dhan mora nityanand

Srila Narottam das Thakur ki jai 

धन मोरा नित्यानंद

इस पद का भाव अत्यन्त मधुर और शुद्ध भक्ति से भरा हुआ है। कवि अपना सम्पूर्ण जीवन भगवान और उनके भक्तों के चरणों में अर्पित कर देता है। उसके लिए भगवान नित्यानंद और गौरांग ही उसका वास्तविक धन और स्वामी हैं, राधा-कृष्ण का दिव्य युगल ही उसका जीवन है, और उनके पार्षद ही उसका परिवार, शक्ति और गौरव हैं। इस प्रकार उसकी पहचान, संबंध और आश्रय सब कुछ केवल भगवान और वैष्णवों से जुड़ा हुआ है, संसार से नहीं।
वह अपने को अत्यन्त विनम्र बनाकर भक्तों के चरणों की धूल को पवित्र स्नान मानता है, उनके नामों का जप ही उसकी तृप्ति है, और भक्ति के प्रकाश में विचार करके वह निष्कर्ष निकालता है कि श्रीमद्भागवतम् ही सभी शास्त्रों का सार और परम मार्गदर्शक है। उसके लिए आध्यात्मिक उन्नति का साधन विद्वता या अहंकार नहीं, बल्कि साधु-संग और सेवा है।
अंत में उसका हृदय इतना दास्य-भाव से भर जाता है कि वह भक्तों के जूठन को भी प्रसाद समझकर स्वीकार करता है, उनके नामों में ही अपनी खुशी पाता है, और वृंदावन धाम को अपना वास्तविक निवास मानता है। निर्धनता का भाव रखते हुए वह स्वयं को दास समझता है और यही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति बन जाती है।
इस पूरे पद का सार यही है कि सच्चा सुख, पहचान और पूर्णता केवल भगवान, उनके भक्तों की सेवा, विनम्रता और वृंदावन-भाव में ही मिलती है, न कि संसार के किसी भौतिक आश्रय में।

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