय हैं, वही अवस्था मुक्ति की है।
भगवान सभी के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं और सबके सर्वोच्च निर्देशक तथा शुभचिंतक हैं। जीव उनसे इसलिए प्रेम करता है क्योंकि वह उनका अंश है, लेकिन अज्ञानवश वह उस प्रेम को शरीर और संसार की वस्तुओं पर लगा देता है। यह प्रेम माया के कारण विकृत हो जाता है और इसलिए टिकता नहीं। जब वही प्रेम भगवान की ओर मुड़ जाता है, तब वह शुद्ध, स्थायी और संतोष देने वाला बन जाता है।
केवल सैद्धांतिक ज्ञान या तर्क से भगवान को नहीं पाया जा सकता। जैसे आँखें सूर्य के प्रकाश से ही देख सकती हैं, वैसे ही भगवान को केवल प्रेम और भक्ति के प्रकाश से ही जाना जा सकता है। जिनके भीतर भगवान के प्रति स्नेह नहीं है, वे ऊँचे ज्ञान के बावजूद भी भगवान की कृपा का लाभ नहीं उठा पाते। दूसरी ओर, साधारण व्यक्ति भी यदि सच्चे प्रेम से भक्ति करता है, तो वह अपने भीतर भगवान का अनुभव कर सकता है।
इसीलिए भगवान ब्रह्मा से कहते हैं कि अब तुम मेरी आज्ञा और मेरी कृपा से पहले की तरह सृष्टि का विस्तार कर सकते हो। आवश्यक शक्ति, बुद्धि और सामर्थ्य तुम्हें मुझसे ही प्राप्त है। यह सब समझाकर भगवान अपने शाश्वत व्यक्तिगत स्वरूप में अंतर्धान हो गए, यह दिखाने के लिए कि वे सृष्टि से पहले भी थे, सृष्टि के दौरान भी हैं और सृष्टि के बाद भी अपने दिव्य स्वरूप में सदा विद्यमान रहते हैं। यही इस पूरे उपदेश का सार है—हर कर्म का लक्ष्य भगवान की प्रसन्नता और हर प्रेम का केंद्र भगवान ही होना चाहिए।
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