SB 7.1
All Glories To Srila Prabhupada 🙏
SB 7.1
इस अध्याय का सार यह है कि परमेश्वर वास्तव में किसी के शत्रु या पक्षपाती नहीं हैं; वे सबके लिए समान, न्यायपूर्ण, करुणामय और कल्याणकारी हैं। संसार में जो पक्षपात, मित्रता, शत्रुता, ईर्ष्या, आसक्ति और द्वेष दिखाई देता है, वह जीव की भौतिक दृष्टि का परिणाम है, भगवान की चेतना का नहीं। मनुष्य अपने सीमित अनुभव से सोचता है कि भगवान देवताओं का साथ देते हैं और असुरों का विरोध करते हैं, परंतु यह बाहरी दृष्टि है। भीतर से भगवान सबको उनके कर्म, स्वभाव और आध्यात्मिक हित के अनुसार मार्ग देते हैं।
महाराज परीक्षित का प्रश्न अत्यंत गहरा है—यदि भगवान सबके समान हैं, तो उन्होंने इंद्र के लिए असुरों का वध क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि भगवान किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, धर्म की रक्षा और संतुलन के लिए कार्य करते हैं। जब सत्त्वगुण प्रबल होता है, तब देवतुल्य प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं; जब रजोगुण और तमोगुण बढ़ते हैं, तब हिंसा, अहंकार और अधर्म बढ़ता है। भगवान उसी व्यवस्था को संतुलित करते हैं। इसलिए उनका हस्तक्षेप पक्षपात नहीं, सार्वभौमिक न्याय है।
यह अध्याय सिखाता है कि भगवान शरीर, जाति, पद, कुल या बाहरी पहचान से किसी को नहीं देखते। वे हृदय की दिशा देखते हैं। जीव अपने शरीर से जुड़कर “मैं” और “मेरा” में फँसता है, इसलिए मित्र और शत्रु बनाता है। भगवान इन भ्रमों से परे हैं। उनके लिए कोई अपना-पराया नहीं। जब वे भक्त की रक्षा करते हैं, तो वह प्रेम से करते हैं; जब वे असुर का विनाश करते हैं, तो वह भी उसके कल्याण के लिए करते हैं। इसीलिए भगवान द्वारा मारे गए असुर भी मुक्ति प्राप्त करते हैं।
शिशुपाल और दंतवक्र की कथा इसी सिद्धांत को और गहरा करती है। वे भगवान कृष्ण के विरोधी थे, निरंतर निंदा करते थे, फिर भी मृत्यु के समय भगवान में लीन हो गए। कारण यह नहीं कि निंदा महान है, बल्कि यह कि उनका मन निरंतर कृष्ण में लगा रहा। इससे सिद्ध होता है कि भगवान इतने करुणामय हैं कि शत्रुता से स्मरण करने वाले को भी ऊँचा फल मिलता है। तो जो प्रेम, श्रद्धा और सेवा से भगवान का स्मरण करता है, उसका क्या कहना।
यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म शिक्षा है—भगवान को भूल जाना सबसे बड़ा नुकसान है, और किसी भी प्रकार उनका स्मरण जीवन को बदल देता है। गोपियों ने प्रेम से, कंस ने भय से, शिशुपाल ने द्वेष से, पांडवों ने स्नेह से, भक्तों ने भक्ति से कृष्ण को पाया। मार्ग अलग-अलग थे, पर केंद्र एक था—निरंतर भगवान का स्मरण। इसलिए अध्याय कहता है कि किसी न किसी प्रकार मन को भगवान में लगाओ।
जया और विजया की कथा बताती है कि भगवान के धाम से गिरना भी अंतिम पराजय नहीं है। वे भगवान के सेवक थे, शापवश असुर जन्मों में आए, पर हर जन्म में भगवान स्वयं उन्हें वापस लेने आए। इससे स्पष्ट है कि भगवान अपने भक्त को कभी नहीं छोड़ते। कभी दंड के रूप में, कभी युद्ध के रूप में, कभी प्रेम के रूप में—पर अंततः वे जीव को अपनी ओर ही खींचते हैं।
व्यावहारिक जीवन में यह अध्याय हमें सिखाता है कि जब हम जीवन की घटनाओं को देखकर कहते हैं “भगवान मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं” या “भगवान फलाँ का पक्ष ले रहे हैं,” तब हम अधूरी तस्वीर देख रहे होते हैं। भगवान तात्कालिक सुख-दुःख से नहीं, आत्मा के अंतिम कल्याण से कार्य करते हैं। कई बार जो हानि लगती है वही शुद्धि होती है, और जो लाभ लगता है वही बंधन बन सकता है।
यह अध्याय यह भी सिखाता है कि हमें दूसरों से ईर्ष्या छोड़कर अपने हृदय की दिशा ठीक करनी चाहिए। भगवान सबके भीतर हैं, इसलिए किसी से द्वेष करने का अर्थ है अपने ही हृदय में अशांति बोना। जो व्यक्ति समभाव सीखता है, वही भगवान की दृष्टि को समझना शुरू करता है।
अंततः निष्कर्ष यही है कि परमेश्वर सबके लिए समान हैं, पर जो उनकी ओर मुड़ता है, उसे उनकी कृपा स्पष्ट अनुभव होती है। सूर्य सब पर समान चमकता है, पर जो खिड़की खोलता है, प्रकाश उसी कमरे में प्रवेश करता है। भगवान निष्पक्ष हैं; अंतर केवल हमारी ग्रहणशीलता में है।
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