SB 8.3

अध्याय “गजेंद्र की समर्पण प्रार्थनाएँ” का सार यही है कि जब जीव अपनी शक्ति, अहंकार और सांसारिक सहारों पर निर्भर रहता है, तब तक वह बार-बार संकट में फँसता है; परंतु जब वह असहाय होकर पूर्ण समर्पण के साथ परमेश्वर की शरण लेता है, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। गजेंद्र पहले इंद्रद्युम्न राजा था—अर्थात् पूर्व जन्म की भक्ति कभी नष्ट नहीं होती। संकट की घड़ी में वही संस्कार जागृत हुआ और उसने “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का स्मरण किया। यह दर्शाता है कि सच्ची साधना जीवन की अंतिम परीक्षा में ही सिद्ध होती है।

गजेंद्र ने किसी देवता को नहीं पुकारा, क्योंकि उसकी प्रार्थना मूल कारण—समस्त कारणों के कारण—परम पुरुषोत्तम भगवान के लिए थी। उसने भगवान को सृष्टि के आधार, सबके हृदय में स्थित परमात्मा, कारण और परिणाम से परे, और अपनी आंतरिक शक्ति से लीलाएँ करने वाले स्वरूप के रूप में स्वीकार किया। उसने यह भी समझा कि भगवान भौतिक गुणों से परे हैं, फिर भी उन्हीं के निर्देशन में प्रकृति कार्य करती है। यह वही तत्त्वज्ञान है जिसे आप भगवद्गीता के अध्याय 7, 9 और 10 में पढ़ रही हैं—कि भगवान सबके स्रोत हैं, फिर भी सबसे अलग और स्वतंत्र हैं।

सबसे गहन शिक्षा यह है कि शुद्ध भक्ति में कोई मांग नहीं होती। गजेंद्र ने अंत में केवल भौतिक जीवन से मुक्ति और अज्ञान के आवरण से छुटकारा माँगा। उसने समझ लिया कि हाथी का शरीर, बल या पद किसी काम का नहीं; वास्तविक शरण केवल भगवान के चरण हैं। यही शरणागति है—जब जीव कहता है, “मेरे पास और कोई आश्रय नहीं।”

भगवान का प्रकट होना भी इस सत्य को स्थापित करता है कि वे “परित्राणाय साधूनाम्” अपने भक्त की पुकार सुनते हैं। ब्रह्मा, शिव या अन्य देवता नहीं आए, क्योंकि वे सीमित अधिकार वाले हैं; परंतु नारायण स्वयं गरुड़ पर सवार होकर आए। यह बताता है कि परम आश्रय केवल वही हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से गजेंद्र और मगरमच्छ का संघर्ष हमारे जीवन का प्रतीक है—मगरमच्छ समय, कर्म और आसक्ति है, जो हमें धीरे-धीरे खींचता है। जब तक हम अपने बल पर लड़ते हैं, संघर्ष चलता रहता है; पर जैसे ही हम हृदय से पुकारते हैं, भगवान की कृपा हमें ऊपर उठा लेती है।

इस अध्याय का सार यही है कि पूर्व संस्कारों से पोषित भक्ति, संकट में स्मरण, तत्त्वज्ञान से युक्त प्रार्थना, और निष्काम शरणागति—ये चारों मिलकर जीव को भगवान की सीधी कृपा तक पहुँचा देते हैं। सच्ची मुक्ति बाहरी संकट से नहीं, बल्कि अज्ञान के आवरण से है; और वह केवल प्रेममयी सेवा में लीन होकर ही प्राप्त होती है।

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