Prabhupada Lilamrita 2

All Glories To Srila Prabhupada 🙏
यह अध्याय श्रील प्रभुपाद के युवावस्था के उस दौर का चित्र प्रस्तुत करता है जब वे एक ओर आधुनिक पश्चिमी शिक्षा, राष्ट्रवाद और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच थे, और दूसरी ओर उनके हृदय में बचपन से संस्कारित कृष्णभक्ति निरंतर जीवित थी। स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढ़ते हुए उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य, दर्शन, संस्कृत और अर्थशास्त्र का अध्ययन किया, यूरोपीय शिक्षकों के संपर्क में आए, पश्चिमी विचारधारा को निकट से देखा और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की लहर को अनुभव किया। फिर भी उनके भीतर सबसे गहरी छाप वैष्णव संस्कारों और भगवान कृष्ण के प्रति आकर्षण की ही बनी रही। कॉलेज का वातावरण उन्हें अकादमिक रूप से व्यस्त रखता था, लेकिन उनका मन बार-बार आध्यात्मिक चिंतन की ओर जाता था। वे अपने सहपाठियों से धार्मिक और दार्शनिक विषयों पर चर्चा करते, गीता का सुंदर पाठ करते और भगवान चैतन्य के नाटक में भाग लेकर लोगों को भाव-विभोर कर देते थे।

उनके पिता गौर मोहन का प्रभाव इस पूरे अध्याय में बहुत गहराई से दिखाई देता है। वे चाहते थे कि अभय आधुनिक शिक्षा प्राप्त करें, लेकिन पश्चिमी भ्रष्ट प्रभाव से दूर रहें। साथ ही वे चाहते थे कि उनका पुत्र एक शुद्ध वैष्णव बने। उन्होंने अभय को न तो पश्चिमी जीवनशैली में डूबने दिया और न ही किसी अप्रामाणिक साधु के प्रभाव में जाने दिया। विवाह की व्यवस्था भी उन्होंने वैदिक परंपरा के अनुसार की, यद्यपि अभय का मन उसमें पूरी तरह नहीं था। फिर भी उन्होंने पिता की इच्छा का सम्मान किया। गौर मोहन ने उन्हें समझाया कि परिवार से अत्यधिक आसक्ति आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बन सकती है, और यह बात अभय के मन में गहराई से बैठ गई।

अभय का राष्ट्रवाद भी केवल राजनीतिक नहीं था; उसमें आध्यात्मिक दृष्टि जुड़ी हुई थी। गांधी जी के व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया क्योंकि गांधी गीता पढ़ते थे, सादा जीवन जीते थे और नैतिकता पर जोर देते थे। अभय को लगा कि यदि भारत स्वतंत्र होगा तो उसकी वैदिक संस्कृति भी संसार के सामने सम्मानपूर्वक प्रकट हो सकेगी। इसी भावना से उन्होंने गांधी के असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और अपनी बीए डिग्री स्वीकार करने से इनकार कर दिया। यह उनके जीवन का साहसी निर्णय था, क्योंकि डिग्री भविष्य के करियर का आधार मानी जाती थी। फिर भी उनका मन न पूरी तरह राजनीति में लगा, न करियर में और न ही सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में। भीतर से वे हमेशा कृष्ण और आध्यात्मिक जीवन की ओर खिंचे रहते थे।

इस अध्याय में यह भी स्पष्ट होता है कि कृष्णभक्ति उनके जीवन की वास्तविक धुरी थी। कॉलेज के व्यस्त जीवन के कारण उन्होंने अपनी कृष्ण मूर्तियों को एक डिब्बे में रख दिया था, लेकिन बाद में स्वप्न में स्वयं कृष्ण की मूर्ति ने उनसे शिकायत की कि वे उनकी पूजा क्यों नहीं कर रहे। इससे अभय का हृदय द्रवित हो गया और उन्होंने पुनः पूजा आरंभ कर दी। जगन्नाथ पुरी की यात्रा में भी उनका वास्तविक आकर्षण तीर्थ और भगवान जगन्नाथ थे, न कि केवल पर्यटन। वहाँ उन्होंने बाहरी धार्मिकता और वास्तविक भक्ति के अंतर को भी देखा, जब कुछ तथाकथित साधुओं का आचरण उन्हें निराशाजनक लगा। इससे उनके भीतर यह समझ और मजबूत हुई कि केवल बाहरी वेश या धार्मिक पद पर्याप्त नहीं, वास्तविक शुद्ध भक्ति ही मुख्य है।

अध्याय का अंत इस बात को दिखाता है कि यद्यपि अभय ने कॉलेज, विवाह, नौकरी और राष्ट्रवाद जैसी सांसारिक परिस्थितियों में प्रवेश किया, फिर भी वे भीतर से उनसे विरक्त ही रहे। गौर मोहन ने उनके लिए नौकरी की व्यवस्था की और भविष्य की चिंता की, लेकिन अंततः वे सब कुछ कृष्ण पर छोड़ देते हैं। दूसरी ओर अभय खादी पहनकर गांधी आंदोलन से जुड़ते हैं, फिर भी उनका झुकाव सादगी, वैराग्य और आध्यात्मिक जीवन की ओर ही रहता है। यह पूरा अध्याय दिखाता है कि श्रील प्रभुपाद के जीवन में प्रारंभ से ही कृष्णभक्ति सबसे केंद्रीय तत्व थी, जबकि शिक्षा, राजनीति, विवाह और करियर केवल बाहरी परिस्थितियाँ थीं जिनके बीच से होकर उनका भविष्य का महान आध्यात्मिक मिशन धीरे-धीरे आकार ले रहा था।

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