Sb 11.2

अध्याय 2 — महाराज निमि और नौ योगेन्द्रों की कथा थोड़ा विस्तार से


इस अध्याय की शुरुआत वासुदेव जी और नारद मुनि के संवाद से होती है। नारद मुनि भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन और संग की इच्छा से द्वारका में रहते थे। एक दिन वे वासुदेव जी के घर पहुँचे। वासुदेव जी ने उनका आदर-सत्कार किया और उनसे बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा—“ऐसा कौन-सा धर्म और भक्ति का मार्ग है जिससे मनुष्य संसार के भय से मुक्त होकर भगवान को प्राप्त कर सके?”


वासुदेव जी ने यह भी स्वीकार किया कि पहले उन्होंने भगवान अनंत की आराधना संतान प्राप्त करने की इच्छा से की थी। भगवान को प्राप्त करने और संसार से मुक्त होने की इच्छा उस समय मुख्य नहीं थी। अब वे शुद्ध भक्ति का मार्ग जानना चाहते थे।


नारद मुनि उनके प्रश्न से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति के विषय में सुनना, बोलना, स्मरण करना और दूसरे भक्तों की भक्ति की प्रशंसा करना भी मनुष्य को शुद्ध करता है। फिर इसे समझाने के लिए उन्होंने महाराज निमि और नौ योगेन्द्रों की प्राचीन कथा सुनाई।


नौ योगेन्द्र कौन थे?


स्वयंभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत, उनके पुत्र अग्नीध्र और अग्नीध्र के पुत्र नाभि महाराज थे। नाभि महाराज के पुत्र के रूप में भगवान ऋषभदेव प्रकट हुए।


ऋषभदेव के 100 पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े भरत महाराज थे। उन्हीं के नाम पर यह भूमि भारतवर्ष कहलायी।


ऋषभदेव के नौ पुत्र महान आत्मज्ञानी संत बने। उनके नाम थे—कवि, हवीर, अंतरीक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविरहोत्र, द्रुमिला, चमस और करभाजन। इन्हीं को नौ योगेन्द्र कहा जाता है।


वे किसी भौतिक बंधन में नहीं थे। वे भगवान के शुद्ध भक्त थे और अलग-अलग लोकों में स्वतंत्र रूप से भ्रमण करते हुए लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान देते थे।


महाराज निमि से मुलाकात


एक बार महाराज निमि बड़े-बड़े ऋषियों के मार्गदर्शन में यज्ञ कर रहे थे। उसी समय नौ योगेन्द्र वहाँ पहुँचे।


उनका आध्यात्मिक तेज सूर्य के समान था। उन्हें देखकर महाराज निमि, ब्राह्मण और यज्ञ में उपस्थित सभी लोग सम्मानपूर्वक खड़े हो गए। महाराज निमि समझ गए कि ये कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि भगवान के अत्यंत प्रिय भक्त हैं।


उन्होंने नौ योगेन्द्रों को आसन दिया, उनकी पूजा की और विनम्र होकर कहा कि मनुष्य शरीर मिलना बहुत दुर्लभ है, लेकिन भगवान के शुद्ध भक्त का संग मिलना उससे भी अधिक दुर्लभ है।


इसलिए उन्होंने पूछा—“मनुष्य का वास्तविक कल्याण क्या है? वह कौन-सा भागवत-धर्म है जिससे भगवान प्रसन्न होकर स्वयं को भी भक्त को दे देते हैं?”


कवि योगेन्द्र का उत्तर — भय क्यों होता है?


सबसे पहले कवि योगेन्द्र ने उत्तर दिया। उन्होंने समझाया कि जीव का वास्तविक स्वरूप भगवान का नित्य सेवक होना है। लेकिन जब जीव भगवान को भूलकर “मैं यह शरीर हूँ” ऐसा मानने लगता है, तभी भय शुरू होता है।


फिर वह सोचता है—“यह मेरा परिवार है, यह मेरी संपत्ति है, यह मेरा शरीर है; कहीं यह मुझसे छिन न जाए।” इसी देहात्म-बुद्धि से चिंता, आसक्ति और भय उत्पन्न होते हैं।


इसका उपाय है—सच्चे गुरु की शरण लेकर भगवान की भक्ति करना।


मनुष्य शरीर, मन, वाणी, बुद्धि और इंद्रियों से जो भी करे, उसे यह सोचकर भगवान को अर्पित करे—


“मैं यह कार्य भगवान नारायण की प्रसन्नता के लिए कर रहा हूँ।”


अर्थात केवल मंदिर की पूजा ही भक्ति नहीं है। यदि हमारा खाना, काम करना, परिवार की जिम्मेदारी निभाना, बोलना और सोचना भी कृष्ण की प्रसन्नता के लिए हो जाए, तो पूरा जीवन भक्ति से जुड़ सकता है।


हरिनाम से भगवान के प्रति प्रेम


कवि योगेन्द्र ने विशेष रूप से भगवान के नाम, रूप, गुण और लीलाओं का श्रवण तथा कीर्तन करने की शिक्षा दी।


निरंतर भगवान का नाम लेने से धीरे-धीरे हृदय शुद्ध होता है और भगवान के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है। उच्च अवस्था में भक्त का हृदय भगवान के प्रेम में इतना पिघल जाता है कि कभी वह रोता है, कभी हँसता है, कभी भगवान का नाम गाता और नृत्य करता है।


भोजन वाला सुंदर उदाहरण


कवि योगेन्द्र ने भक्ति को समझाने के लिए बहुत सरल उदाहरण दिया।


जब भूखा व्यक्ति भोजन करता है तो प्रत्येक निवाले के साथ तीन चीजें एक साथ होती हैं—भूख कम होती है, शरीर को पोषण मिलता है और संतुष्टि मिलती है।


इसी प्रकार वास्तविक भक्ति करने पर तीन चीजें साथ-साथ आती हैं—


भगवान के प्रति भक्ति बढ़ती है, भगवान का अनुभव बढ़ता है और संसार के प्रति अनावश्यक आसक्ति कम होती जाती है।


इसलिए अपनी भक्ति की उन्नति को केवल बाहरी कार्यों से नहीं, बल्कि यह देखकर भी समझ सकते हैं कि कृष्ण के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है या नहीं और संसार के भोग के प्रति आसक्ति घट रही है या नहीं।


हवीर योगेन्द्र — तीन प्रकार के भक्त


इसके बाद महाराज निमि ने पूछा, “मैं कैसे पहचानूँ कि कौन कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम भक्त है?”


तब हवीर योगेन्द्र ने तीन स्तर बताए।


कनिष्ठ भक्त भगवान के विग्रह की श्रद्धा से पूजा करता है, लेकिन अभी भक्तों का सम्मान और दूसरे जीवों के साथ उचित व्यवहार पूरी तरह नहीं समझ पाया है। उसकी भक्ति शुरू हुई है, लेकिन उसे आगे बढ़ने की आवश्यकता है।


मध्यम भक्त चार प्रकार का व्यवहार करता है—भगवान से प्रेम, भक्तों से मित्रता, निर्दोष-अज्ञानी लोगों पर दया और भगवान से द्वेष करने वालों से अनावश्यक संग न करना।


उत्तम भक्त हर जीव का भगवान से संबंध देखता है। वह किसी को भगवान से अलग नहीं समझता। सुख-दुःख आने पर भी भगवान को नहीं भूलता और संसार का बड़े से बड़ा ऐश्वर्य मिलने पर भी भगवान के चरणों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता।


अध्याय की मुख्य शिक्षा


यह अध्याय बताता है कि मानव जीवन का वास्तविक लाभ भगवान की शुद्ध भक्ति प्राप्त करना है। संसार का भय केवल बाहरी परिस्थितियाँ बदलने से समाप्त नहीं होता; जब हम अपनी वास्तविक पहचान—“मैं भगवान का नित्य सेवक हूँ”—समझकर गुरु और वैष्णवों के मार्गदर्शन में श्रवण, कीर्तन, स्मरण और सेवा करते हैं, तब वास्तविक निर्भयता आती है।


और इस अध्याय का बहुत महत्वपूर्ण संदेश है: क्षण भर का शुद्ध साधु-संग भी अत्यंत मूल्यवान है, क्योंकि सच्चे भक्त का संग हमें संसार से भगवान की ओर मोड़ सकता है। 

Comments

Popular posts from this blog

BG 3.3

Srimad Bhagavatam 3.4.1-5 As It Is

Srimad Bhagavatam 3.4.20