Sri Gopal Bhatt Goswami
श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी की महिमा (भाग 1)
परम दयालु भगवान श्री गौरहरि दक्षिण भारत में गाँव-गाँव भ्रमण करते हुए जहाँ भी जाते, वहाँ प्रेमभक्ति का वितरण करते थे। उनके श्रीमुख से निकले हरिनाम के अमृत को सुनकर हजारों-लाखों स्त्री-पुरुष भौतिक संसार की दावाग्नि से राहत अनुभव करते थे। अनेक दुःखी, पतित और अभागे जीवों का जीवन पूर्णतः नवजीवन प्राप्त कर लेता और वे सदाचारी तथा आनंदित बन जाते। इस प्रकार समय, स्थान अथवा पात्र का विचार किए बिना प्रेम की वर्षा करते हुए श्री गौरसुन्दर कावेरी नदी के मध्य स्थित प्राचीन तीर्थ श्री रंगक्षेत्र पहुँचे।
श्री रंगक्षेत्र का मंदिर अत्यन्त विशाल था। उसके शिखर आकाश को भेदते प्रतीत होते थे। दिन-रात असंख्य यात्री भगवान रंगनाथ के दर्शन के लिए आते-जाते रहते थे। मंदिर के प्रांगण में हजारों ब्राह्मणों द्वारा वेदमंत्रों के उच्चारण की ध्वनि गूँजती रहती थी। ऐसे वैकुण्ठ तुल्य वातावरण में श्री गौरसुन्दर ने प्रवेश किया और अपने मधुर स्वर में कृष्णनाम का कीर्तन करने लगे, जो करोड़ों गंधर्वों के गीतों को भी पराजित कर देता था।
मंदिर में उपस्थित सभी लोग विस्मय और आश्चर्य से स्तब्ध हो गए। उनका अद्भुत सौन्दर्य ऐसा था कि पिघला हुआ सोना भी फीका प्रतीत होता था। उनके कमल सदृश नेत्रों से प्रेमाश्रु बह रहे थे। उनके प्रत्येक अंग में ऐसी अलौकिक शोभा थी कि कामदेव का मन भी मोहित हो जाए। ब्राह्मण सोचने लगे, “क्या यह कोई देवता हैं? क्या ऐसे लक्षण और भाव किसी मनुष्य में संभव हैं?”
हरिनाम की ध्वनि से मंदिर को पुनः गुंजायमान करते हुए जब वे भगवान रंगनाथ के समक्ष पहुँचे और वृक्ष के समान भूमि पर दण्डवत गिर पड़े, तो कुछ लोगों को ऐसा लगा मानो स्वर्ण का कोई पर्वत भूमि पर लुढ़क रहा हो।
श्री वेंकट भट्ट ने जब इस दिव्य पुरुष को देखा तो वे प्रेमानन्द से व्याकुल हो उठे। उनका हृदय भक्ति से भर गया और वे लोगों को हटाने लगे ताकि प्रभु निर्बाध रूप से कीर्तन और नृत्य कर सकें। जब संकीर्तन के पश्चात महाप्रभु को बाह्य चेतना प्राप्त हुई, तब वेंकट भट्ट ने उनके चरणों की धूलि ग्रहण की। महाप्रभु ने उनकी ओर देखकर “कृष्ण! कृष्ण!” कहा और उन्हें प्रेमपूर्वक आलिंगन किया।
वेंकट भट्ट ने महाप्रभु को अपने घर चलने का निमंत्रण दिया। घर पहुँचकर उन्होंने अत्यन्त श्रद्धा से प्रभु के चरण धोए और अपने समस्त परिवार सहित उस चरणामृत का पान किया। उनके घर में अपार आनन्द छा गया।
सन् 1511 ईस्वी में महाप्रभु श्री रंगक्षेत्र आए थे। वेंकट भट्ट के दो भाई थे—तिरुमल्ल भट्ट और प्रभोद्यानन्द सरस्वती। वे सभी रामानुज सम्प्रदाय से सम्बन्धित थे और प्रभोद्यानन्द सरस्वती उस सम्प्रदाय के त्रिदण्डी संन्यासी थे।
वेंकट भट्ट का एक पुत्र था, जिसका नाम गोपाल था। उस समय वह केवल एक बालक था। जब वह महाप्रभु को प्रणाम करने आया, तब महाप्रभु ने उसे उठाकर अत्यन्त स्नेह से अपनी गोद में बैठा लिया। भोजन के बाद महाप्रभु गोपाल को बुलाकर अपना महाप्रसाद देते थे। इस प्रकार उन्होंने उसे भविष्य के आचार्य पद के लिए तैयार किया।
चातुर्मास्य के चार महीने वेंकट भट्ट के घर में व्यतीत करने के बाद महाप्रभु ने दक्षिण यात्रा आगे बढ़ाने का निश्चय किया। उनके प्रस्थान की संभावना से वेंकट भट्ट का घर अश्रुओं की बाढ़ में डूब गया। गोपाल तो उनके चरणों में गिरकर मूर्छित हो गया। इसलिए महाप्रभु कुछ और दिन वहीं रुके ताकि उस बालक को सांत्वना दे सकें।
गोपाल भट्ट गोस्वामी की निष्कपट सेवा और भक्ति से प्रसन्न होकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें दीक्षा प्रदान की और आदेश दिया कि माता-पिता के अन्तर्धान के बाद वे वृन्दावन जाकर भजन करें और ग्रंथों की रचना करें। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि जब तक माता-पिता जीवित हैं, उनकी सेवा करें तथा सदैव कृष्ण की महिमा का कीर्तन करते रहें, और उसके बाद वृन्दावन आएँ।
शीघ्र ही गोपाल व्याकरण, काव्य और अलंकार शास्त्र में निपुण हो गए तथा वेदान्त का अध्ययन करने लगे। उनके चाचा प्रभोद्यानन्द सरस्वती विशेष रूप से उन्हें भक्ति-शास्त्रों का शिक्षण देने लगे।
गोपाल भट्ट सदैव महाप्रभु के चरणकमलों का चिन्तन करते रहते थे और सोचते थे कि उन्हें पुनः उनके दर्शन कब प्राप्त होंगे। किन्तु वे अपने वृद्ध माता-पिता को छोड़ नहीं सकते थे। अन्ततः जब उनके माता-पिता की जीवन-लीला समाप्त होने का समय आया, तब उन्होंने अपने पुत्र गोपाल को बुलाकर कहा कि वह वृन्दावन जाकर महाप्रभु के चरणों की शरण ग्रहण करे। स्वयं भी वे महाप्रभु के चरणों का स्मरण करते हुए उनकी नित्य लीलाओं में प्रवेश कर गए।
(शेष भाग अगली कड़ी में...)
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