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विस्तृत कथा — उद्धव जी के हृदय में भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण
जब विदुर जी अपनी तीर्थयात्रा के दौरान महान भक्त उद्धव जी से मिले, तब उनके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के विषय में जानने की तीव्र इच्छा थी। विदुर जी जानते थे कि उद्धव केवल कृष्ण के भक्त ही नहीं थे, बल्कि भगवान के अत्यंत निकट सेवक और प्रिय पार्षद थे। इसलिए उन्होंने उद्धव जी से कृष्ण की लीलाओं और उनके संदेशों के विषय में बताने का निवेदन किया।
लेकिन जैसे ही विदुर जी ने कृष्ण का विषय उठाया, उद्धव जी तुरंत उत्तर नहीं दे सके। भगवान का स्मरण इतना प्रबल हुआ कि वे बाहरी संसार को लगभग भूल गए। उनका शरीर स्थिर हो गया, वे मौन हो गए और भगवान के चरणकमलों के ध्यान में डूब गए। उनकी आँखों से विरह के आँसू बहने लगे। विदुर जी ने उनके शरीर में भक्ति के दिव्य लक्षण देखकर समझ लिया कि उद्धव जी का कृष्ण से संबंध केवल ज्ञान या श्रद्धा का नहीं, बल्कि अत्यंत गहरे प्रेम का था।
बचपन से ही कृष्ण की सेवा
उद्धव जी की भक्ति वृद्धावस्था में विकसित नहीं हुई थी। जब वे केवल पाँच वर्ष के थे, तभी से भगवान की सेवा में लीन रहते थे। वे कृष्ण की मूर्ति बनाकर उनकी सेवा और पूजा किया करते थे। उनकी माता उन्हें नाश्ता करने के लिए बुलातीं, लेकिन बालक उद्धव का मन सेवा छोड़कर भोजन करने में नहीं लगता था।
समय बीतता गया, शरीर वृद्ध होता गया, लेकिन कृष्ण की सेवा के प्रति उनका उत्साह वृद्ध नहीं हुआ। बचपन में जिस प्रेम से वे भगवान की सेवा करते थे, वही प्रेम जीवन के अंतिम समय तक बना रहा।
कृष्ण के तिरोधान का दुःख
कुछ समय बाद उद्धव जी समाधि से बाहर आए, अपने आँसू पोंछे और विदुर जी से बोले कि भगवान श्रीकृष्ण, जो इस संसार के लिए सूर्य के समान थे, अब उनकी दृष्टि से ओझल हो गए हैं। कृष्ण के तिरोधान के साथ ही यदुवंश भी समाप्त हो चुका था।
उद्धव जी के लिए यह ऐसा था मानो सूर्य अस्त हो गया हो और संसार अंधकार में डूब गया हो।
उन्हें एक और बात का दुःख था। यादव लोग कृष्ण के साथ रहते थे, उनके साथ भोजन करते थे, उनसे बातें करते थे और उन्हें अपना संबंधी मानते थे। वे विद्वान और बुद्धिमान भी थे, फिर भी उनमें से अनेक कृष्ण की पूर्ण स्थिति को नहीं पहचान सके।
अत्यधिक निकटता कभी-कभी भगवान की महानता को ढक देती है। जैसे जल में रहने वाली मछली जल में दिखाई देने वाले चंद्रमा के प्रतिबिंब को देखकर वास्तविक चंद्रमा की महिमा नहीं समझ सकती, उसी प्रकार कुछ यादव कृष्ण के साथ रहते हुए भी उन्हें केवल अपने परिवार के एक महान सदस्य के रूप में देखते रहे।
भगवान का अद्भुत मानवीय व्यवहार
उद्धव जी कृष्ण की लीलाओं को याद करके आश्चर्य में पड़ जाते थे।
वे सोचते थे—कृष्ण अजन्मा हैं, फिर भी देवकी के गर्भ से जन्म लेने की लीला करते हैं। वे किसी से भयभीत नहीं हैं, फिर भी कंस से बचाने के लिए पिता वसुदेव उन्हें रात में गोकुल ले जाते हैं। वे सर्वशक्तिमान हैं, फिर भी व्रज में एक छोटे बालक की तरह रहते हैं।
बाद में वही भगवान अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव के सामने अत्यंत विनम्र होकर कहते हैं कि कंस के भय के कारण वे उनसे दूर रहे, इसलिए पुत्र के रूप में उनकी उचित सेवा नहीं कर सके। वे अपने माता-पिता से क्षमा माँगते हैं।
यही बात उद्धव जी के हृदय को विशेष रूप से छूती थी। जिन्हें ब्रह्मा, शिव और देवता प्रणाम करते हैं, वही भगवान अपने भक्तों के सामने पुत्र बनकर विनम्रता दिखाते हैं।
कृष्ण के सौंदर्य की स्मृति
उद्धव जी को कृष्ण का अनुपम स्वरूप भी याद आया। जब महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में विभिन्न लोकों से महान व्यक्ति और देवता उपस्थित हुए, तब सभी कृष्ण के सौंदर्य को देखकर आश्चर्यचकित हो गए।
कृष्ण का स्वरूप इतना सुंदर था कि आभूषण भी कृष्ण को सुंदर नहीं बनाते थे; बल्कि कृष्ण के शरीर पर आने के कारण आभूषण स्वयं सुंदर हो जाते थे।
व्रज की गोपियों की स्थिति तो और भी विशेष थी। जब कृष्ण उनके सामने से जाते, तो गोपियाँ अपनी आँखों से उनका पीछा करती रहतीं। कृष्ण दृष्टि से ओझल हो जाते, फिर भी उनका मन कृष्ण के पीछे ही रहता। कभी-कभी कृष्ण के वियोग में वे अपने घर के सामान्य कार्य भी नहीं कर पाती थीं।
भगवान की सबसे बड़ी विशेषता—उनकी दया
इसके बाद उद्धव जी को पूतना की घटना याद आई।
पूतना कोई भक्त नहीं थी। वह कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी थी और उसने अपने स्तनों पर विष लगाकर बालक कृष्ण को मारने का प्रयास किया था। लेकिन उसने कृष्ण को गोद में लिया और माता के समान उन्हें अपना स्तन दिया।
भगवान ने उसके विष और हत्या की भावना को प्रमुखता नहीं दी; उन्होंने उसके द्वारा धारण किए गए मातृरूप की थोड़ी-सी सेवा को स्वीकार किया और उसे माता के समान उच्च गति प्रदान की।
इसीलिए उद्धव जी कहते हैं—ऐसे दयालु भगवान को छोड़कर मैं और किसकी शरण लूँ?
शिशुपाल और भगवान के शत्रुओं की गति
उद्धव जी ने शिशुपाल को भी याद किया। शिशुपाल जीवनभर कृष्ण से द्वेष करता रहा। राजसूय यज्ञ में उसने भगवान का अपमान किया और अंततः कृष्ण के सुदर्शन चक्र से उसका वध हुआ। फिर भी निरंतर कृष्ण के विषय में सोचते रहने के कारण उसे असाधारण आध्यात्मिक गति प्राप्त हुई।
इसी प्रकार युद्धभूमि में जो योद्धा कृष्ण के सामने मारे गए, उन्होंने मृत्यु के समय कृष्ण के सुंदर मुख का दर्शन किया। इस प्रकार भगवान के संपर्क ने उन्हें भी शुद्ध कर दिया।
उद्धव जी का आशय था कि कृष्ण इतने मंगलमय हैं कि प्रेम से उनका स्मरण करने वाले भक्तों का तो कहना ही क्या—यहाँ तक कि शत्रुता के कारण निरंतर उनका चिंतन करने वाले भी उनके संपर्क से लाभ प्राप्त कर लेते हैं।
भगवान होकर भी सेवक जैसा व्यवहार
उद्धव जी को कृष्ण की विनम्रता की एक और लीला याद आती है।
कृष्ण वास्तव में सभी राजाओं के भी परम स्वामी हैं, फिर भी द्वारका में वे राजा उग्रसेन को राजा के पद पर रखते थे और स्वयं उनके अधीन व्यक्ति के समान व्यवहार करते थे। आवश्यकता पड़ने पर कृष्ण उग्रसेन के सामने खड़े होकर उनसे आज्ञा माँगते थे।
उद्धव जी के लिए यह अत्यंत आश्चर्यजनक था—जिसके चरणों में बड़े-बड़े देवता अपने मुकुट झुकाते हैं, वही भगवान अपने भक्त को सम्मान देने के लिए स्वयं सेवक जैसा व्यवहार करते हैं।
कृष्ण का व्रज में आगमन
ब्रह्मा और देवताओं की प्रार्थना पर भगवान पृथ्वी का भार कम करने के लिए प्रकट हुए। देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में उनका प्राकट्य हुआ। कंस से उनकी रक्षा करने के लिए वसुदेव जी उन्हें रातोंरात यमुना पार करके नन्द महाराज के घर ले गए।
वहाँ कृष्ण और बलराम ग्वालों के बीच बड़े हुए। भगवान का ऐश्वर्य मानो ढकी हुई अग्नि के समान छिपा हुआ था। बाहर से वे नन्द-यशोदा के साधारण बालक दिखाई देते थे, लेकिन वास्तव में वही समस्त सृष्टि के स्वामी थे।
वृंदावन की बाल लीलाएँ
उद्धव जी के मन में अब वृंदावन का दृश्य आने लगा।
छोटे कृष्ण कभी रोते, कभी हँसते, कभी माता यशोदा से हठ करते और कभी ग्वालबालों के साथ खेलते। उनका बालरूप इतना सुंदर था कि वे सिंह के छोटे बच्चे के समान आकर्षक दिखाई देते थे।
धीरे-धीरे कृष्ण बछड़े और फिर गायें चराने जाने लगे। उनके साथ बलराम और अनेक ग्वालबाल होते। वे यमुना के तट पर घूमते, वृक्षों और वन की शोभा देखते और अपनी बाँसुरी बजाते। कृष्ण की बाँसुरी सुनकर उनके मित्र और संपूर्ण व्रज आनंदित हो जाता था।
कंस द्वारा भेजे गए असुर
लेकिन कंस लगातार कृष्ण को मारने का प्रयास कर रहा था। उसने अनेक शक्तिशाली असुरों को व्रज भेजा। वे विभिन्न रूप धारण करके आते थे।
फिर भी जिन राक्षसों से सामान्य मनुष्य भयभीत हो जाते, उन्हें बालक कृष्ण खेल-खेल में समाप्त कर देते। उद्धव जी कहते हैं कि कृष्ण ने उन असुरों का वध इतनी सहजता से किया जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी गुड़िया या खिलौना तोड़ देता है।
इससे स्पष्ट होता है कि कृष्ण का बालरूप उनकी शक्ति की कमी नहीं था। वे बालक के रूप में भी पूर्ण भगवान ही थे।
कालिया नाग का दमन
एक समय कालिया नाग ने यमुना के जल को अपने विष से दूषित कर दिया। उसका विष इतना भयंकर था कि वहाँ का जल जीवों के लिए खतरनाक हो गया।
कृष्ण यमुना में उतरे और कालिया को दंड दिया। उन्होंने उसके फनों पर नृत्य करके उसका अभिमान तोड़ दिया। अंततः कालिया ने समर्पण किया और कृष्ण की आज्ञा से उस स्थान को छोड़ दिया।
कृष्ण बाहर आए और यमुना का जल पुनः सामान्य हो गया। इस प्रकार उन्होंने व्रजवासियों, गायों और यमुना की रक्षा की।
इन्द्र का अभिमान और गोवर्धन लीला
एक समय नन्द महाराज और व्रजवासी इन्द्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे। कृष्ण ने उनसे पूछा कि यह पूजा क्यों की जा रही है। फिर उन्होंने समझाया कि हमें गायों, ब्राह्मणों और गोवर्धन पर्वत का सम्मान करना चाहिए।
व्रजवासियों ने कृष्ण की बात मान ली और इन्द्र-यज्ञ के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की।
इससे इन्द्र का अभिमान आहत हो गया। उसने भयंकर बादलों को आदेश दिया कि वे व्रज पर लगातार वर्षा करें। वर्षा इतनी तीव्र हुई कि व्रजवासी और गायें संकट में पड़ गए।
तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर विशाल छत्र बना दिया। सभी व्रजवासी और गायें उसके नीचे आ गईं और भगवान ने उनकी रक्षा की।
इस लीला के द्वारा कृष्ण ने एक ओर अपने भक्तों की रक्षा की और दूसरी ओर इन्द्र का अभिमान भी तोड़ दिया।
शरद ऋतु और गोपियों का कृष्ण-प्रेम
इसके बाद उद्धव जी को शरद ऋतु की सुंदर रात्रि का स्मरण हुआ। आकाश निर्मल था, चंद्रमा की रोशनी से वृंदावन प्रकाशित था और भगवान कृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई।
बाँसुरी की ध्वनि सुनकर व्रज की गोपियाँ कृष्ण की ओर आकर्षित हुईं। उनके लिए कृष्ण केवल परमेश्वर नहीं थे; वे उनके जीवन और प्रेम के एकमात्र केंद्र थे।
इस प्रकार उद्धव जी के स्मरण में कृष्ण की जन्मलीला से लेकर व्रज की प्रेममयी लीलाओं तक पूरा दृश्य एक-एक करके प्रकट होने लगा।
इस पूरे प्रसंग का गहरा भाव
विदुर जी ने केवल कृष्ण के विषय में पूछा था, लेकिन उद्धव जी तुरंत कृष्ण-प्रेम की समाधि में चले गए। इससे पता चलता है कि उन्होंने कृष्ण-कथा केवल याद नहीं कर रखी थी; कृष्ण उनके हृदय में बस चुके थे।
उद्धव जी का जीवन हमें यह समझाता है कि भक्ति की पूर्णता केवल भगवान के बारे में बहुत सारी जानकारी इकट्ठी करना नहीं है। वास्तविक उन्नति तब है जब बार-बार श्रवण, कीर्तन, स्मरण और सेवा करते-करते भगवान हमारे हृदय के इतने निकट हो जाएँ कि उनका नाम सुनते ही उनकी लीलाएँ, रूप, गुण और सेवा स्वतः स्मरण होने लगें।
और इस अध्याय में कृष्ण की एक विशेषता बार-बार सामने आती है—वे सर्वोच्च भगवान होकर भी अपने भक्तों के प्रेम के कारण बालक बनते हैं, पुत्र बनते हैं, मित्र बनते हैं, अपने भक्त की आज्ञा स्वीकार करते हैं और यहाँ तक कि उन्हें मारने आई पूतना पर भी कृपा कर देते हैं।
यही कारण है कि उद्धव जी कृष्ण के विरह को सहन नहीं कर पा रहे थे। उनके लिए कृष्ण केवल भगवान नहीं थे—कृष्ण ही उनका जीवन थे।
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