Brahm Samhita 51-55

All Glories To Srila Prabhupada 🙏
इन श्लोकों का सार यह है कि Brahma Samhita सम्पूर्ण ब्रह्मांड, धर्म, कर्म, देवताओं और भक्ति के अंतिम केंद्र के रूप में श्रीकृष्ण गोविंद को स्थापित करती है। संसार जिन नौ तत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, दिशा, समय, मन और आत्मा—से बना है, वे सब उन्हीं से उत्पन्न होते हैं, उन्हीं में स्थित रहते हैं और प्रलय के समय उन्हीं में विलीन हो जाते हैं। संसार के सभी दार्शनिक मत और तत्त्वचिंतन अंततः इन्हीं तत्वों के इर्द-गिर्द घूमते हैं, परंतु उनका मूल स्रोत गोविंद ही हैं।

सूर्य का वर्णन यह दिखाने के लिए किया गया है कि संसार में जितनी भी शक्ति, प्रकाश और व्यवस्था दिखाई देती है, वह स्वतंत्र नहीं है। सूर्य, जिसे कुछ लोग परम कारण मानते हैं, वास्तव में गोविंद की आज्ञा से ही कालचक्र में अपना कार्य करता है। उसी प्रकार धर्म, तपस्या, वेद, योग, ज्ञान, देवता, और ब्रह्मा से लेकर छोटे कीट तक सभी जीवों की शक्तियाँ भी भगवान से ही प्राप्त होती हैं। प्रत्येक जीव में जो विशेष क्षमता दिखाई देती है, वह भगवान की प्रदत्त शक्ति का ही सीमित प्राकट्य है।

इसके बाद कर्म और भक्ति के बीच का गहरा अंतर बताया गया है। भगवान निष्पक्ष होकर सभी जीवों को उनके कर्मों का फल देते हैं, चाहे वह साधारण मनुष्य हो या इंद्र जैसे देवता। परंतु अपने भक्तों के प्रति वे विशेष कृपा करते हैं। जो जीव केवल कर्म, भोग या मुक्ति की इच्छा से कार्य करते हैं, वे कर्मबंधन में बने रहते हैं। जबकि जो भक्त निष्काम भाव से केवल भगवान की सेवा करते हैं, भगवान उनके कर्मों के मूल—अज्ञान और स्वार्थपूर्ण इच्छाओं—को ही जला देते हैं। यही शुद्ध भक्ति की विशेषता है कि वह कर्म और ज्ञान दोनों से परे जाकर जीव को भगवान की प्रेममयी सेवा में स्थापित करती है।

अंतिम श्लोकों में भक्ति-रस का सिद्धांत समझाया गया है। जीव जिस भाव से भगवान का ध्यान करता है, उसी के अनुरूप उसे आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त होती है। शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—ये पाँच मुख्य प्रेमभाव हैं। कोई भगवान को स्वामी मानकर सेवा करता है, कोई मित्र की तरह प्रेम करता है, कोई माता-पिता के स्नेह से, और कोई गोपियों की तरह मधुर प्रेम से। भगवान उसी भाव के अनुसार भक्त को अपने निकट स्थान देते हैं। यह भी बताया गया है कि शत्रुता, भय और मोह से भी भगवान का चिंतन करने वाले अंततः किसी न किसी प्रकार की मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं, जैसे कंस या शिशुपाल; परंतु वे प्रेमरस का आनंद नहीं प्राप्त कर पाते। वास्तविक और सर्वोच्च प्राप्ति केवल प्रेममयी भक्ति से होती है।

इन शिक्षाओं का निष्कर्ष यह है कि संसार की समस्त व्यवस्था, धर्म, योग, ज्ञान और शक्तियाँ श्रीकृष्ण से ही उत्पन्न हैं। परंतु भगवान का वास्तविक अनुभव केवल प्रेम और भक्ति से ही संभव है। जीव जिस भाव से भगवान की ओर बढ़ता है, भगवान उसी भाव में उसे स्वीकार करते हैं। इसलिए भक्ति का सर्वोच्च लक्ष्य केवल मुक्ति नहीं, बल्कि भगवान के साथ शाश्वत प्रेमपूर्ण संबंध की प्राप्ति है।

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