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अध्याय 11 – भगवान नित्यानंद के विस्तार (विस्तृत कथा)

यह अध्याय श्री चैतन्य-चरितामृत के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। इसमें श्री नित्यानंद प्रभु की दिव्य शाखाओं, उपशाखाओं और उनके असंख्य पार्षदों का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार एक विशाल कल्पवृक्ष की अनगिनत शाखाएँ होती हैं और प्रत्येक शाखा फल-फूलों से लदी होती है, उसी प्रकार श्री नित्यानंद प्रभु की कृपा से असंख्य भक्त प्रकट हुए जिन्होंने संसार के कोने-कोने में श्री चैतन्य महाप्रभु के हरिनाम-संकीर्तन आंदोलन का विस्तार किया।

अध्याय का आरंभ लेखक कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा श्री नित्यानंद प्रभु के सभी भक्तों को प्रणाम करने से होता है। वे कहते हैं कि ये सभी भक्त नित्यानंद प्रभु के चरणकमलों के मधुर रस का पान करने वाली मधुमक्खियों के समान हैं। वे स्वीकार करते हैं कि इन भक्तों की महिमा अनंत है, इसलिए वे केवल कुछ प्रमुख शाखाओं का ही वर्णन करेंगे।

इसके बाद वे घोषणा करते हैं कि श्री नित्यानंद प्रभु स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेम-वृक्ष की सबसे विशाल शाखा हैं। महाप्रभु की इच्छा रूपी जल से सिंचित होकर यह शाखा असंख्य उपशाखाओं में विकसित हुई और संपूर्ण संसार को प्रेम, भक्ति और हरिनाम के फल-फूलों से भर दिया। इन भक्तों की संख्या इतनी अधिक है कि उनका पूर्ण वर्णन करना असंभव है।

इन सभी शाखाओं में सबसे प्रमुख श्री वीरभद्र गोसाईं हैं। वे नित्यानंद प्रभु के पुत्र और अत्यंत शक्तिशाली आचार्य थे। यद्यपि वे दिव्य शक्ति से संपन्न थे, फिर भी उन्होंने अपने जीवन में कभी अहंकार नहीं किया। उन्होंने स्वयं को सदैव भगवान का सेवक माना और वैदिक नियमों का आदर्श पालन किया। कृष्णदास कविराज बताते हैं कि संसार में चैतन्य और नित्यानंद के नामों का जो व्यापक प्रचार हुआ, उसमें वीरभद्र गोसाईं की कृपा का महान योगदान है।

इसके बाद अनेक महान भक्तों का वर्णन आता है। रामदास भगवान के प्रति सखा-भाव में सदैव लीन रहते थे। गदाधर दास गोपी-भाव में डूबे रहते थे और उनके घर में नित्यानंद प्रभु ने दाना-केली लीला का मंचन किया। माधव घोष ऐसे कीर्तन गाते थे कि स्वयं नित्यानंद प्रभु प्रेमावेश में नृत्य करने लगते थे। वासुदेव घोष के कीर्तन में इतनी शक्ति थी कि लकड़ी और पत्थर जैसे निर्जीव पदार्थ भी मानो पिघल जाते थे। मुरारी समाधि की अवस्था में रहते हुए बाघ को थप्पड़ मार देते थे और विषैले साँपों के साथ भी बिना किसी भय के खेलते थे।

लेखक बताते हैं कि नित्यानंद प्रभु के सभी प्रमुख पार्षद वास्तव में कृष्ण-लीला के व्रजवासी ग्वालबाल थे। उनके सिर पर मोरपंख, हाथ में सींग और डंडा तथा ग्वालबालों जैसा वेश उनकी वास्तविक पहचान को प्रकट करता था।

इसके बाद एक-एक करके अनेक महान भक्तों का परिचय दिया गया है—रघुनाथ उपाध्याय, सुंदरानंद, कमलाकर पिप्पलाई, सूर्यदास सरखेला, कृष्णदास सरखेला, गौरीदास पंडित, पुरंदर पंडित, परमेश्वर दास, जगदीश पंडित, धनंजय पंडित, महेश पंडित, पुरुषोत्तम पंडित, बलराम दास, यदुनाथ कविचंद्र, कृष्णदास ब्राह्मण, काला कृष्णदास, सदाशिव कविराज, पुरुषोत्तम दास, कानु ठाकुर, उद्धारण दत्त ठाकुर, वैष्णवानंद, विष्णुदास, परमानंद उपाध्याय, जीव पंडित, परमानंद गुप्त, तथा अनेक अन्य भक्त। प्रत्येक भक्त की अपनी विशेष सेवा, भक्ति-भाव और आध्यात्मिक महिमा थी, लेकिन सभी का जीवन एक ही उद्देश्य के लिए समर्पित था—श्री चैतन्य और श्री नित्यानंद प्रभु के संदेश का प्रचार तथा सभी जीवों को कृष्ण-प्रेम प्रदान करना।

अध्याय में लगभग पचहत्तर प्रमुख भक्तों का नामोल्लेख किया गया है। कृष्णदास कविराज प्रत्येक का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताते हैं कि ये सभी भक्त अपने जीवन से भक्ति, वैराग्य, विनम्रता और प्रेम का आदर्श प्रस्तुत करते थे।

इसके बाद वृन्दावन दास ठाकुर का उल्लेख आता है। वे श्रीमती नारायणी के पुत्र थे और उन्होंने श्री चैतन्य-मंगल (बाद में श्री चैतन्य-भागवत) की रचना की। जैसे श्रीमद्भागवत के रचयिता व्यासदेव हैं, वैसे ही श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के व्यास वृन्दावन दास ठाकुर माने जाते हैं।

अध्याय के अंत में कृष्णदास कविराज गोस्वामी अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि नित्यानंद प्रभु के भक्तों की संख्या अनंत है। सहस्र मुख वाले शेषनाग भी उनकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। उन्होंने केवल आत्म-शुद्धि और भक्तों की कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से कुछ प्रमुख भक्तों का संक्षिप्त परिचय दिया है। ये सभी भक्त कृष्ण-प्रेम के पके हुए फलों से परिपूर्ण थे और जहाँ भी जाते थे, हरिनाम, कीर्तन और भक्ति का अमृत बाँटकर लोगों के हृदयों को कृष्ण-प्रेम से भर देते थे।

इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि श्री नित्यानंद प्रभु की कृपा उनके भक्तों के माध्यम से पूरे संसार में प्रवाहित होती है। जो उनके भक्तों की सेवा, संग और चरणाश्रय ग्रहण करता है, वह भी श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेम-संकीर्तन आंदोलन का भाग बनकर कृष्ण-प्रेम प्राप्त कर सकता है।

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