10.8-11 Geeta
भगवान श्रीकृष्ण ही समस्त आध्यात्मिक और भौतिक सृष्टि के मूल कारण, पालनकर्ता और परम लक्ष्य हैं। ब्रह्मा, शिव, इन्द्र आदि सभी देवता भी उन्हीं से उत्पन्न होते हैं; अतः वे ही परम पुरुषोत्तम और सर्वोच्च सत्य हैं। जो ज्ञानी इस सत्य को वास्तव में समझ लेते हैं, वे तर्क-वितर्क, कल्पना या शुष्क ज्ञान में नहीं उलझते, बल्कि स्वाभाविक रूप से प्रेमपूर्वक भक्ति में लग जाते हैं। उनका मन, वचन और जीवन केवल कृष्ण की सेवा, नाम-स्मरण, कीर्तन और उनके गुण-लीला की चर्चा में लगा रहता है, और इसी में उन्हें वास्तविक आनंद मिलता है।
ऐसे शुद्ध भक्तों पर भगवान विशेष कृपा करते हैं। वे बाहर से शास्त्र और गुरु के माध्यम से तथा भीतर से परमात्मा रूप में स्वयं बुद्धि-योग देते हैं, जिससे भक्त सही मार्ग समझकर निश्चित रूप से भगवान तक पहुँच सके। अज्ञान, संशय और हृदय की मलिनता को भगवान स्वयं ज्ञान के दीपक से दूर कर देते हैं। इसलिए परम सत्य को केवल मानसिक चिंतन या दर्शन से नहीं, बल्कि निरंतर हरिनाम जप, श्रवण, कीर्तन और समर्पित सेवा से जाना जा सकता है। जब भक्ति का बीज हृदय में सिंचित होता है, तो वह बढ़ते-बढ़ते अंततः कृष्ण के चरणों तक पहुँचा देता है — यही जीवन की पूर्ण सिद्धि है।
All Glories To Srila Prabhupada 🙏
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