Guruvastakam

यह प्रार्थनाएँ श्री गुरु की महिमा का गान करती हैं और बताती हैं कि गुरु ही संसार रूपी दावानल को शीतल करने वाले करुणामय मेघ हैं। उनकी कृपा से जीव भौतिक कष्टों से मुक्त होकर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। गुरु स्वयं हरिनाम-संकीर्तन में मग्न रहते हैं, नृत्य-कीर्तन द्वारा हृदयों को पवित्र करते हैं और शिष्यों को भी उसी प्रेममय सेवा में लगाते हैं। वे श्री श्री राधा-कृष्ण की नित्य सेवा, मंदिर की पूजा-अर्चना, प्रसाद अर्पण, हरिकथा-श्रवण और स्मरण में सदा रत रहते हैं तथा शिष्यों को भी इन सेवाओं में प्रशिक्षित करते हैं। वे व्रज की दिव्य लीलाओं के रस में स्थित होकर भगवान के अंतरंग सेवक के रूप में जीवों को उस दिव्य प्रेम की ओर ले जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार गुरु भगवान के अत्यंत प्रिय प्रतिनिधि हैं; इसलिए उनकी सेवा और संतोष से ही भगवान की कृपा प्राप्त होती है, और उनकी अप्रसन्नता से कोई उन्नति संभव नहीं। अतः शिष्य का कर्तव्य है कि विनम्रता, श्रद्धा और कृतज्ञता से सदैव गुरु के चरणों में आश्रय लेकर नाम-स्मरण, सेवा और भक्ति में जीवन को समर्पित करे, क्योंकि गुरु-कृपा ही भक्ति और भगवान-प्राप्ति का वास्तविक द्वार है।

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