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यह पूरा प्रसंग बहुत सरल भाषा में इस प्रकार है—

नहुष के छह पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े यति ने राजा बनने से मना कर दिया क्योंकि वे जीवन का असली लक्ष्य — आत्म-साक्षात्कार — पाना चाहते थे। इससे यह बात समझ में आती है कि जो व्यक्ति राज-पद, वैभव और शक्ति के मोह में पड़ जाता है, वह आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता। पर जो भक्ति और श्रवण के मार्ग पर चलता है, जैसे अंत में महाराज परीक्षित ने किया, वह आसानी से परम लक्ष्य पा लेता है।

श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी कहा कि कोई भी व्यक्ति, किसी भी स्थिति में हो, यदि वह रोज़ भागवत सुने तो भगवान को प्राप्त कर सकता है।

नहुष के पतन के बाद ययाति राजा बने। उनका विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से हुआ। परीक्षित महाराज यह देखकर चकित थे कि एक ब्राह्मण-कन्या (देवयानी) ने क्षत्रिय (ययाति) से विवाह कैसे किया, क्योंकि शास्त्रों में इसे प्रतिलोम विवाह कहा जाता है।

फिर कथा बताती है कि देवयानी और शर्मिष्ठा सखियाँ थीं। एक दिन वे उद्यान में स्नान करने गईं। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती आए, तो सब लड़कियाँ घबराकर कपड़े पहनने लगीं। हड़बड़ी में शर्मिष्ठा ने देवयानी का वस्त्र पहन लिया। देवयानी अभिमान में भरकर उसे बहुत अपमानित करने लगी। शर्मिष्ठा क्रोध में आकर देवयानी को कुएँ में धक्का दे देती है और वहाँ से चली जाती है।

कुछ देर बाद राजा ययाति वहाँ आते हैं और कुएँ में गिरी देवयानी को बाहर निकालते हैं। देवयानी इसे ईश्वरीय व्यवस्था मानकर कहती है कि अब वही उसका पति होगा, क्योंकि कच के श्राप के कारण वह ब्राह्मण से विवाह नहीं कर सकती थी।

देवयानी अपने पिता शुक्राचार्य के पास यह सब बताती है। शुक्राचार्य दुखी होते हैं, पर बेटी के लिए न्याय माँगने वृषपर्वा के पास जाते हैं। वृषपर्वा प्रार्थना करता है कि वह देवयानी की हर इच्छा पूरी करेगा। देवयानी चाहती है कि शर्मिष्ठा उसकी दासी बने। वृषपर्वा यह शर्त स्वीकार कर लेता है। इस तरह शर्मिष्ठा देवयानी की दासी बन जाती है।

शुक्राचार्य देवयानी का विवाह ययाति से कर देते हैं और चेतावनी देते हैं कि शर्मिष्ठा के साथ संबंध न रखना। पर समय के बाद शर्मिष्ठा भी पुत्र चाहती है, और क्षत्रिय धर्म के अनुसार ययाति उसकी प्रार्थना अस्वीकार नहीं कर सकते। इस कारण उनके भी तीन पुत्र होते हैं।

जब देवयानी को यह पता चलता है, वह क्रोधित होकर अपने पिता के पास जाती है। शुक्राचार्य गुस्से में ययाति को श्राप देते हैं कि वह बूढ़ा हो जाएगा। ययाति विनती करता है कि उसकी इच्छाएँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। तब शुक्राचार्य कहते हैं कि यदि कोई पुत्र अपनी युवावस्था उसे दे दे, तो वह फिर से युवा हो सकता है।

ययाति अपने पुत्रों से युवावस्था माँगता है, पर बड़े पुत्र यदु मना कर देते हैं, क्योंकि वे जानते थे कि सच्चा वैराग्य तभी आता है जब भोग की इच्छा स्वयं खत्म हो जाए। बाकी तीन पुत्र भी इंकार करते हैं, पर अहंकारवश। केवल छोटा पुत्र पुरु अपने पिता की सेवा के लिए अपनी युवावस्था दे देता है। ययाति उसके बुढ़ापे को लेकर फिर से युवा हो जाता है और लंबे समय तक भोगों में लिप्त रहता है। लेकिन अंत में वह समझता है कि भौतिक सुख कितने भी बड़े हों, वे कभी भी मन को तृप्त नहीं कर सकते।

अंततः वह सब त्यागकर भगवान नारायण का स्मरण करता है और समझ जाता है कि असली सुख केवल भगवान की भक्ति में है। इंद्रियाँ जब भगवान की सेवा में लगती हैं, तो वे शुद्ध हो जाती हैं और वास्तविक आनंद देती हैं। यही भक्ति का असली अर्थ है।

संक्षेप में—
यह प्रसंग दिखाता है कि अहंकार, क्रोध, कामना और भोग मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं; जबकि भक्ति, नम्रता और भगवान का स्मरण मनुष्य को सच्चे सुख और परम लक्ष्य की ओर ले जाता है।

All glories to Srila Prabhupada 🙏 

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