SB 5.9
All Glories To Srila Prabhupada 🙏 SB 5.9 इस प्रसंग में बताया गया है कि हिरण का शरीर त्यागने के बाद महाराज भरत ने एक अत्यंत पवित्र ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया। भगवान की विशेष कृपा से उन्हें अपने पिछले दोनों जन्मों की स्मृति बनी रही। अपने पूर्व पतन से शिक्षा लेकर उन्होंने निश्चय किया कि अब किसी भी प्रकार की भौतिक आसक्ति या अभक्तों की संगति में नहीं पड़ेंगे। इसलिए उन्होंने बाहरी रूप से स्वयं को जड़, मंदबुद्धि, गूंगा और पागल जैसा प्रदर्शित किया, ताकि लोग उनसे संबंध न बढ़ाएँ। किंतु भीतर से उनका मन निरंतर भगवान के चरणों में स्थित था और वे अखंड रूप से भगवान का स्मरण, गुणगान और भक्ति करते रहे। इस प्रसंग का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची आध्यात्मिक उन्नति बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि भीतर की भगवान-केंद्रित चेतना से मापी जाती है। भक्ति कभी नष्ट नहीं होती; यदि किसी भक्त से भूल हो भी जाए, तो भगवान उसे शिक्षा देकर पुनः अपने मार्ग पर ले आते हैं। साथ ही, साधक के लिए सत्संग का महत्व और कुसंग से बचना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि संग ही मनुष्य की चेतना को ऊपर उठाता या नीचे गिराता है। जीवन की वास्तविक सफलता क...