Brahm Samhita 11-15
All Glories To Srila Prabhupada 🙏
इन श्लोकों का सार यह है कि Brahma Samhita महा-विष्णु की असीम महिमा और सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करती है। महा-विष्णु को समस्त अवतारों का मूल स्रोत बताया गया है। उनके अनंत सिर, नेत्र और भुजाएँ इस बात का संकेत हैं कि वे सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और अनंत शक्तियों से युक्त हैं। वे केवल एक देवता नहीं, बल्कि असंख्य ब्रह्मांडों और अनगिनत जीवात्माओं के मूल कारण हैं।
उन्हीं महा-विष्णु को नारायण कहा जाता है, जो कारण सागर में योगनिद्रा की अवस्था में स्थित रहते हैं। उनकी यह योगनिद्रा सामान्य अज्ञानपूर्ण नींद नहीं, बल्कि पूर्ण आध्यात्मिक समाधि और आनंद की अवस्था है। उनकी श्वास और इच्छा से असंख्य ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं। उनके शरीर के प्रत्येक रोमछिद्र से अनगिनत ब्रह्मांडों के बीज निकलते हैं, जो प्रारम्भ में दिव्य स्वर्णिम अंडों के समान होते हैं। बाद में माया और पंचमहाभूतों से आच्छादित होकर वे भौतिक ब्रह्मांडों का रूप धारण करते हैं। इससे यह समझाया गया है कि सम्पूर्ण भौतिक जगत भगवान की असीम सत्ता की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म और नगण्य है।
फिर वही महा-विष्णु प्रत्येक ब्रह्मांड में अपने अंश रूप में प्रवेश करते हैं। वे ही गर्भोदकशायी विष्णु और फिर क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा बनकर स्थित होते हैं। इस प्रकार भगवान केवल दूरस्थ सृष्टिकर्ता नहीं, बल्कि प्रत्येक आत्मा के भीतर उपस्थित मार्गदर्शक भी हैं।
इन श्लोकों में ब्रह्मा, विष्णु और शंभू (शिव) की उत्पत्ति का भी गूढ़ वर्णन है। विष्णु भगवान का प्रत्यक्ष और पूर्ण आध्यात्मिक विस्तार हैं, इसलिए वे पालनकर्ता और परमात्मा रूप में कार्य करते हैं। ब्रह्मा और शंभू भगवान की विशिष्ट शक्तियों से प्रकट हुए कार्यकारी देवता हैं, जो क्रमशः सृष्टि और संहार के कार्य में लगे रहते हैं। इससे यह सिद्ध किया गया है कि सम्पूर्ण देवतागण और ब्रह्मांडीय व्यवस्थाएँ अंततः एक ही परम सत्य—श्रीकृष्ण और उनके विस्तार महा-विष्णु—पर आधारित हैं।
इन शिक्षाओं का मुख्य निष्कर्ष यह है कि यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान की असीम शक्ति की केवल एक छोटी अभिव्यक्ति है। अनंत ब्रह्मांड उनके लिए उतने ही सहज हैं जितने शरीर के रोमछिद्र। फिर भी वही परम भगवान प्रत्येक जीव के भीतर प्रेमपूर्वक स्थित होकर उसका मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए जीव का वास्तविक कल्याण इसी में है कि वह इस भौतिक सृष्टि की अस्थायी जटिलताओं से ऊपर उठकर भगवान की शरण ग्रहण करे और शुद्ध भक्ति में स्थित हो जाए।
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