Jagannath

By Amogh lila Prabhu
हरे कृष्णा! बहुत ही विशेष उत्सव आने वाला है, जिसका नाम है जगन्नाथ रथयात्रा। जगन्नाथ जी को लेकर बहुत सारी बातें, तत्व और लीलाएं हैं। नो डाउट, उनकी रथयात्रा अपने आप में एक पूरा तत्व है, जगन्नाथ जी का रूप और उनकी लीलाएं भी अपने आप में तत्व हैं, और जगन्नाथ जी के भक्तों की लीलाएं उनका अपना बड़ा सुंदर तत्व है। हमने सोचा कि क्या हम ऐसा करें जिससे जगन्नाथ जी को बहुत खुशी मिले? जगन्नाथ जी बहुत प्रसन्न होंगे अगर हम उनके भक्तों का गुणगान करेंगे। इसलिए आज का संडे लव फेस्ट हम जगन्नाथ जी के उन भक्तों को डेडिकेट करते हैं जिनके साथ जगन्नाथ जी बड़े सुंदर आदान-प्रदान करते हैं।

हम शुरुआत करेंगे सालबेग से। सालबेग एक मुस्लिम थे, उनके पिता का नाम लाल बेग था, जो बहुत क्रूर राजा थे। एक समय जगन्नाथ पुरी के पास से गुजरते हुए उन्होंने एक बहुत सुंदर ब्राह्मणी को देखा, उसे अपने साथ ले गए और विवाह किया। इसके परिणाम स्वरूप ब्राह्मणी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जो मुस्लिम थे लेकिन एक बहुत ही कुशल योद्धा थे। एक बार युद्ध में उन्हें बहुत घाव हुए जो ठीक ही नहीं हो रहे थे। अपनी मां के कहने पर, उन्होंने जगन्नाथ जी की शरण ली। वह हरे कृष्ण महामंत्र का जप करते और जगन्नाथ जी के रूप पर ध्यान लगाते। अंततः 12वें दिन उनके शरीर के सारे घाव भर गए। इससे उनका प्रगाढ़ विश्वास हो गया कि वाकई जगन्नाथ जी कार्य करते हैं।

अगली कथा बलराम दास की है, जो जगन्नाथ जी से बहुत प्रेम करते थे, लेकिन उनमें काम वासना की कमी थी। एक बार रथ यात्रा के दिन, जब वह एक प्रोस्टिट्यूट के साथ थे, तब उन्हें नगाड़ों की आवाज सुनाई दी कि जगन्नाथ जी रथ पर आरूढ़ हो रहे हैं। उन्हें बहुत आत्मग्लानि हुई और वह दौड़कर जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए पहुंचे। पंडों ने उन्हें वहां से उतार दिया क्योंकि उनका चरित्र ठीक नहीं था। दुखी होकर उन्होंने समुद्र तट पर रेत का रथ बनाया। आश्चर्यजनक रूप से, जगन्नाथ जी अपना मुख्य रथ छोड़कर उस रेत के रथ में आ गए। जब मुख्य रथ नहीं हिला, तब राजा को बलराम दास के पास आना पड़ा और उन्हें वापस रथ पर बिठाया गया।

फिर रघु दास की कथा है, जिन्हें जगन्नाथ जी में साक्षात श्री रामचंद्र के दर्शन होते थे। वह जगन्नाथ जी के लिए माला बनाते थे। एक बार पंडों ने उनकी माला अस्वीकार कर दी, तो जगन्नाथ जी ने भी कोई श्रृंगार स्वीकार नहीं किया, जब तक कि रघु की माला नहीं पहनाई गई। रघु बीमार पड़े तो जगन्नाथ जी स्वयं 'गोपाल' के रूप में उनकी सेवा करने आए। उन्होंने राजा के गार्डन में जगन्नाथ जी के साथ मिलकर कटहल चोरी करने की लीला भी की थी।

एक और भक्त थे राजा जयसिंह देव और उनकी पत्नी चंद्रावती, जिनकी पुत्री विष्णु प्रिया साक्षात लक्ष्मी के समान थीं। उन्होंने जगन्नाथ जी को अपना हृदय समर्पित करने के लिए एक पत्र लिखा था, जिसे जगन्नाथ जी ने स्वयं स्वीकार किया। इसी तरह, प्रभु दास की कुटिया में जगन्नाथ जी और बलभद्र जी स्वयं पान खाने जाते थे। प्रभु दास को यह पता नहीं था कि वे कौन हैं, लेकिन वे रोज उन्हें पान खिलाते थे। बाद में जब राजा को पता चला, तो उन्होंने प्रभु दास को यह सेवा स्थायी रूप से दे दी।

लंडी माता की कथा में, वह जगन्नाथ जी को अपना पुत्र मानती थीं और उनके स्वास्थ्य के लिए नीम के पत्तों का पेस्ट लेकर आती थीं। जगन्नाथ जी ने स्वयं राजा के सपने में आकर कहा कि उन्हें लंडी माता का लाया हुआ नीम का पेस्ट चाहिए।

कर्मा बाई (करारा देवी) की कथा है, जो रोज भगवान के लिए खिचड़ी बनाती थीं। एक बार देरी होने पर जगन्नाथ जी बिना हाथ-मुंह धोए, हाथों में खिचड़ी लगी हुई अवस्था में ही भक्तों को दर्शन देने आ गए। तब भक्तों को पता चला कि जगन्नाथ जी उनके भोग से पहले कर्मा बाई की खिचड़ी पाते हैं। हैदराबाद के जगत सेठ ने जगन्नाथ जी को एक लाख रुपये का भोग लगाने का घमंड किया, जिसे जगन्नाथ जी ने गजमोती के पान की सेवा बताकर चूर-चूर कर दिया।

अंत में, आदि शंकराचार्य जी के शिष्य पद्म पाद की कथा है, जिन्हें जगन्नाथ जी की तांत्रिक पूजा विधि को लेकर संदेह था। तब उन्होंने ध्यान में देखा कि जगन्नाथ जी साक्षात कृष्ण हैं और उन्होंने अपनी श्रद्धा के साथ प्रसाद ग्रहण किया। इस प्रकार, जगन्नाथ जी अपने भक्तों के साथ दिव्य आदान-प्रदान करते हैं। जय जगन्नाथ!हरे कृष्णा। आज हम जगन्नाथ स्वामी की और लीलाओं पर चर्चा कर रहे हैं। पिछली बार हमने सालबेग, भक्त बलराम, रघुदास जी, विष्णुप्रिया, लांडी माता, कर्माबाई, जगत सेठ और पद्मपाद जैसे भक्तों की कथाएं सुनी थीं। आज हम बंधु मोहंती की कथा से शुरू करते हैं।

बंधु मोहंती बहुत ही दरिद्र थे, लेकिन वे पूरी श्रद्धा से भक्ति और अपने परिवार की सेवा करते थे। उनकी पत्नी के आग्रह पर, वे अपने परिवार के साथ जगन्नाथ पुरी गए। पुरी पहुँचने पर, वे मुख्य द्वार के बजाय दक्षिणी द्वार (पेजा नाला) पर रुके, जहाँ से जगन्नाथ जी के महाप्रसाद का 'माड़' (चावल का पानी) निकलता था। भूख से व्याकुल होने पर, जगन्नाथ जी ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उन्हें अपनी सोने की थाली में महाप्रसाद खिलाया। थाली वापस करने के लिए प्रतीक्षा करते-करते वे सो गए। सुबह होने पर, पुजारियों ने उन्हें थाली के साथ पकड़ा और चोर समझकर जेल में डाल दिया। बाद में जगन्नाथ जी की कृपा से उन्हें मुक्ति मिली।

इसके बाद दासिया बावरी की कथा आती है, जो निम्न कुल के थे और मंदिर के अंदर नहीं जा सकते थे। लेकिन उनका भाव इतना ऊँचा था कि भगवान जगन्नाथ स्वयं चक्र के माध्यम से उनके द्वारा अर्पण किए गए प्रसाद (जैसे नारियल और आम) को स्वीकार करते थे। भगवान ने उन्हें वचन दिया था कि जब भी वे मंदिर के ऊपर चक्र को देखेंगे, उन्हें साक्षात दर्शन होंगे।

राजा पुरुषोत्तम देव की कथा में, कांची के राजा ने रथ यात्रा के दिन राजा को झाड़ू मारते देख रिश्ता तोड़ दिया था। पुरुषोत्तम देव ने आक्रमण किया और भगवान जगन्नाथ व बलराम ने स्वयं सैनिकों के रूप में उनकी ओर से युद्ध लड़ा और जीत हासिल की। इसी दौरान 'मणिका' नामक महिला को भगवान ने कृपा प्रदान की थी।

रामानुजाचार्य जी जब पुरी आए, तो उन्होंने पूजा पद्धति पर प्रश्न उठाए। जगन्नाथ जी ने स्वप्न में उन्हें समझाया कि यहाँ की अनूठी सेवा उन्हें प्रिय है। अर्जुन मिश्र की कथा में, उनकी पत्नी को संदेह था कि 'अनन्य भाव' से चिंतन करने वाले का भरण-पोषण भगवान करते हैं। तब स्वयं कृष्ण-बलराम ने उनके घर आकर प्रसाद पहुँचाया और अपनी जीभ पर घाव (पत्नी द्वारा गीता पर मारे गए निशान) दिखाकर उन्हें अपनी महिमा का दर्शन कराया।

कैप्टन बीटल (फ्रांस) की कथा में, समुद्र के तूफान और शार्क से जगन्नाथ जी के भक्तों की रक्षा की गई। तालीच महापात्रा की कथा में, राजा को गलतफहमी हुई कि मंदिर में बाल कैसे आए, तब भगवान ने स्वयं चमत्कारिक रूप से अपने बाल प्रकट कर भक्त की लाज बचाई। राजा कुलशेखर की कथा में, एक छोटी सी गलती के पश्चाताप हेतु राजा ने जलती हुई कॉपर प्लेट पर दंडवत करने का निर्णय लिया, जिसे जगन्नाथ जी ने फूल की पंखुड़ियों में बदलकर शांत किया।

लक्ष्मी मैया और चंडालों की कथा में, जब लक्ष्मी जी ने चंडालों के घर कृपा की, तो भगवान ने उन्हें मंदिर से बाहर कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि स्वयं कृष्ण-बलराम को भूखा रहना पड़ा और सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया। अंत में, भगवान ने स्वीकार किया कि लक्ष्मी जी की शक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं है।

परमेष्ठी दर्जी की कथा में, उन्होंने जगन्नाथ जी के लिए रेशमी कपड़े से बने सिराहने की सेवा की, जिसे भगवान ने स्वीकार किया। अंत में, उड़ियन आचार्य की कथा में, जगन्नाथ जी ने दर्शन न देकर उन्हें अपनी शक्ति का बोध कराया कि उनके दर्शन मात्र से मुक्ति मिलती है।

अंत में, प्रभुपाद जी की लीला का स्मरण करते हुए, यह स्पष्ट है कि जगन्नाथ जी वास्तव में 'जगत के नाथ' हैं, जो विभिन्न रंगों, संस्कृतियों और विचारधाराओं के लोगों को अपनी शरण में लेते हैं। जगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा मैया की जय!हरे कृष्णा। आज सहारनपुर में आकर और भक्तों का जगन्नाथ जी के प्रति इतना उत्साह देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। मुझे पता चला कि सहारनपुर की रथयात्रा भारत की सबसे अच्छी रथयात्राओं में से एक है। भगवान जगन्नाथ 'दारु ब्रह्म' हैं, जिसका अर्थ है कि वे लकड़ी के स्वरूप में प्रकट होकर भक्तों के कर्मों को काटते हैं और उन्हें भक्ति प्रदान करते हैं।

जगन्नाथ जी की लीलाओं के बारे में बताते हुए, मैं एक भक्त गणपति भट्ट की कथा सुनाता हूँ जो कर्नाटक से जगन्नाथ पुरी आए थे। उन्हें यह संशय था कि भगवान के दर्शन मात्र से मुक्ति मिल जानी चाहिए, तो लोग वापस क्यों जा रहे हैं? भगवान ने उनकी इच्छा के अनुरूप उन्हें दर्शन दिए और यह समझाया कि वे सबकी इच्छाएँ पूरी करते हैं। ऐसे ही, पद्मा नाम की एक भक्त थी जो गीत गोविंद गाती थी और भगवान स्वयं उसे सुनने के लिए खिंचे चले आते थे।

बाबा रघुवीर की कहानी भी अद्भुत है, जो सिंह द्वार के पास रहकर जगन्नाथ जी की सेवा करते थे। उन्होंने अपनी भक्ति से भगवान की 'वैष्णव अग्नि' की रक्षा की। इसी प्रकार, एक राजा ने जब गलती से भगवान का प्रसाद अनादरपूर्वक रखा, तो उन्होंने आत्मग्लानि में अपना हाथ काट लिया। उनकी इस अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और जिस स्थान पर वह हाथ बोया गया, वहाँ से दिव्य सुगंधित फूल खिलने लगे, जिन्हें आज भी भगवान के श्रृंगार में उपयोग किया जाता है।

इंद्र स्वामी नाम के एक राजा को यह संदेह था कि क्या भगवान रथयात्रा के दौरान मंदिर छोड़ते हैं। जब उन्होंने मंदिर में ध्यान लगाया, तो उन्हें भैरव जी के दर्शन हुए जिन्होंने बताया कि भगवान भक्तों के साथ लीला करने के लिए बाहर जाते हैं। तांत्रिकों और अन्य संप्रदायों के साथ भी भगवान की लीलाएँ जुड़ी हैं, जो यह दर्शाती हैं कि जगन्नाथ जी केवल वैष्णवों के ही नहीं, बल्कि सबके हैं—चाहे वे बुद्धिस्ट हों या कोई अन्य।

राजा रामचंद्र देव की कहानी भी बहुत मार्मिक है, जिन्होंने मंदिर की रक्षा के लिए बहुत त्याग किया। उनके लिए भगवान ने 'पतित पावन जगन्नाथ' के रूप में बाहर प्रकट होकर दर्शन दिए। चैतन्य महाप्रभु के समय में राजा प्रताप रुद्र ने भी भगवान के प्रति अपनी भक्ति को सिद्ध किया और भगवान की हर वस्तु को दिव्य माना।

अंत में, मणि दास की कथा हमें सिखाती है कि भगवान के नाम और कीर्तन में कितना उत्साह होना चाहिए। भगवान ने उनके लिए जगमोहन मंडप खोल दिया ताकि वे बिना किसी बाधा के नृत्य और कीर्तन कर सकें। जगन्नाथ जी वास्तव में अपने भक्तों के प्रेम के भूखे हैं और वे प्रेम का आदान-प्रदान करने वाले भगवान हैं।हरे कृष्णा, जगन्नाथ स्वामी की जय। हम जगन्नाथ जी की लीलाओं की श्रृंखला को आगे बढ़ा रहे हैं। किस प्रकार से जगन्नाथ जी अपने भक्तों के साथ बहुत सुंदर आदान-प्रदान करते हैं, उसी कड़ी में उत्तर भारत के एक भक्त नीलांबर दास की कथा है। उन्होंने सोचा कि गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियां निभा लीं, अब जगन्नाथपुरी चलकर जगन्नाथ जी की सेवा करनी चाहिए। जब वे वहां जा रहे थे, तो रास्ते में गंगा नदी को पार करना था। वहां एक नाविक ने उन्हें देखा और उनके पैसे लूटने के उद्देश्य से उन्हें नदी के बीच में ले गया जहां तूफान था। जब नाविक ने उन्हें मारने का प्रयास किया, तो नीलांबर दास ने जगन्नाथ जी से रक्षा की प्रार्थना की। तब जगन्नाथ जी स्वयं एक क्षत्रिय सैनिक के रूप में वहां प्रकट हुए, नाव में छेद कर दिया और नाविक को किनारे तक आने पर मजबूर किया। इस तरह भगवान ने अपने भक्त की रक्षा की।

इसी तरह, पिपली स्थान पर रहने वाले एक मछुआरे रघु बहेरा की कथा है। साधु संग और कीर्तन के कारण उनका हृदय शुद्ध हो गया था। एक बार उन्होंने एक मछली को 'नारायण मेरी रक्षा करें' कहते सुना, जिससे वे आश्चर्यचकित रह गए और भगवान के दर्शन के लिए दृढ़ हो गए। तीन दिन के अनशन और प्रार्थना के बाद, स्वयं जगन्नाथ जी ने उन्हें चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए। बाद में, जब मंदिर के पुजारी जगन्नाथ जी को भोग नहीं चढ़ा पा रहे थे, तो भगवान ने राजा को स्वप्न में बताया कि वे रघु के हाथ का भोग स्वीकार कर रहे हैं।

शोण महापात्र की कथा भी भक्ति के भाव को दर्शाती है। वे बिना किसी मंत्र के केवल प्रेम से भोग लगाते थे, जिसे भगवान स्वीकार करते थे। इसी प्रकार, ताकी खान नामक एक मुस्लिम सूबेदार ने मंदिर का खजाना लूटने का प्रयास किया, लेकिन भगवान की लीला से उसे कोढ़ हो गया और बाद में उसने पश्चाताप किया।

हनुमान जी और सुदर्शन चक्र की लीला में भी अहंकार का नाश देखने को मिलता है, जहाँ सुदर्शन के अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान ने हनुमान जी की सहायता ली थी। अंत में, यह समझाया गया है कि भगवान की सृष्टि में सुख-दुःख हमारे कर्मों का फल है, जबकि भक्तों के साथ भगवान की जो लीलाएं हैं, वे उनकी वास्तविक आध्यात्मिक लीलाएं हैं।

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