skand 3 adhyay 18

SB 3.18
इन श्लोकों का सार यह है कि हिरण्याक्ष का अहंकार इतना बढ़ चुका था कि उसने वरुण और नारद जैसे महान व्यक्तियों की बातों को भी गंभीरता से नहीं लिया। भगवान को अजेय और सर्वशक्तिमान जानने के बाद भी वह उनसे युद्ध करने के लिए उत्सुक था। जब उसने वराह भगवान को पृथ्वी का उद्धार करते देखा, तब भी वह उनके दिव्य स्वरूप को पहचान नहीं सका और उन्हें एक साधारण जंगली पशु समझकर उपहास करने लगा। यही राक्षसी प्रवृत्ति है—भगवान के अवतार, उनके कार्य और उनके दिव्य शरीर को भौतिक दृष्टि से देखना।

हिरण्याक्ष के शब्द बाहर से अपमानजनक दिखाई देते हैं, लेकिन भगवान इतने महान हैं कि उनके विरोधी भी अनजाने में उनकी महिमा का ही वर्णन कर देते हैं। वह भगवान को चुनौती देता है, उन्हें देवताओं का पक्षपाती और छिपकर कार्य करने वाला कहता है, तथा यह दावा करता है कि वह अपनी शक्ति से भगवान को मार देगा। यह उसके अज्ञान की पराकाष्ठा थी, क्योंकि भगवान न तो भौतिक शक्ति से जीते जा सकते हैं और न ही नष्ट किए जा सकते हैं। वे अपनी अचिन्त्य शक्तियों से सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हुए भी अपने धाम में विराजमान रहते हैं।

हिरण्याक्ष की भगवान के प्रति घृणा वास्तव में उसकी भक्तों और धर्म के प्रति ईर्ष्या को भी प्रकट करती है। उसे यह सहन नहीं था कि देवता, ऋषि और भक्त भगवान की पूजा करें और उनके नाम का कीर्तन करें। राक्षसी मानसिकता सदैव भगवान को जीवन के केन्द्र से हटाकर केवल इन्द्रिय-भोग और भौतिक उन्नति को बढ़ावा देना चाहती है। इसके विपरीत, भक्त समझते हैं कि भगवान ही समस्त शक्ति, सुख और अस्तित्व के मूल स्रोत हैं। जैसे वृक्ष की जड़ को सींचने से पूरा वृक्ष पुष्ट हो जाता है, वैसे ही भगवान की भक्ति करने से समस्त जीवों का कल्याण हो जाता है।

इन श्लोकों से यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और ईर्ष्या मनुष्य को भगवान की वास्तविक महिमा देखने से वंचित कर देते हैं, जबकि विनम्रता और भक्ति से वही भगवान जीवन के परम आश्रय और समस्त सुख के मूल स्रोत के रूप में प्रकट हो जाते हैं। हिरण्याक्ष भगवान को अपना शत्रु समझ रहा था, पर वास्तव में भगवान ही उसके उद्धार और मुक्ति का कारण बनने वाले थे।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान वराहदेव ने हिरण्याक्ष के अत्यंत कटु, अपमानजनक और अहंकारपूर्ण शब्दों को सहन किया, क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी की रक्षा करना और अपने भक्तों को आश्वस्त करना था। यद्यपि भगवान को निंदा प्रिय नहीं है और वे अपने प्रति किए गए अपमान को अनुभव करते हैं, फिर भी भक्तों की रक्षा और अपने दिव्य कार्य को पूरा करने के लिए वे सब कुछ सहन कर लेते हैं। इससे भगवान की करुणा, धैर्य और भक्तवत्सलता प्रकट होती है।

हिरण्याक्ष अपनी शक्ति, धन और वैभव के मद में चूर होकर भगवान का उपहास करता रहा और यह समझ बैठा कि भगवान उससे भयभीत होकर पीछे हट रहे हैं। परन्तु वास्तव में भगवान किसी से नहीं डरते। वे पृथ्वी के उद्धार जैसे महत्वपूर्ण कार्य को प्राथमिकता दे रहे थे। यह सिखाता है कि महान और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति व्यर्थ की आलोचना या अपमान में समय नष्ट नहीं करते, बल्कि अपने कर्तव्य पर दृढ़ रहते हैं।

जब भगवान ने पृथ्वी को जल पर स्थापित किया, तब देवताओं ने उनकी महिमा का गुणगान किया, क्योंकि वे समझते थे कि समस्त ब्रह्माण्ड भगवान की शक्ति से ही संचालित हो रहा है। जो लोग भगवान की दिव्य शक्ति को नहीं समझते, वे उनकी लीलाओं को साधारण घटना मानते हैं, जबकि भक्त हर व्यवस्था के पीछे भगवान के मार्गदर्शन को देखते हैं।

भगवान की सहनशीलता कमजोरी नहीं थी। जब समय आया, तब उन्होंने अपने दिव्य क्रोध को भी प्रकट किया। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान अत्यन्त दयालु हैं, किन्तु अधर्म और अहंकार को अंततः दंड भी देते हैं। हिरण्याक्ष सोने, बल और ऐश्वर्य के अभिमान में स्वयं को अजेय समझ रहा था, लेकिन भगवान ने उसे स्मरण कराया कि वह जन्म और मृत्यु के नियमों से बंधा हुआ एक साधारण जीव है, जबकि भगवान उन नियमों से सर्वथा परे हैं।

इन श्लोकों का मुख्य संदेश यह है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए अपमान तक सहन कर लेते हैं, परन्तु अहंकार और ईश्वर-विरोध अंततः विनाश की ओर ले जाते हैं। जो व्यक्ति भगवान के दिव्य स्वरूप को समझता है, वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो सकता है, जबकि जो उनका विरोध करता है, वह अपने ही अहंकार के कारण संसार के चक्र में बंधा रहता है।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान वराहदेव हिरण्याक्ष के अहंकारपूर्ण शब्दों का उत्तर भी ऐसे देते हैं कि उसमें हास्य, उपेक्षा और गहरा सत्य तीनों समाहित हैं। भगवान स्वीकार करते हुए प्रतीत होते हैं कि उन्होंने पृथ्वी ले ली है, परन्तु वास्तव में वे यह संकेत दे रहे हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि उन्हीं की है और किसी जीव का किसी वस्तु पर वास्तविक स्वामित्व नहीं है। राक्षस "मेरा" और "तेरा" की भावना में जीता है, जबकि भगवान सर्वस्व के स्वामी हैं।

भगवान हिरण्याक्ष को युद्ध के लिए उकसाते हैं और उसके घमंड को चुनौती देते हैं। वे उसे बताते हैं कि यदि वह स्वयं को इतना शक्तिशाली समझता है तो अपने शब्दों को सिद्ध करे। इससे भगवान यह दिखाते हैं कि अहंकारी व्यक्ति अपने अभिमान के कारण स्वयं ही विनाश की ओर दौड़ता है। हिरण्याक्ष भी चुनौती सुनकर और अधिक क्रोधित हो जाता है, जैसे कोई फन फैलाए नाग, लेकिन भगवान के सामने उसकी सारी शक्ति नगण्य है।

जब हिरण्याक्ष अपनी पूरी शक्ति से गदा चलाता है, तब भगवान सहजता से उसके प्रहार को टाल देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भौतिक शक्ति चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह भगवान को स्पर्श भी नहीं कर सकती। भगवान की शक्ति असीम और दिव्य है, जबकि राक्षस की शक्ति सीमित और अस्थायी है।

यहाँ सिद्ध योगी का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। जैसे उन्नत योगी भगवान की कृपा से प्रकृति के अनेक बंधनों से ऊपर उठ सकता है, वैसे ही भगवान तो स्वयं प्रकृति के स्वामी हैं। इसलिए उन पर किसी भौतिक अस्त्र-शस्त्र का प्रभाव होना असंभव है। यह हमें सिखाता है कि जो व्यक्ति भगवान की शरण में रहता है, उसे भी भगवान विशेष शक्ति और संरक्षण प्रदान करते हैं।

इन श्लोकों की मुख्य शिक्षा यह है कि अहंकार व्यक्ति को अपनी वास्तविक स्थिति भुला देता है। हिरण्याक्ष स्वयं को विजेता समझ रहा था, जबकि भगवान के लिए वह केवल एक खेल की भाँति था। भगवान के सामने सबसे बड़ा बल, वैभव और क्रोध भी तुच्छ हो जाता है, जबकि विनम्रता और भगवान की शरण ही वास्तविक शक्ति का स्रोत हैं।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान वराहदेव और हिरण्याक्ष के बीच का युद्ध केवल दो शक्तिशाली योद्धाओं का संघर्ष नहीं था, बल्कि धर्म और अधर्म, भगवान और अहंकार, दिव्य शक्ति और दैत्य प्रवृत्ति के बीच का सामना था। हिरण्याक्ष अत्यंत क्रोधित होकर बार-बार भगवान पर आक्रमण कर रहा था, और भगवान भी अब उसके अत्याचार का अंत करने के लिए युद्ध में पूरी तरह प्रवृत्त हुए। दोनों ओर से गदाओं का आदान-प्रदान हो रहा था, परन्तु भगवान की प्रत्येक क्रिया पूर्ण नियंत्रण और दिव्य सामर्थ्य से युक्त थी।

युद्ध इतना भयंकर था कि दोनों के शरीर पर प्रहारों के चिह्न दिखाई देने लगे और देखने वालों को यह दो प्रचंड सांडों के संघर्ष जैसा प्रतीत हो रहा था। किन्तु अंतर यह था कि हिरण्याक्ष की लड़ाई अहंकार, स्वामित्व और विजय की लालसा से प्रेरित थी, जबकि भगवान का उद्देश्य पृथ्वी की रक्षा, धर्म की स्थापना और भक्तों को निर्भय करना था।

ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं का वहाँ उपस्थित होना यह दर्शाता है कि यह कोई साधारण घटना नहीं थी। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की दृष्टि इस युद्ध पर लगी हुई थी, क्योंकि इसके परिणाम पर संसार का कल्याण निर्भर था। देवता जानते थे कि भगवान ही पृथ्वी को सुरक्षित रख सकते हैं और राक्षस के आतंक का अंत कर सकते हैं।

इन श्लोकों का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि भगवान का वराह रूप किसी साधारण सूअर का शरीर नहीं है। उनका प्रत्येक अवतार पूर्णतः दिव्य, शाश्वत और आध्यात्मिक है। अज्ञानी लोग बाहरी रूप देखकर भ्रमित हो सकते हैं, परन्तु भक्त समझते हैं कि भगवान जिस भी रूप में प्रकट होते हैं, वह उनकी पूर्ण दिव्य शक्ति और महिमा से युक्त होता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह युद्ध हमारे हृदय के भीतर भी चलने वाले संघर्ष का प्रतीक है। एक ओर भगवान की शरण, सेवा और धर्म है, और दूसरी ओर अहंकार, स्वार्थ तथा भगवान से स्वतंत्र होकर सब कुछ भोगने की इच्छा। जब हम भगवान का पक्ष ग्रहण करते हैं, तब अंततः दिव्य शक्ति ही विजयी होती है, क्योंकि अधर्म और अहंकार चाहे कुछ समय तक शक्तिशाली दिखाई दें, उनका अंत निश्चित है। हिरण्याक्ष की शक्ति बढ़ती हुई प्रतीत हो रही थी, लेकिन वास्तव में वह अपने विनाश के और निकट पहुँच रहा था, जबकि भगवान की विजय पहले से ही सुनिश्चित थी।इन श्लोकों का सार यह है कि ब्रह्मा जी और अन्य महान ऋषि जानते थे कि हिरण्याक्ष कोई साधारण शत्रु नहीं था। ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के कारण उसमें असाधारण शक्ति आ गई थी और वह उस शक्ति का उपयोग धर्म की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि देवताओं, ब्राह्मणों, गायों, भक्तों और निर्दोष प्राणियों को सताने के लिए कर रहा था। यही राक्षसी प्रवृत्ति है—भगवान से या देवताओं से शक्ति प्राप्त करना, और फिर उसी शक्ति का उपयोग दूसरों को कष्ट देने में करना।

ब्रह्मा जी भगवान वराहदेव से प्रार्थना करते हैं कि अब इस राक्षस के साथ अधिक विलंब न किया जाए। यद्यपि भगवान के लिए हिरण्याक्ष को मारना अत्यंत सरल था, फिर भी वे उसके साथ युद्ध कर रहे थे। ब्रह्मा जी समझते थे कि भगवान खेल-खेल में भी इस दैत्य का अंत कर सकते हैं, जैसे कोई बालक सांप के साथ कुछ समय खेलकर उसे मार देता है। इसलिए उन्होंने निवेदन किया कि इस अत्यंत दुष्ट और कपटी राक्षस को अब तुरंत समाप्त कर देना चाहिए।

इन श्लोकों में भक्त और राक्षस के स्वभाव का भी सुंदर अंतर बताया गया है। भक्त भगवान से केवल सेवा की याचना करते हैं; वे शक्ति, ऐश्वर्य या भोग नहीं चाहते। दूसरी ओर, राक्षस तपस्या और पूजा भी अपनी इन्द्रिय-तृप्ति तथा प्रभुत्व के लिए करते हैं। जब उन्हें शक्ति मिलती है, तो वे स्वयं को अजेय समझने लगते हैं और दूसरों के लिए भय का कारण बन जाते हैं।

ब्रह्मा जी की प्रार्थना से यह भी स्पष्ट होता है कि भगवान की दृष्टि में उनके भक्त, ब्राह्मण, गायें और निर्दोष जीव विशेष संरक्षण के पात्र हैं। जब अधर्म अत्यधिक बढ़ जाता है और भक्तों पर अत्याचार होने लगता है, तब भगवान स्वयं हस्तक्षेप करते हैं। हिरण्याक्ष का आतंक अपने चरम पर पहुँच चुका था, इसलिए उसका विनाश निश्चित था।

आध्यात्मिक रूप से यह प्रसंग हमें सिखाता है कि शक्ति, ज्ञान, पद या वरदान तभी शुभ हैं जब उनका उपयोग भगवान की सेवा और जीवों के कल्याण के लिए किया जाए। जब वही शक्ति अहंकार और अत्याचार का साधन बन जाती है, तब वह व्यक्ति अपने विनाश को स्वयं बुला लेता है। हिरण्याक्ष की शक्ति ही उसके पतन का कारण बनी, जबकि भक्तों की विनम्रता और भगवान पर निर्भरता उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।इन श्लोकों का सार यह है कि ब्रह्मा जी भगवान वराहदेव से अत्यन्त विनम्रता और तात्कालिकता के साथ प्रार्थना कर रहे हैं कि अब हिरण्याक्ष का अंत कर दिया जाए। वे देखते हैं कि संध्या का समय निकट आ रहा है और राक्षस की शक्ति तथा मायावी प्रभाव बढ़ सकता है। इसलिए वे भगवान से निवेदन करते हैं कि संसार के कल्याण, देवताओं की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए अब विलंब न करें।

ब्रह्मा जी भगवान को स्मरण कराते हैं कि वे समस्त जीवों के आश्रय, सार और रक्षक हैं। जब अधर्म बढ़ता है और निर्दोष प्राणियों पर अत्याचार होने लगता है, तब भगवान का हस्तक्षेप ही शांति और संतुलन को पुनः स्थापित कर सकता है। इसलिए उनकी प्रार्थना केवल देवताओं की विजय के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत के कल्याण के लिए है।

वे यह भी बताते हैं कि अभिजीत नामक अत्यंत शुभ समय लगभग समाप्त होने वाला है। इसका भाव यह है कि भगवान की लीलाओं में भी समय का एक विशेष महत्व होता है और ब्रह्मा जी चाहते हैं कि इस शुभ अवसर का उपयोग करके अधर्म का नाश किया जाए। यद्यपि भगवान समय से परे हैं, फिर भी वे अपनी लीलाओं में समय, स्थान और परिस्थितियों का सम्मान करके संसार को शिक्षा देते हैं।

अंत में ब्रह्मा जी कहते हैं कि यह राक्षस स्वयं अपने विनाश के लिए भगवान के सामने आया है। वास्तव में, हिरण्याक्ष सोच रहा था कि वह भगवान को चुनौती देने आया है, लेकिन सत्य यह था कि वह भगवान की योजना के अनुसार अपनी मृत्यु के लिए ही उनके पास पहुँचा था। यही भगवान की अद्भुत व्यवस्था है—अहंकारी व्यक्ति स्वयं को स्वतंत्र समझता है, परन्तु अंततः वह भी भगवान की इच्छा के अधीन होता है।

इन श्लोकों की मुख्य शिक्षा यह है कि जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है, तब भगवान उसकी समाप्ति की व्यवस्था स्वयं करते हैं। भक्तों के लिए यह आश्वासन है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, भगवान उचित समय पर हस्तक्षेप करके धर्म की रक्षा और संसार में शांति की स्थापना अवश्य करते हैं।

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