BG 7

All Glories To Srila Prabhupada 🙏
अध्याय सात का प्रारम्भ इस घोषणा से होता है कि अब भगवान परम सत्य के पूर्ण ज्ञान को प्रकट करेंगे। पहले अध्यायों में आत्मा, कर्म, ध्यान और योग की आधारभूमि दी गई थी, पर अब भगवान बताते हैं कि इन सबका अंतिम लक्ष्य उन्हें जानना है। केवल दार्शनिक विचार, निराकार चिंतन या साधारण योगाभ्यास से परम सत्य का संपूर्ण ज्ञान नहीं मिलता। जब मन भगवान में आसक्त होकर भक्ति-योग में स्थिर होता है, तब मनुष्य बिना संशय के उन्हें पूर्ण रूप से जान सकता है। यही इस अध्याय का मुख्य द्वार है—ईश्वर को समझना तर्क से नहीं, समर्पित चेतना से संभव है।

भगवान कहते हैं कि वे ऐसा ज्ञान देंगे जिसके बाद जानने योग्य कुछ शेष नहीं रहेगा। इसका अर्थ है कि यदि कोई मूल कारण को जान ले, तो उसके प्रभाव स्वतः समझ में आ जाते हैं। जैसे जड़ को सींचने से पूरा वृक्ष पुष्ट हो जाता है, वैसे ही यदि मनुष्य सभी कारणों के कारण को जान ले, तो जगत, आत्मा, प्रकृति, कर्म और जीवन का रहस्य स्पष्ट हो जाता है। इसलिए आध्यात्मिक ज्ञान केवल जानकारी नहीं, मूल सत्य की पहचान है।

फिर भगवान बताते हैं कि हजारों मनुष्यों में कोई एक पूर्णता की खोज करता है, और उनमें भी कोई विरला ही उन्हें तत्त्वतः जानता है। अधिकांश लोग जीवन को केवल खाने, सोने, रक्षा और भोग तक सीमित रखते हैं। कुछ लोग आत्मा तक पहुँचते हैं, कुछ ब्रह्म तक, कुछ परमात्मा तक; पर भगवान के व्यक्तित्व, उनके प्रेम, उनकी शक्तियों और उनके साथ जीव के संबंध को जानना अत्यंत दुर्लभ है। इसका कारण यह है कि भगवान केवल बौद्धिक अध्ययन से नहीं, भक्ति से प्रकट होते हैं।

इसके बाद भगवान अपनी दो शक्तियों का वर्णन करते हैं। पहली है उनकी पृथक भौतिक शक्ति—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार। यही सम्पूर्ण भौतिक जगत का आधार है। शरीर स्थूल तत्वों से बना है, और सूक्ष्म जीवन मन, बुद्धि और अहंकार से संचालित होता है। आधुनिक ज्ञान अक्सर केवल बाहरी पदार्थ तक सीमित रहता है, पर भगवान बताते हैं कि मन और बुद्धि भी भौतिक ऊर्जा के ही सूक्ष्म रूप हैं। इसलिए केवल बाहरी विज्ञान जीवन का पूर्ण उत्तर नहीं दे सकता।

फिर भगवान कहते हैं कि इनसे भिन्न उनकी एक श्रेष्ठ शक्ति भी है—जीवात्माएँ। यही चेतन सत्ता है जो पदार्थ का उपयोग करती है, शरीर को चलाती है, संसार में कर्म करती है और अनुभव करती है। पदार्थ स्वयं जड़ है; चेतना के स्पर्श से ही वह सक्रिय दिखता है। जीव भगवान की शक्ति है, पर भगवान के समान नहीं है। गुण में समानता है—चेतना, अस्तित्व, ज्ञान की क्षमता—पर मात्रा में अंतर है। भगवान अनंत नियंत्रक हैं, जीव सीमित नियंत्रित। जब जीव यह भूल जाता है, तब वह अहंकार में बंध जाता है; जब यह पहचान लेता है, तब मुक्त होकर भगवान की सेवा में स्थित होता है।

इन प्रारम्भिक श्लोकों का निष्कर्ष यह है कि जीवन का रहस्य केवल “मैं कौन हूँ” जानने में नहीं, बल्कि “मैं किसका हूँ” जानने में है। मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ—यह प्रारम्भ है। मैं भगवान की शक्ति हूँ, उनका अंश हूँ, और उनसे जुड़कर ही पूर्ण हो सकता हूँ—यह पूर्ण ज्ञान है। यही परम सत्य का विज्ञान है, और यही अध्याय सात का हृदय है।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को समस्त अस्तित्व का मूल कारण घोषित करते हैं। जो कुछ भी भौतिक है और जो कुछ भी आध्यात्मिक है, सब उन्हीं की शक्तियों से प्रकट होता है। संसार में पदार्थ और चेतना—ये दोनों ही स्वतंत्र नहीं हैं; दोनों भगवान की ऊर्जाएँ हैं। जीवात्मा चेतन शक्ति है और प्रकृति जड़ शक्ति है, पर दोनों का स्रोत एक ही परम सत्य है। इसलिए भगवान केवल सृष्टि के निर्माता नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता और अंत में संहारकर्ता भी हैं।

भगवान आगे कहते हैं कि उनसे बढ़कर कोई सत्य नहीं है। सब कुछ उन्हीं पर टिका है, जैसे मोती धागे में पिरोए रहते हैं। मोती दिखाई देते हैं, पर धागा प्रायः छिपा रहता है; फिर भी वही सबको जोड़कर रखता है। उसी प्रकार यह जगत अनेक वस्तुओं, जीवों और घटनाओं से भरा हुआ दिखाई देता है, पर इनके पीछे एक अदृश्य दिव्य आधार है—भगवान की सत्ता। यदि वह आधार हट जाए, तो अस्तित्व बिखर जाए। यह शिक्षा बताती है कि भगवान केवल दूर बैठा हुआ देवता नहीं, बल्कि हर व्यवस्था का छिपा हुआ केंद्र हैं।

फिर भगवान बताते हैं कि उन्हें संसार की वस्तुओं के माध्यम से कैसे अनुभव किया जा सकता है। वे जल का स्वाद हैं, सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश हैं, वैदिक मंत्रों का ॐ हैं, आकाश की ध्वनि हैं और मनुष्य का सामर्थ्य हैं। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर केवल मंदिर में सीमित नहीं हैं; वे जीवन के प्रत्येक अनुभव में संकेत देते हैं। जब प्यासा मनुष्य जल पीता है, जब सूर्योदय देखता है, जब आकाश की ध्वनि सुनता है, जब शक्ति या प्रेरणा अनुभव करता है—तब वह भगवान की उपस्थिति को स्मरण कर सकता है। संसार भगवान से दूर नहीं, बल्कि भगवान की स्मृति का माध्यम बन सकता है।

भगवान आगे कहते हैं कि वे पृथ्वी की मूल सुगंध हैं, अग्नि की ऊष्मा हैं, सभी प्राणियों का जीवन हैं और तपस्वियों की तपस्या हैं। इसका गहरा अर्थ यह है कि जो भी वस्तु अपने शुद्धतम स्वरूप में है, वही भगवान की झलक है। जीवन की चेतना, अग्नि की ऊर्जा, धरती की सुगंध, तपस्या की शक्ति—ये सब दिव्य स्रोत से आती हैं। इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि वाला व्यक्ति पदार्थ को तुच्छ नहीं मानता, बल्कि उसमें ईश्वर की शक्ति को पहचानता है।

अंत में भगवान कहते हैं कि वे समस्त प्राणियों का मूल बीज हैं, बुद्धिमानों की बुद्धि हैं और शक्तिशालियों का बल हैं। हर प्रतिभा, हर क्षमता, हर जीवित शक्ति, हर आरंभ—सबका मूल भगवान हैं। इससे मनुष्य का अहंकार टूटता है, क्योंकि जो कुछ मेरे पास है, वह मेरा स्वनिर्मित नहीं, ईश्वरप्रदत्त है। और इससे भक्ति जागती है, क्योंकि जो कुछ सुंदर, शक्तिशाली, बुद्धिमान और जीवंत है, वह उसी परम स्रोत की चमक है। यही अध्याय सात का संदेश है—भगवान को केवल दर्शन में नहीं, जीवन के हर अनुभव में पहचानो।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण जीवन की शक्ति, प्रकृति के रहस्य, बंधन के कारण और मुक्ति के उपाय को अत्यंत स्पष्ट रूप से समझाते हैं। वे कहते हैं कि वे बलवानों की शक्ति हैं, पर ऐसी शक्ति जो वासना, अहंकार और स्वार्थ से रहित हो। वास्तविक बल दूसरों को दबाने के लिए नहीं, उनकी रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए है। इसी प्रकार वे उस यौन जीवन में भी उपस्थित हैं जो धर्म के अनुसार, जिम्मेदारी और पवित्रता के साथ हो। इसका अर्थ है कि भगवान शक्ति और सृजन के शुद्ध उपयोग में प्रकट होते हैं, दुरुपयोग में नहीं।

फिर भगवान बताते हैं कि संसार की सभी अवस्थाएँ—सत्त्व, रजस और तमस—उनकी शक्ति से उत्पन्न होती हैं, पर वे स्वयं इन गुणों से परे हैं। जैसे सूर्य प्रकाश देता है पर अंधकार से प्रभावित नहीं होता, वैसे ही भगवान प्रकृति के स्रोत हैं पर प्रकृति के बंधनों में नहीं आते। सत्त्व शांति और ज्ञान देता है, रजस इच्छा और अशांति देता है, तमस आलस्य और अज्ञान देता है। जीव इन गुणों से प्रभावित होकर अपना स्वभाव बनाता है, पर भगवान इन सबसे स्वतंत्र और सर्वोच्च हैं।

इन्हीं तीन गुणों से मोहित होकर संसार भगवान को नहीं पहचान पाता। मनुष्य स्वयं को शरीर, जाति, राष्ट्र, पद, विचारधारा या अस्थायी पहचान से जोड़ लेता है और मूल आत्मिक सत्य को भूल जाता है। यही माया है—अस्थायी को स्थायी मानना और स्रोत को भूल जाना। कोई सत्त्व में रहकर भी केवल ज्ञान में अटक सकता है, रजस में रहकर भोग और महत्वाकांक्षा में उलझ सकता है, तमस में रहकर अज्ञान में गिर सकता है। इसलिए केवल गुणों का सुधार पर्याप्त नहीं; गुणातीत होना आवश्यक है।

भगवान कहते हैं कि उनकी यह दैवी माया बहुत कठिन है, पर जो उनकी शरण में आते हैं वे इसे पार कर लेते हैं। इसका गहरा अर्थ यह है कि बंधन से बंधा हुआ व्यक्ति स्वयं को पूर्णतः मुक्त नहीं कर सकता। जैसे डूबता व्यक्ति स्वयं को बाल पकड़कर बाहर नहीं निकाल सकता, वैसे ही जीव को दिव्य सहायता चाहिए। शरणागति कमजोरी नहीं, बल्कि वास्तविक बुद्धिमत्ता है—यह स्वीकार करना कि मैं सीमित हूँ और मुझे परम स्रोत की कृपा चाहिए। भगवान के नाम, भक्ति, सत्संग और गुरु-कृपा से यह माया धीरे-धीरे छूटती है।

अंत में भगवान बताते हैं कि कुछ लोग उनके सामने समर्पण नहीं करते—घोर मूर्ख, मानव जीवन का दुरुपयोग करने वाले, भ्रमित ज्ञान वाले और नास्तिक वृत्ति वाले। इसका अर्थ केवल किसी विशेष वर्ग की निंदा नहीं, बल्कि चेतावनी है कि बुद्धि, पद, शिक्षा या शक्ति होने पर भी यदि मनुष्य अहंकार में भगवान को अस्वीकार करे, तो उसका ज्ञान अधूरा रह जाता है। वास्तविक ज्ञान वह है जो विनम्रता, समर्पण और सत्य ग्रहण करने की क्षमता दे।

इन श्लोकों का निष्कर्ष यह है कि संसार का संघर्ष बाहरी नहीं, आंतरिक है। गुण बाँधते हैं, माया भ्रमित करती है, अहंकार दूर ले जाता है। पर जो व्यक्ति भगवान की शरण लेता है, धर्मयुक्त जीवन जीता है, शक्ति का शुद्ध उपयोग करता है और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है, वह धीरे-धीरे प्रकृति के बंधन से ऊपर उठकर दिव्य स्वतंत्रता को प्राप्त करता है।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि सभी लोग एक ही स्तर की भावना से उनके पास नहीं आते, फिर भी जो भी उनकी ओर मुड़ता है, वह शुभ मार्ग पर है। चार प्रकार के पुण्यात्मा लोग भगवान की भक्ति की शुरुआत करते हैं—दुखी, धन चाहने वाले, जिज्ञासु और ज्ञान की खोज करने वाले। कोई संकट में होकर भगवान को पुकारता है, कोई सांसारिक आवश्यकता से, कोई सत्य जानने की जिज्ञासा से, और कोई आत्मिक ज्ञान की खोज में। भगवान इन सबको स्वीकार करते हैं, क्योंकि संसार से हटकर उनका मन भगवान की ओर मुड़ा है। यह दर्शाता है कि ईश्वर के द्वार सबके लिए खुले हैं, चाहे आरंभिक प्रेरणा शुद्ध हो या मिश्रित।

फिर भी भगवान कहते हैं कि इनमें ज्ञानी भक्त श्रेष्ठ है—जो उन्हें समझकर, प्रेमपूर्वक, निरंतर उनकी सेवा करता है। उसका उद्देश्य केवल लाभ, समस्या का समाधान या जिज्ञासा नहीं, बल्कि भगवान स्वयं होते हैं। ऐसा भक्त भगवान को प्रिय है और भगवान भी उसे अत्यंत प्रिय मानते हैं। यहाँ भक्ति का सर्वोच्च रूप दिखाया गया है—जहाँ संबंध लेन-देन का नहीं, प्रेम और समर्पण का होता है।

भगवान यह भी बताते हैं कि जो भक्त किसी कारण से उनके पास आते हैं, वे भी उदार आत्माएँ हैं। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की ओर एक कदम बढ़ाना भी महान है। लेकिन जो भक्त पूर्ण ज्ञान में स्थित होकर भगवान को सर्वस्व मानता है, वह विशेष है क्योंकि उसने जीवन का अंतिम निष्कर्ष पा लिया है। वह जानता है कि संसार के पीछे एक ही परम सत्य है और वही श्रीकृष्ण हैं।

अनेक जन्मों के बाद ऐसा ज्ञानी यह समझकर शरणागत होता है कि वासुदेव ही सब कुछ हैं—सभी कारणों के कारण, सभी शक्तियों के स्रोत, सबके आश्रय। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है। इसका अर्थ है कि सच्चा ज्ञान केवल दार्शनिक जानकारी नहीं, बल्कि अंततः समर्पण तक पहुँचाता है। यदि ज्ञान से विनम्रता, प्रेम और शरणागति न आए, तो वह अभी अधूरा है।

इसके विपरीत, जिनकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं से ढकी होती है, वे अलग-अलग देवताओं की पूजा करते हैं। वे तात्कालिक लाभ, धन, स्वास्थ्य, सफलता या विशेष इच्छाओं की पूर्ति चाहते हैं। भगवान यह नहीं कहते कि यह मार्ग पूरी तरह व्यर्थ है, पर यह सीमित है, क्योंकि इसका केंद्र इच्छा है, परम सत्य नहीं। इच्छा-प्रधान बुद्धि व्यक्ति को छोटे लक्ष्यों में बाँध देती है, जबकि भगवान की शरण व्यक्ति को अंतिम लक्ष्य तक ले जाती है।

इन श्लोकों का गहरा संदेश यह है कि मनुष्य चाहे किसी भी कारण से भगवान के पास आए, यह शुभ आरंभ है। पर आध्यात्मिक यात्रा की पूर्णता तब है जब मनुष्य भगवान को साधन नहीं, साध्य माने; उनसे वस्तुएँ नहीं, उन्हें स्वयं चाहे; लाभ नहीं, प्रेम चाहे; और अंततः यह अनुभव करे कि वास्तव में सब कुछ वही हैं और उन्हीं की शरण में जीवन की पूर्णता है।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण सभी जीवों के हृदय में परमात्मा रूप से स्थित होकर उनकी इच्छाओं, प्रवृत्तियों और मार्गों को जानते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी विशेष भौतिक इच्छा से प्रेरित होकर किसी देवता की पूजा करना चाहता है, तो भगवान उसकी उसी दिशा में श्रद्धा को स्थिर कर देते हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान जीव की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं। वे किसी पर बलपूर्वक अपना मार्ग नहीं थोपते, बल्कि उसे उसके चुनाव के अनुसार अवसर देते हैं, ताकि अनुभव के माध्यम से वह अंततः सत्य तक पहुँचे।

फिर भगवान स्पष्ट करते हैं कि देवताओं द्वारा मिलने वाले वरदान भी वास्तव में उन्हीं की व्यवस्था से मिलते हैं। देवता स्वतंत्र सर्वशक्तिमान सत्ता नहीं हैं; वे भगवान की विश्व-व्यवस्था में नियोजित अधिकारी हैं। इसलिए जो व्यक्ति देवताओं से कुछ प्राप्त करता है, वह भी अंततः भगवान की ही शक्ति से प्राप्त करता है। परंतु अज्ञानवश लोग मध्यस्थ को अंतिम मान लेते हैं और मूल स्रोत को नहीं पहचानते।

भगवान यह भी बताते हैं कि देवताओं की पूजा से मिलने वाले फल सीमित और नश्वर होते हैं। धन, पद, स्वास्थ्य, सुख या स्वर्ग जैसे लाभ समयबद्ध हैं। वे मिलते हैं, कुछ समय टिकते हैं, फिर समाप्त हो जाते हैं। देवताओं के उपासक उनके लोकों तक पहुँच सकते हैं, परंतु वे लोक भी भौतिक जगत के अंतर्गत हैं। इसके विपरीत, जो भगवान की शुद्ध भक्ति करते हैं, वे भगवान के शाश्वत धाम को प्राप्त करते हैं, जहाँ पुनः पतन नहीं होता। यहाँ यह अंतर दिखाया गया है कि इच्छा-प्रधान उपासना अस्थायी फल देती है, जबकि प्रेम-प्रधान भक्ति शाश्वत फल देती है।

इसके बाद भगवान उन लोगों की भूल बताते हैं जो उन्हें केवल एक सामान्य मनुष्य, या पहले निराकार होकर बाद में रूप धारण करने वाला मानते हैं। वे कहते हैं कि उनका दिव्य स्वरूप शाश्वत, अविनाशी और सर्वोच्च है। वे किसी भौतिक शरीर को धारण करके भगवान नहीं बने, बल्कि वे सदा से परम पुरुष हैं। उनका रूप, नाम, गुण और लीलाएँ सब दिव्य हैं। जो लोग सीमित बुद्धि से उन्हें सांसारिक व्यक्ति मानते हैं, वे उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ पाते।

भगवान यह भी कहते हैं कि वे मूर्ख और अविवेकी लोगों के सामने प्रकट नहीं होते, क्योंकि वे अपनी योगमाया शक्ति से आवृत रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि भगवान छिपे हुए हैं, बल्कि यह कि अशुद्ध दृष्टि उन्हें पहचान नहीं सकती। जैसे सूर्य सामने हो, पर बंद आँख वाला उसे न देख सके, वैसे ही अहंकार, कामना और अविश्वास से ढका मन भगवान को नहीं पहचान पाता। भगवान को तर्क, कल्पना या बाहरी विद्वता से नहीं जाना जा सकता; वे स्वयं को भक्तिभाव से समर्पित हृदय में प्रकट करते हैं।

इन श्लोकों का गहरा संदेश यह है कि संसार में हर खोज अंततः भगवान तक ही पहुँचती है, क्योंकि वही सबके मूल कारण हैं। परंतु जो व्यक्ति छोटी इच्छाओं में उलझा रहता है, वह छोटे फलों में रुक जाता है। जो व्यक्ति भगवान को ही अंतिम लक्ष्य मानकर उनकी शरण लेता है, वही शाश्वत सत्य को प्राप्त करता है। इसलिए मनुष्य को अस्थायी लाभों से ऊपर उठकर मूल स्रोत, परम पुरुष श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करनी चाहिए, क्योंकि वही अजन्मा, अच्युत, सर्वशक्तिमान और सबके हृदय में स्थित परम मित्र हैं।इन श्लोकों का सार यह है कि भगवान श्रीकृष्ण सर्वज्ञ हैं। वे अतीत, वर्तमान और भविष्य की प्रत्येक घटना को जानते हैं, और सभी जीवों के हृदय, कर्म, प्रवृत्ति तथा गंतव्य को भी जानते हैं। वे केवल बाहरी घटनाओं के ज्ञाता नहीं, बल्कि प्रत्येक आत्मा के अंतरंग साक्षी हैं। परंतु जीव उन्हें नहीं जान पाता, क्योंकि उसकी चेतना सीमित, आवृत और भ्रमित है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भगवान और जीव समान नहीं हैं। जीव सीमित ज्ञान वाला है, जबकि भगवान पूर्ण ज्ञानस्वरूप हैं।

भगवान आगे बताते हैं कि जन्म लेते ही जीव इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वंद्वों में फँस जाता है। सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, अपना-पराया, प्रिय-अप्रिय—इन सब विरोधी भावों में उलझकर वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। आत्मा स्वभावतः भगवान की शाश्वत सेवक है, पर जब वह शरीर और मन को ही अपना मान लेती है, तब मोह में पड़ जाती है। यही कारण है कि मनुष्य संसार की अस्थायी वस्तुओं को सत्य समझता है और परम सत्य को भूल जाता है।

जो लोग पुण्य कर्मों से अपने हृदय को शुद्ध करते हैं और जिनके पाप क्षीण हो जाते हैं, वे इस द्वंद्व-मोह से ऊपर उठने लगते हैं। तब उनका मन स्थिर होकर भगवान की भक्ति में लग सकता है। इसका अर्थ है कि आध्यात्मिक जीवन केवल बौद्धिक चर्चा नहीं, बल्कि चरित्र की शुद्धि, सत्संग, सदाचार और ईश्वर-केंद्रित जीवन से विकसित होता है। जब हृदय शुद्ध होता है, तब भक्ति स्वाभाविक बनती है।

भगवान यह भी कहते हैं कि जो बुद्धिमान व्यक्ति वृद्धावस्था, मृत्यु और जन्म के चक्र से मुक्त होना चाहता है, वह उनकी शरण ग्रहण करता है। संसार में हर वस्तु नश्वर है, इसलिए जो वास्तव में विवेकी है, वह केवल अस्थायी सुखों का पीछा नहीं करता, बल्कि शाश्वत सत्य की खोज करता है। भगवान की शरण लेना केवल संकट से बचने का उपाय नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम उद्देश्य को पहचानना है। जो ऐसा करता है, वह ब्रह्म-तत्त्व, आत्मा और पारलौकिक कर्म के वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करता है।

अंतिम श्लोक में भगवान बताते हैं कि जो लोग उन्हें समस्त सृष्टि, देवताओं और यज्ञों के मूल सिद्धांत के रूप में जानते हैं, वे मृत्यु के समय भी उन्हें नहीं भूलते। सामान्य व्यक्ति मृत्यु के समय भय, भ्रम और आसक्ति में घिर जाता है, पर जिसने जीवनभर भगवान को समझा और स्मरण किया है, उसका अंतिम क्षण भी दिव्य हो जाता है। मृत्यु उसके लिए अंत नहीं, बल्कि भगवान की ओर प्रवेश-द्वार बन जाती है।

इस पूरे भाग का गहरा संदेश यह है कि जीवन का संकट अज्ञान है, और उसका समाधान भगवान की शरण है। जब मनुष्य इच्छा-द्वेष के द्वंद्व से ऊपर उठकर भगवान को सर्वज्ञ, सर्वाधार और अपना परम आश्रय मानता है, तब उसका जीवन स्थिर, शुद्ध और सफल हो जाता है। जो जीवनभर भगवान को याद करता है, वह मृत्यु के समय भी उन्हें याद करता है, और वही वास्तविक विजय है।

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