Sri Jagdish Pandit Appearance
(नित्यानन्द-सखा)
उनके पिता का नाम कमलाक्ष था और उनके पितामह भट्ट नारायण थे। उनका श्रीपाट नदिया ज़िले के यशोड़ा ग्राम में, चाकदाहा रेलवे स्टेशन के निकट स्थित है। जगदीश द्वारा प्रतिष्ठित भगवान जगन्नाथ और भगवान गौरांग के विग्रह आज भी उनके श्रीपाट में विराजमान हैं। वे अपने पूर्व अवतार में चन्द्रहंस थे (चैतन्य-चरितामृत 1.11.30; गौर-गणोद্দেশ-दीपिका 153; श्रीपाट-पर्यटन)। अधिक विवरण जगदीशचरित्र में प्राप्त होते हैं।
“श्री जगदीश पण्डित जगत के उद्धारकर्ता हैं। वे कृष्ण-प्रेम के अमृत का वितरण उसी प्रकार करते हैं जैसे आकाश में घने श्यामल मेघ वर्षा करते हैं।”
— (चैतन्य-चरितामृत, आदि 11.30)
श्री जगदीश भट्ट का जन्म गैहाटी प्रदेश में हुआ। उनके पिता का नाम श्री कमलाक्ष भट्ट था, जो भट्ट नारायण के पुत्र थे और गोयघर बान्ध्याघाट के निवासी थे। जगदीश के माता-पिता दोनों ही अत्यन्त भक्त वैष्णव थे। माता-पिता के देहान्त के बाद वे अपनी पत्नी के साथ गंगा तट पर रहने आ गए। उनकी पत्नी का नाम दुखिनी-देवी था। (उनके छोटे भाई महेश भी उनके साथ गंगा तट पर आकर रहने लगे।) उन्होंने जगन्नाथ मिश्र के घर के पास अपना निवास बनाया।
श्री गौरसुन्दर ने जगदीश को नीलाचल में हरिनाम-प्रचार करने की आज्ञा दी। इस प्रकार उन्होंने भगवान जगन्नाथ के चरणकमलों की शरण ली। उस समय उन्होंने भगवान जगन्नाथ के चरणों में प्रार्थना की और उन्हें कमलनयन भगवान का एक विग्रह प्राप्त हुआ। वे इस विग्रह को चाकदाहा के निकट गंगा तट पर स्थित यशोड़ा (यसोरा) ले आए। यह विग्रह एक दण्ड (लाठी) से लटकाकर लाया गया था, जिसकी आज भी यशोड़ा स्थित भगवान जगन्नाथ के मन्दिर में पूजा होती है। यह मन्दिर वर्तमान में श्री गौड़ीय मठ के अधीन है और सीलदह–कृष्णनगर रेलवे लाइन पर चाकदाहा स्टेशन से रिक्शा दूरी पर स्थित है।
कभी-कभी भगवान चैतन्य और भगवान नित्यानन्द यशोड़ा आकर संकीर्तन के महोत्सव किया करते थे। जगदीश पण्डित के पुत्र का नाम श्री रामभद्र गोस्वामी था। मन्दिर में श्री जगन्नाथ देव, श्री राधा-वल्लभजी तथा श्री गौर-गोपाल के विग्रह विराजमान हैं। कहा जाता है कि गौर-गोपाल विग्रह की स्थापना स्वयं श्री दुखिनी-देवी ने की थी। यह विग्रह स्वर्ण-वर्ण का है।
जब भगवान चैतन्य ने जगदीश पण्डित के घर संकीर्तन महोत्सव किया, तब उन्होंने नीलाचल जाने का निश्चय किया। यह जानकर कि प्रभु शीघ्र ही प्रस्थान करेंगे, दुखिनी-देवी विरह की आशंका से अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। तब महाप्रभु ने उन्हें यह विग्रह दिया और कहा—
“मैं इस विग्रह के रूप में सदा तुम्हारे घर में निवास करूँगा।”
उसी दिन से वहाँ इस गौर-गोपाल विग्रह की नियमित पूजा होती आ रही है।
गौर-गणोद্দেশ-दीपिका में बताया गया है कि जगदीश और हिरण्य कृष्ण-लीला में वैदिक ब्राह्मणों की पत्नियाँ थे। एक अन्य मत के अनुसार—जो पहले कृष्ण-लीला में प्रसिद्ध नर्तक चन्द्रहंस थे, वही अब जगदीश पण्डित के रूप में प्रसिद्ध हैं, जिन्हें भावावेश में नृत्य करने में अत्यन्त आनन्द आता है।
एक एकादशी के दिन बालक श्री गौरहरि जगदीश और हिरण्य के घर से चावल खाना चाहते थे। प्रभु ने अपने माता-पिता से कहा—
“यदि आप नहीं चाहते कि मैं मर जाऊँ, तो तुरंत उन दो ब्राह्मणों—जगदीश और हिरण्य—के घर जाइए, जिनसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। वे आज एकादशी का व्रत कर रहे हैं, पर उन्होंने भगवान विष्णु के लिए कुछ भोग तैयार किया है। यदि आप उस विष्णु-प्रसाद को ले आएँ, तो मैं स्वस्थ हो जाऊँगा और चलने-फिरने लगूँगा।”
— (चैतन्य-भागवत, आदि 6.20–23)
एक दिन बालक गौरहरि निरन्तर रो रहे थे। उनके माता-पिता ने कहा—
“पहले बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए। हम लेकर आएँगे, पर कृपया रोओ मत।”
उन्होंने उत्तर दिया—
“आज एकादशी के दिन जगदीश और हिरण्य के घर विष्णु-प्रसाद की बहुत-सी तैयारियाँ हैं। यदि मैं वह खा लूँ, तो मैं ठीक हो जाऊँगा।”
अपने पुत्र की यह असम्भव-सी इच्छा सुनकर सची माता ने सिर पर हाथ रखकर विलाप करना आरम्भ कर दिया। बच्चे की बात सुनकर पड़ोसी आश्चर्य से हँसने लगे—
“इतना छोटा बच्चा कैसे जानता है कि आज एकादशी है?”
तब स्त्रियों ने उनसे कहा—
“बाप निमाई, अब रोओ मत। हम तुम्हारी माँग पूरी कर देंगे।”
जब उन दोनों ब्राह्मणों ने बच्चे की इच्छा के बारे में सुना, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे दोनों जगन्नाथ मिश्र के घनिष्ठ मित्र थे और भली-भाँति जानते थे कि उनके घर में स्वयं भगवान श्री हरि अवतरित हुए हैं। अतः जो कुछ भी उन्होंने भगवान हरि के लिए तैयार किया था, वह सब वे श्री गौरहरि के पास ले आए और बोले—
“बाप विश्वम्भर! आपने जो माँगा था, वह सब हम ले आए हैं। अब कृपया आनन्दपूर्वक इसे ग्रहण कीजिए और रोइए मत।”
तत्पश्चात भगवान श्री गौरसुन्दर ने अपने सखाओं के साथ उस प्रसाद-भोजन का आनन्द लिया। उसी समय उन्होंने जगदीश और हिरण्य को अपना दिव्य बाल-गोपाल रूप दिखाया। उनका शरीर ताज़े वर्षा-मेघ के समान श्यामल था, मस्तक पर मोरपंख शोभायमान था और उनकी सौन्दर्य-कान्ति उनके साथ बैठे बालकों के मुखों में प्रतिबिम्बित हो रही थी। यह अत्यन्त मनोहर और रमणीय दृश्य जगदीश और हिरण्य की आँखों के सामने प्रकट हुआ। उसे देखकर दोनों ब्राह्मण ऊँचे स्वर में “हरि! हरि!” का कीर्तन करने लगे।
— (गौरांग चम्पू, 20)
संभवतः महाप्रभु के संन्यास ग्रहण करने के बाद ही जगदीश पण्डित यशोड़ा आए। वे प्रति वर्ष पुरी जाते थे और पानीहाटी में चिड़ा-दही-दण्ड महोत्सव में भी सम्मिलित होते थे। उनका तिरोभाव पौष मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ।
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